‘अमरावती मंडल’ की कीर्ति अर्जुन से खास बातचीत

पिता दादासाहेब गवई की विरासत को आगे बढ़ा रहीं कीर्ति राजेश अर्जुन

* संस्कार, संघर्ष और सेवा के संस्कारों को लेकर चल रही आगे
अमरावती/दि.23 – दिवंगत राज्यपाल एवं रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ नेता रा. सू. गवई उर्फ दादासाहेब गवई ने अपने जीवनकाल के दौरान समाजसेवा एवं सामाजिक बदलाव के बेहद उच्च मानदंड स्थापित किए. जिन्हें आगे बढाने के साथ ही उनके जीवन मूल्यों, पारिवारिक विरासत और समाजसेवा के संकल्प को लेकर आगे बढने को हमने अपनी प्रतिबद्धता बनाया है. साथ ही दादासाहेब के सेवा, समर्पण और समानता के विचार हमें विरासत में मिले हैं, जिन्हें आगे बढ़ाना हम अपना कर्तव्य मानते हैं. जिसके चलते दादासाहेब के सपनों को साकार करना और उनके द्वारा स्थापित लक्ष्यों को पूरा करना ही हमारे जीवन का सबसे प्रमुख लक्ष्य है, इस आशय का प्रतिपादन दिवंगत रिपाइं नेता दादासाहेब गवई की सुपुत्री कीर्ति राजेश अर्जुन द्वारा किया गया.
रिपाइं नेता दादासाहेब गवई द्वारा अपने जीवनकाल के दौरान ही स्थापित दादासाहेब गवई चैरिटेबल ट्रस्ट तथा ट्रस्ट द्वारा संचालित किए जानेवाले शिक्षा संस्थानों के प्रबंधन का विगत लंबे समय से जिम्मा संभाल रही कीर्ति अर्जुन ने हाल ही में दैनिक ‘अमरावती मंडल’ के साथ विशेष तौर पर बातचीत करते हुए अपने पारिवारिक जीवन एवं सामाजिक कार्यों पर खुलकर प्रकाश डाला. साथ ही अपने महान पिता दादासाहेब गवई के साथ जुडी अपनी यादों को ताजा करते हुए उनके साथ रहनेवाले पिता-पुत्री के संबंधों को याद कर वे काफी हद तक भावुक भी हुई.
इस साक्षात्कार में कीर्ति राजेश अर्जुन ने बताया कि बचपन से ही उन्हें सामाजिक न्याय और समानता के संस्कार मिले. उनके पिता रा. सू. गवई का जीवन वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित रहा, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली पर पड़ा.
* अमरावती से मुंबई तक का सफर
अमरावती में जन्म लेने के बाद उनकी पूरी शिक्षा-दीक्षा मुंबई में हुई. जन्म के समय उनके पिता विधान परिषद के सदस्य थे और सार्वजनिक जीवन में अत्यधिक व्यस्त रहते थे. ऐसे में उनकी मां कमलताई गवई ने ही उनका पालन-पोषण किया. घर में अनुशासन, पारिवारिक मूल्य और परंपराओं का विशेष वातावरण था. उन्होंने बताया कि मुंबई स्थित उनका घर एक मिनी होस्टल की तरह था, जहां लोगों का लगातार आना-जाना लगा रहता था. तभी यह अहसास हुआ कि उनके पिता एक बड़े जननेता हैं-लेकिन उन्होंने कभी भी उस प्रभाव का व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाया.
* असफलता से मिली सीख
कीर्ति राजेश अर्जुन ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग साझा करते हुए बताया कि वे 12वीं कक्षा में असफल हो गई थीं. इसके बाद उन्होंने विज्ञान संकाय छोड़कर कला संकाय में पढ़ाई जारी रखी. वे कहती हैं कि, जीवन में कभी निराश नहीं होना चाहिए, असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ना ही सफलता की कुंजी है.
* विवाह और पारिवारिक जीवन
बता दें कि, कीर्ति जब केवल 19 वर्ष की आयु में थी, तब उनके पिता दादासाहेब गवई की पसंद से उनका विवाह हुआ था. उन्होंने बताया कि विवाह के समय ही पहली बार उन्होंने अपने पति को देखा. विदाई के समय अपने पिता को पहली बार भावुक होते देखा, जिससे उन्हें उनके स्नेह का वास्तविक अहसास हुआ. उनके पति राजेश अर्जुन आईआईटी और आईआईएम से शिक्षित हैं, जिन्होंने हर कदम पर उनका साथ दिया और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. दोनों के दो बच्चे हैं, जो अब अपने-अपने जीवन में स्थापित हो चुके हैं.
* समाजसेवा की ओर समर्पण
कीर्ति अर्जुन ने पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद अब स्वयं को पूरी तरह सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है. वे दादासाहेब गवई चैरिटेबल ट्रस्ट की जिम्मेदारी संभाल रही हैं, जिसके माध्यम से विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों का संचालन किया जाता है. इन संस्थाओं के जरिए दूरदराज और वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का कार्य किया जा रहा है-जो दादासाहेब गवई का सपना था.
* परिवार और मूल्य
कीर्ति अर्जुन के मुताबिक उनके पिता ने कभी जाति, धर्म या राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भेदभाव नहीं किया. इसी विचारधारा को वे आज भी अपने जीवन में अपनाए हुए हैं. परिवार आर्थिक रूप से शुरुआत में संपन्न नहीं था, लेकिन समय के साथ स्थिति बेहतर हुई-हालांकि जीवन के उतार-चढ़ाव हमेशा बने रहे.
* ससुराल और सामंजस्य
उनकी ससुराल प्रगतिशील रही-सास प्रोफेसर और ससुर वन विभाग में अधिकारी थे. पारिवारिक वातावरण में सामंजस्य रहा और पिता दादासाहेब गवई के भी ससुराल पक्ष से आत्मीय संबंध थे. उन्होंने बताया कि उनके बड़े बेटे करण के प्रति दादासाहेब का विशेष स्नेह था और ट्रस्ट की जिम्मेदारी भी उनके नाम की गई थी, जिसे फिलहाल वे स्वयं संभाल रही हैं.
* राजनीति से दूरी, शिक्षा पर फोकस
दिग्गज राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद कीर्ति अर्जुन ने राजनीति में आने की कोई इच्छा व्यक्त नहीं की. उनका स्पष्ट कहना है कि वे अपनी शैक्षणिक संस्थाओं को मजबूत बनाकर विद्यार्थियों को बेहतर नागरिक बनाने पर ध्यान देना चाहती हैं.
* आध्यात्मिक झुकाव
कीर्ति राजेश अर्जुन ने बताया कि उनके पिता दादासाहेब गवई हमेशा से ही भगवान गौतम बुद्ध के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने अपना जीवन उसी मार्ग पर समर्पित किया. वे स्वयं भी उसी राह पर चलने की इच्छुक हैं और इसके लिए विपश्यना शिविरों में भाग लेना शुरू कर चुकी हैं.
* युवाओं के लिए संदेश
उन्होंने युवाओं से कहा कि, लक्ष्य स्पष्ट रखें, अनुशासन और मेहनत अपनाएं, असफलताओं से सीखें, समाज के प्रति संवेदनशील बनें.

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