कैंसर दवा की दरवृध्दि पर सवालिया निशान
पहले सस्ता करने का दावा, अब दरवृध्दि को मंजुरी

* सरकार की कैंसर दवा निति पर उठ रहे सवाल
मुंबई /दि.7- देशभर के हजारों कैंसर मरिजों के लिए आवश्यक किमोथेरेपी दवाईयों की किल्लत पैदा होते ही आखिरकार केंद्र सरकार ने इस दवाई की किमत को बढाने का निर्णय लिया है. सरकार द्वारा विगत 7 जून को तत्वतः मंजूरी दिए जाने के बाद राष्ट्रीय औषध किमत प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 11 जून से कैंसर रोग प्रतिबंधक को महत्वपूर्ण दवाईयों की किमत में करीब 10 से 15 फीसद तक वृध्दि लागू की है. लेकिन अब यह सवाल उपस्थित हो रहा है कि यदि यह निर्णय समय रहते ले लिया जाता तो देशभर के मरिजों को दवाईयों के लिए दर-दर नहीं भटकना पडता.
बता दे कि, सिस्प्लॅटिन व कार्बोप्लॅटिन नामक दो दवाईयां फुफ्फुस, गर्भाशय, स्तन, अंडाशय, मुंह सहित अन्य कई तरह के कर्करोग के लिए प्रथम श्रेणी वाली किमोथेरेपी दवाईयां है. इन दवाईयों के दाम सरकार के दाम सरकार के नियंत्रण तले रहने के चलते कच्चे माल पर होनेवाला खर्च बढने के बावजूद उत्पादक कंपनियों द्वारा दवाईयों की किमत नहीं बढाई जा सकती है. जिसके चलते कई कंपनियों ने या तो उत्पादन को कम कर दिया या फिर पूरी तरह से रोक दिया. जिसके चलते देश भर में इन दवाईयों की किल्लत पैदा होगी. सरकारी अस्पताल में भर्ती रहनेवाले अथवा इलाज करवाने वाले मरिजों पर इसका सर्वाधिक परिणाम हुआ.
विशेष उल्लेखनिय है कि, कैंसर मरिजों, डॉक्टरों एवं अस्पतालों द्वारा विगत कई महिनों से दवाईयों की किल्लत को लेकर संकेत दिए जा रहे थे. परंतु केंद्र सरकार ने तत्काल निर्णय लेने की बजाए किल्लत को लेकर स्थिती गंभीर होने के बाद दरवृध्दी को अनुमती दी. इसके चलते सरकार की दवा दर नियंत्रण निती पर सवालिया निशान लगते दिखाई दे रहे है. कैंसर पर आवश्यक रहनेवाली दवाईयों की किमतों को सर्वसामान्यों की पहुंच में रखने हेतु किमत नियंत्रण निती व अमल का गाजाबाजा करनेवाली केंद्र सरकार को ही आखिरकार उन दवाईयों की किमत बढाने पर मंजूरी देनी पडी है. प्लॅटिनम आधारित किमोथेरेपी दवाईयों की देशभर में किल्लत पैदा होने के बाद सरकार ने अपवादात्मक दर वृध्दी को मान्य किया. जिसके चलते दवा निती को लेकर सातत्य, नियोजन व दूरदृष्टी के संदर्भ में सवाल उपस्थित किए जा रहे है.
इस बारे में राज्य सरकार का दावा है कि, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, वैश्विक बाजारों में प्लॅटिनम की बढी हुई किमत, आयात खर्च तथा रूपये में होने वाले उतार चढाव की वजह से उत्पादन खर्च बढा है. जिसके चलते दवाईयों की आपूर्ति कायम रखने हेतु एक बार विशेष दरवृध्दी करनी पडी है. परंतु विपक्ष का कहना है कि हालात पहले ही स्पष्ट रहते समय यदी सरकार द्वारा हस्तक्षेप किया गया होता तो मरिजों को दवाईयों की किल्लत का सामना नहीं करना पडता. सरकार ने इससे पहले संसद में कैंसर विरोधी 131 दवाईयों की किमत नियंत्रण में रहने और इसकी वजह से मरिजों का बडे पैमाने पर आर्थिक सर्वेक्षण होने का दावा किया था. परंतु हकिकत में अत्यावश्यक दवाईयां ही बाजार से गायब हो जाने के चलते यह आरोप भी लगने लगे थे कि केवल किमत नियंत्रण भी पर्याप्त नहीं है. बल्कि दवाईयां उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी सरकार है.





