महाराष्ट्र में मुकदमों में काफी देरी
सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्त की चिंता

* पीडितों को न्याय मिलने में आ रही बाधा
नई दिल्ली/दि.18 – महाराष्ट्र में अपराधिक मामले बाबत सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों में बार-बार होनेवाली लंबी देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की हैं. न्यायालय ने कहा है कि इस अत्याधिक और समझ से परे देरी से आरोपियों के अधिकार के साथ-साथ पीडितों को न्याय मिलने में भी बाधा आती हैं.
2019 में मुथुट फाइनांस की नाशिक शाखा में डकैती हुई थी. इसमें कर्मचारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इस प्रकरण के आरोपी की जमानत याचिका पर न्यायमूर्ति एहसानुद्दीन अमनुल्ला और न्यायमूर्ति आर महादेवन के सामने सुनवाई हुई. न्यायालय ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि अनेक साल बाद भी मामले में कोई खास प्रगति नहीं हुई हैं. न्यायालय ने नाशिक पुलिए आयुक्त को देरी के कारण पर व्यक्तिगत हलफ नामा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया.
* प्रलंबित मुकदमे
– कुल प्रलंबित प्रकरण – लगभग 51.7 लाख
– फौजदारी प्रकरण- लगभग 35.3 लाख
– दिवानी प्रकरण- लगभग 16.4 लाख
– सबूत – युक्तिवाद -फैसले के चरण के मामले -लगभग 10 सऐ 11 लाख
* मुकदमो की अवधि
– 1 वर्ष तक लगभग 26 प्रतिशत
– 1 से 3 वर्ष लगभग 25 प्रतिशत
– 3 से 5 वर्ष लगभग 15 प्रतिशत
– 5 से 10 वर्ष लगभग 22 प्रतिशत
– 10 वर्ष से ज्यादा लगभग 11 प्रतिशत
प्रमुख कारण
समंस तामिल करने में देरी और पक्षों की अनुपस्थिति: 53 प्रतिशत प्रकरण
आरोपी जेल से पेश न करना
वकील अथवा सरकारी वकील की गैरमौजूदगी
* आरोपी की कोर्ट में अनुपस्थिति
कल्याण (ठाणे) अदालत में हाल ही में एक पुलिस अधिकारी हमला करनेवाले कैदी को 85 में से 55 तारिखों पर जेल से ही न्यायालय में पेश नहीं किया गया. सुप्रिम कोर्ट ने इसे चौकानेवाला और बेहद चिंताजनक संबोधित किया हैं.
* जमानत देने पर कार्रवाई
– अलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ खंडपीठ के न्यायाधिश पंकज भाटिया ने तीन माह में दहेज बली के 510 में से 508 प्रकरणों में जमानत दी हैं. यह देख उनके पास जमानत के प्रकरण न सौंपने के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी.पार्डीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने दिए हैं.
– सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा निरीक्षण दर्ज किया कि अपराधिक मुकदमों का समय पर निपटारा होने के लिए न्यायव्यवस्था की मूलभूत जिम्मेदारी हैं. देरी के कारण न्याप्रक्रिया पर से जनता का विश्वास कम हो सकता हैं.





