वर्षों से लटकी पडी अमरावती की भूमिगत गटर योजना पर हाईकोर्ट हुआ सख्त
केंद्रीय नागरी विकास मंत्रालय को भी बनाया ‘पार्टी’

* राज्य सरकार सहित केंद्र सरकार से अदालत ने मांगा जवाब
* 29 वर्षों से अधर में लटकी हैं अमरावती की भूमिगत गटर योजना
* पूर्व मंत्री डॉ. सुनील देशमुख ने वर्ष 2024 से दायर कर रखी हैं जनहित याचिका
अमरावती/ दि.7- वर्ष 1997 में अमरावती शहर के भविष्य में होनेवाले विस्तार व विकास की बात को ध्यान में रखते हुए शहर को साफसुत्रा व नालीमुक्त रखने हेतु भुमिगत गटर योजना शुरू की गई थी. जिसका प्रारंभीक काम भी बडे जोर-शोर से शुरू हुआ था. लेकिन आगे चलकर यह योजना अधर में लटक गई और आज 29 वर्ष बाद भी यह योजना अधर में ही लटकी हुई हैं. जिसके चलते योजना पर हुआ लाखों करोड रुपयों का खर्च व्यर्थ चला गया हैं. साथ ही साथ इन 29 वर्षों के दौरान योजना का लागत मूल्य भी बढ गया हैं. इस बात को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस नेता व पूर्व मंत्री डॉ. सुनील देशमुख ने वर्ष 2024 में मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ के समक्ष एक जनहित याचिका दायर की थी. जिस पर हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता डॉ. सुनील देशमुख के निवेदन को ग्राह्य मानते हुए हाईकोर्ट ने अब केंद्रीय शहर विकास व कल्याण मंत्रालय के सचिव को भी इस मामले में प्रतिवादी बनाया हैं. जिसके चलते अब राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी अमरावती में 29 साल से प्रलंबित पडी रहनेवाली भूमिगत गटर योजना के संदर्भ में हलफनामे के साथ अपना जवाब देना होगा. जिसके चलते माना जा रहा है कि अब अमरावती में लंबे समय से अधर में लटकी भूमिगत गटर योजना को लेकर अदालत में काफी सख्त रवौया अपना हैं.
बता दें कि अमरावती के पूर्व पालकमंत्री डॉ. सुनील देशमुख ने शहर में विगत करीब तीन दशकों से आधी अधूरी पडी भूमिगत गटर योजना में हो रही लेट लतिफी की ओर अदालत का ध्यान दिलाने हेतु 10 अक्तूबर 2024 को जनहीत याचिका क्रमांक 56/224 दायर की थी. जिस पर अदालत ने अब तक कई न्यायाधीशों के समक्ष कई बार सुनवाई हो चुकी हैं. विगत करीब 29 वर्षों से भूमिगत गटर योजना के प्रलंबित पडे रहने पर अपनी जनहित याचिका में सवाल उठाने के साथ ही पूर्व मंत्री डॉ. सुनील देशमुख ने अदालत के जरीए यह भी जानना चाहा था कि आखिर अमरावती जैसे प्रमुख शहर को अमृत-2 योजना में शामिल क्यों नहीं किया गया.
इस जनहित याचिका पर अलग-अलग बार सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने राज्य के नगरविकास विभाग तथा महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण को विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए थे. साथ ही केंद्र सरकार को भी इस मामले में प्रतिवादी बनाए जाने का आदेश दिया. जिसके चलते अब इस मामले में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के सचिव को प्रतिवादी बनया गया हैं. जिसका सीधा मतलब है कि अब इस मामले में राज्य सरकार व महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण के साथ-साथ केंद्र सरकार भी प्रतिवादी हैं. जिसे अदालत के समक्ष अपने हलफनामे के जरिए अपना जवाब पेश करना होगा.
* 1997 में शुरू हुई योजना, 28 साल बाद भी अधूरी
बता दें कि अमरावती शहर में भूमिगत गटर योजना की शुरुआत वर्ष 1997 में तत्कालीन पालकमंत्री जगदीश गुप्ता के कार्यकाल में हुई थी. बाद में विधायक और पालकमंत्री रहते हुए डॉ. सुनील देशमुख ने इस परियोजना को गति देने का प्रयास किया. लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद यह योजना आज भी अधूरी पड़ी है. शहर के अधिकांश हिस्सों में अब भी खुली नालियां बह रही हैं, जिनसे उठने वाली बदबू और गंदगी नागरिकों के लिए गंभीर समस्या बनी हुई है. डेंगू, मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों के खतरे लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी.
