अनैतिक संबंध से जन्मे बच्चों को भी समान अधिकार

नागपुर हाईकोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

* कहा – माता-पिता की गलती की सजा बच्चों को नहीं दी जा सकती
नागपुर /दि.14- माता-पिता के विवाहेतर या तथाकथित ‘अनैतिक’ संबंधों से जन्मे बच्चों को भी अन्य बच्चों की तरह समान अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें किसी भी अधिकार या अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता. यह महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने सुनाया है. न्यायमूर्ति अनिल किलोर व न्यायमूर्ति राजेश वाकोडे की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बच्चों का जन्म किन परिस्थितियों में होता है, इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता. इसलिए माता-पिता के व्यक्तिगत या अवैध संबंधों के कारण बच्चों को दोषी ठहराना या उनके अधिकार छीनना न्यायसंगत नहीं है.
यह मामला एक पुलिस कॉन्स्टेबल पद की भर्ती से संबंधित था. अकोला जिले के एक पुलिस कर्मचारी के विवाहेतर संबंध थे. पहली पत्नी से कानूनी तलाक लिए बिना उन्होंने दूसरा विवाह किया, जिससे एक पुत्र का जन्म हुआ. बाद में यह युवक पुलिस विभाग में पुलिस कर्मियों के बच्चों के लिए आरक्षित कॉन्स्टेबल पद के लिए चयनित हुआ. हालांकि, पहली पत्नी के बेटे ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इस नियुक्ति को चुनौती दी. याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह युवक विवाहेतर संबंध से जन्मा है, इसलिए उसे इस पद के लिए पात्र नहीं माना जाना चाहिए.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि बच्चों का जन्म उनकी इच्छा से नहीं होता. इसलिए समाज द्वारा ‘अनैतिक’ कहे जाने वाले संबंधों से जन्मे बच्चे भी पूरी तरह निर्दोष होते हैं और उन्हें समान अवसर मिलना चाहिए. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल जन्म की परिस्थितियों के आधार पर किसी बच्चे को नौकरी या अन्य अधिकारों से वंचित करना अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण होगा. फैसला सुनाते समय अदालत ने हिंदू मैरेज एक्ट-1955 की संशोधित धाराओं का भी उल्लेख किया. न्यायालय ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में कानून का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें दंडित करना. अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे बच्चों को अन्य वैध संतानों की तरह समान व्यवहार मिलना चाहिए और परिस्थितियों के अनुसार उन्हें माता-पिता की संपत्ति पर भी अधिकार मिल सकता है.
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने याचिकाकर्ता की याचिका खारिज कर दी. इसके साथ ही पुलिस कॉन्स्टेबल पद के लिए चयनित युवक की नियुक्ति बरकरार रखी गई. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका के संवेदनशील दृष्टिकोण को भी दर्शाता है.

Back to top button