दासबोध पर बयान से विवाद, वारकरी परंपरा में नाराजगी

स्वामी गोविंददेव गिरी महाराज के बयान पर मचा बवाल

पुणे /दि.4- संत साहित्य को लेकर स्वामी गोविंददेवगिरी महाराज के एक बयान से महाराष्ट्र में विवाद खड़ा हो गया है. सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में आयोजित ‘ज्ञानोबा ते तुकोबा’ राष्ट्रीय चर्चासत्र में उन्होंने कहा कि संत परंपरा में दासबोध ही एकमात्र स्वतंत्र ग्रंथ है, जबकि ज्ञानेश्वरी और एकनाथी भागवत भाष्य हैं तथा तुकाराम गाथा संकलन होने के कारण उन्हें स्वतंत्र ग्रंथ नहीं माना जा सकता. उनके इस वक्तव्य के बाद वारकरी समाज में नाराजगी फैल गई है. कई वारकरी संगठनों ने इसे संत परंपरा का अवमूल्यन बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है. संत ज्ञानेश्वर, संत एकनाथ और संत तुकाराम की परंपरा को महाराष्ट्र में अत्यंत श्रद्धा से देखा जाता है. ऐसे में इस प्रकार की टिप्पणी को लेकर राज्यभर में बहस छिड़ गई है.
इस मुद्दे पर सामाजिक संगठन संभाजी ब्रिगेड के प्रवक्ता संतोष शिंदे ने भी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी पर निशाना साधा. फिलहाल इस बयान को लेकर वारकरी और रामदासी परंपरा के अनुयायियों के बीच वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं. हालांकि स्वामी गोविंददेवगिरी महाराज की ओर से इस विवाद पर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है.

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