* करोड़ों की मंजूरी, फिर भी काम ठप
यहां यह विशेष उल्लेखनीय हैं कि भूमिगत गटर योजना का मूल प्रारूप 123 करोड़ रुपए का था. बाद में वर्ष 2008 में यूआईडीएसएसएमटी योजना के तहत 141.93 करोड़ रुपए की मंजूरी मिली. वर्ष 2017 तक शहर के कई हिस्सों में पाइपलाइन और एसटीपी निर्माण का काम भी हुआ. इसके बाद वर्ष 2014 से 2019 के बीच 25 हजार प्रॉपर्टी कनेक्शन के लिए 59.56 करोड़ रुपए तथा अन्य संबंधित कार्यों के लिए कुल 87 करोड़ रुपए मंजूर किए गए. इसके बावजूद 2019 के बाद काम लगभग पूरी तरह बंद हो गया. स्थिति यह है कि ठेकेदार नियुक्त होने के बावजूद पिछले छह वर्षों में केवल 8 हजार कनेक्शन ही जोड़े जा सके हैं.
* प्रशासनिक लापरवाही पर लगातार उठ रहे सवाल
पूर्व मंत्री डॉ. सुनील देशमुख की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि जब-जब उन्हें शासन में कार्य करने का अवसर मिला, तब-तब इस योजना को आगे बढ़ाया गया, लेकिन वर्तमान प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण परियोजना अधर में लटक गई. सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि अमरावती जैसे बड़े शहर की मूलभूत सुविधा से जुड़ी परियोजना को वर्षों तक लटकाए रखना गंभीर मामला है. कोर्ट की सख्ती के बाद अब शहरवासियों में उम्मीद जगी है कि परियोजना को फिर से गति मिल सकती है.
* योजना की राह में मनपा की आर्थिक कमजोरी बनी सबसे बड़ी बाधा
इस याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत द्बारा पूछे गए सवालों के जवाब में महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण द्बारा हाईकोर्ट में दाखिल अपने प्रतिज्ञा पत्र में स्पष्ट किया है कि अमरावती महानगरपालिका द्वारा अपने हिस्से की निधि समय पर उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण योजना प्रभावित हुई. प्रतिज्ञा पत्र के अनुसार मनपा को इस योजना के लिए 94.06 करोड़ रुपए जमा करने थे, लेकिन जून 2005 तक केवल 8.08 करोड़ रुपए ही जमा किए गए. निधि के अभाव में परियोजना की हालत लगातार खराब होती गई. बताया गया कि मनपा ने अपने हिस्से की रकम जुटाने के लिए हुडको से कर्ज लेने का प्रयास किया था, लेकिन नियम और शर्तों की पूर्ति नहीं होने के कारण कर्ज मंजूर नहीं हो सका. आर्थिक संकट से जूझ रही मनपा बाद में भी आवश्यक निधि उपलब्ध नहीं करा सकी.
* योजना में अब तक क्या-क्या हुआ काम?
अब तक शहर में 265 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन डाली जा चुकी है. हालांकि 24 हजार 646 प्रस्तावित संपत्तियों में से केवल 8 हजार 422 घरों को ही नेटवर्क से जोड़ा जा सका है. शहर में 44 एमएलडी क्षमता का मलजल प्रक्रिया केंद्र भी तैयार हो चुका है, लेकिन उसका उपयोग अब तक शुरू नहीं किया गया है. पांच जोन वाले शहर में केवल दो जोन में ही योजना आंशिक रूप से लागू हो पाई है. घरेलू कनेक्शन का खर्च अधिक होने के कारण नागरिकों की ओर से पर्याप्त प्रतिसाद नहीं मिला था. इसके बाद सरकार ने मुफ्त कनेक्शन देने का निर्णय लेते हुए 87 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया, लेकिन इसके बावजूद योजना पूरी नहीं हो सकी.
* यह शहर के स्वास्थ्य और भविष्य की लड़ाई
इस पूरे मामले को लेकर जानकारी के साथ ही अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व मंत्री डॉ. सुनील देशमुख ने कहा कि यह केवल एक परियोजना का मामला नहीं, बल्कि शहर के स्वास्थ्य और भविष्य का प्रश्न है. उन्होंने कहा कि न्यायालय के माध्यम से सरकार को योजना पूरी करने के लिए बाध्य किया जाएगा, ताकि अमरावती को खुले नालों और गंदगी की समस्या से मुक्ति मिल सके.





