‘उस’ मामले में जानबूझकर बरती जा रही गोपनीयता

शिनाख्त परेड से पहले नहीं होंगे आरोपियों के नाम उजागर

* सीपी राकेश ओला ने भानखेडा गैंगरेप मामले में दी प्रतिक्रिया
* जांच की दृष्टि से आरोपियों के नाम उजागर करना उचित नहीं बताया
अमरावती/दि.1 – फ्रेजरपुरा थाना क्षेत्र में शनिवार 28 मार्च की रात युवती और उसके मित्र को रोककर मारपीट, लूटपाट तथा दुष्कर्म करने की गंभीर घटना सामने आई थी. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने आरोपियों की पहचान सार्वजनिक नहीं की. इस मामले को लेकर जारी घमासान के पश्चात पुलिस आयुक्त राकेश ओला ने स्पष्ट किया कि, शिनाख्त परेड (टेस्ट आईडेंटिफिकेशन परेड) पूरी होने से पहले आरोपियों के नाम उजागर करना जांच की दृष्टि से उचित नहीं होगा.
पुलिस आयुक्त ने बताया कि, घटना की जानकारी मिलते ही सभी अधिकारियों ने देर रात घटनास्थल को अपने कब्जे में लेकर तत्काल कार्रवाई शुरु की. यह घटना सीआरपीएफ कैंप से चांदुर रेलवे मार्ग पर लगभग 9 किलोमीटर दूर भानखेडा गांव की ओर जानेवाले मार्ग पर घटित हुई. मुख्य गवाह को साथ लेकर पुलिस टीम तुरंत मौके पर पहुंची और आवश्यक पंचनामा व सबूत इकठ्ठा करने की प्रक्रिया पूरी की गई. पुलिस ने बताया कि, प्रारंभिक जांच में आरोपियों के बारे में ठोस जानकारी नहीं थी, इसके बावजूद पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए लगभग 8 घंटे के भीतर पांच आरोपियों को हिरासत में ले लिया. सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें चार दिन की पुलिस कस्टडी में भेजने के आदेश दिए गए है.
पुलिस आयुक्त राकेश ओला ने कहा कि, इस प्रकार के अपराधों में पीडिता द्वारा आरोपियों की पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. इसके लिए शिनाख्त परेड की प्रक्रिया अपनाई जाती है, जो पीसीआर में नहीं बल्कि न्यायिक हिरासत (एमसीआर) के दौरान कराई जाती है. उन्होंने बताया कि, इसके अलावा भी सभी पहलुओं को मद्देनजर रखते हुए यह प्रक्रिया पूर्ण करनी होती है. जिसमें पीडिता की मानसिक और शारीरिक स्थिति भी इस प्रक्रिया में अहम होती है, ताकि वह बिना किसी दबाव के आरोपियों की पहचान कर सके. इसी कारण मामले को गोपनीय रखा गया है. जिससे जांच प्रभावित न हो. पुलिस आयुक्त ने कहा कि, सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए जांच को मजबूत बनाया जा रहा है, ताकि दोषियों को अदालत में कडी सजा दिलाई जा सके.
बता दें कि, घटना के बाद मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वॉट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर आरोपियों के नामों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और अफवाहें फैलने लगी. कुछ लोगों ने पुलिस और मीडिया पर सवाल उठाते हुए आरोप-प्रत्यारोप भी किए. वहीं कुछ तत्वों द्वारा मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश भी सामने आई. हालांकि अब तक किसी प्रमुख राजनीतिक नेता का आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि, सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक जानकारी पर नजर रखी जा रही है और आवश्यकता पडने पर कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी.
ऐसे में इस मामले में कानून से जुडे अन्य विशेषज्ञ से पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि, इस तरह के मामलों में पीडिता की पहचान सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है. यदि जल्दबाजी में आरोपियों के नाम या फोटो सार्वजनिक किए जाते हैं, तो कई बार पीडिता की पहचान उजागर होने का खतरा बढ जाता है. इससे पीडिता को सामाजिक दबाव, अपमान और मानसिक पीडा का सामना करना पड सकता है. कानून के अनुसार, जब तक अदालत किसी आरोपी को दोषी घोषित नहीं करती, तब तक केवल संदिग्ध माना जाता है. वहीं संवेदनशील मामलों या साम्प्रदायिक तनाव की आशंका होने पर पुलिस आरोपियों की पहचान छिपाकर उन्हें भीड के आक्रोश या अप्रिय घटनाओं से बचाने का प्रयास करती है.

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