अमरावती के 90 अस्पताल फायर एनओसी के बिना!
डफरिन हादसे ने खोली सुरक्षा की पोल, तीन नवजातों की मौत के बाद चौंकाने वाला खुलासा

* शहर के कुल 246 में से सिर्फ 156 अस्पतालों के पास फायर एनओसी
* आखिर किसके भरोसे चल रहे हैं बाकी अस्पताल, प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल
अमरावती /दि.26- डफरिन अस्पताल के एसएनसीयू में हुए भीषण अग्निकांड में तीन नवजात शिशुओं की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया है. लेकिन इस हादसे के बाद जो सच सामने आया है, उसने स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासन दोनों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं. खुलासा हुआ है कि अमरावती शहर के कुल 246 सरकारी और निजी अस्पतालों में से केवल 156 अस्पतालों के पास ही महानगरपालिका अग्निशमन विभाग की वैध फायर एनओसी है, जबकि लगभग 90 अस्पताल बिना फायर एनओसी के ही संचालित हो रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अस्पतालों में रोजाना हजारों मरीजों का उपचार होता है, आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर और ऑक्सीजन युक्त वार्ड संचालित होते हैं, तब बिना अग्नि सुरक्षा मंजूरी के इन अस्पतालों को चलने की अनुमति आखिर किसने दी?
* डफरिन हादसे के बाद खुली प्रशासन की आंखें
सोमवार, 24 अगस्त की तड़के डफरिन अस्पताल में हुए अग्निकांड में तीन मासूमों की मौत के बाद प्रशासन हरकत में आया है. लेकिन नागरिकों का कहना है कि यदि यही सक्रियता पहले दिखाई जाती तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी टाली जा सकती थी. जानकारी के अनुसार, मनपा अग्निशमन विभाग ने समय-समय पर कई अस्पतालों को फायर ऑडिट और एनओसी संबंधी नोटिस जारी किए थे. इसके बावजूद अधिकांश मामलों में कार्रवाई कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी. नतीजा यह हुआ कि शहर के दर्जनों अस्पताल आज भी बिना आवश्यक अग्नि सुरक्षा मंजूरी के संचालित हो रहे हैं.
* नोटिस दिए गए, लेकिन कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
सबसे बड़ा प्रश्न प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है. यदि अस्पतालों को नोटिस जारी किए गए थे तो उसके बाद क्या कार्रवाई की गई? कितने अस्पतालों पर जुर्माना लगाया गया? कितनों को बंद करने की चेतावनी दी गई? और कितनों के खिलाफ वास्तविक कार्रवाई हुई? इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है. नागरिकों का आरोप है कि वर्षों से नोटिस जारी करने और फाइलें आगे बढ़ाने का खेल चलता रहा, लेकिन जमीनी स्तर पर सुरक्षा नियमों को लागू कराने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं गई.
* क्या राजनीतिक दबाव के कारण ठंडे बस्ते में जाती हैं कार्रवाई?
शहर में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कई मामलों में राजनीतिक दबाव और प्रभावशाली लोगों की दखलंदाजी के कारण प्रशासनिक कार्रवाई अधर में लटक जाती है. नागरिकों का कहना है कि फायर एनओसी और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करने की बजाय अधिकारियों पर दबाव बनाया जाता है, जिससे मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का सवाल है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही जागता है? क्या तीन नवजातों की मौत के बाद भी व्यवस्था केवल नोटिस जारी करने तक सीमित रहेगी?
* अस्पताल ही नहीं, कोचिंग क्लासेस और मंगल कार्यालय भी जोखिम में
स्थिति केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है. जानकारी के अनुसार, शहर के अनेक कोचिंग क्लासेस, शैक्षणिक संस्थान और मंगल कार्यालय भी अग्नि सुरक्षा नियमों का पूर्ण पालन नहीं कर रहे हैं. मनपा अग्निशमन विभाग की ओर से इन प्रतिष्ठानों को भी कई बार नोटिस जारी किए गए हैं. बावजूद इसके बड़ी संख्या में संस्थान बिना पर्याप्त अग्निशमन उपकरणों, आपातकालीन निकास मार्ग और सुरक्षा मानकों के संचालित हो रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी बहुमंजिला कोचिंग सेंटर या भीड़भाड़ वाले मंगल कार्यालय में आग लगती है तो जनहानि की संभावना और अधिक गंभीर हो सकती है.
* फायर ऑडिट केवल कागजों तक सीमित?
डफरिन हादसे के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि फायर ऑडिट की प्रक्रिया वास्तव में कितनी प्रभावी है. कई अस्पतालों में वर्षों से ऑडिट नहीं हुआ, जबकि कुछ स्थानों पर ऑडिट रिपोर्ट के बावजूद आवश्यक सुधार नहीं किए गए. अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि फायर ऑडिट केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन बचाने की प्रक्रिया है. स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म, अग्निशमन यंत्र, आपातकालीन निकास मार्ग और विद्युत सुरक्षा की नियमित जांच न होने पर कोई भी अस्पताल कुछ ही मिनटों में मौत के जाल में बदल सकता है.
* अब मनपा आयुक्त की परीक्षा
डफरिन हादसे के बाद अब सभी की निगाहें महानगरपालिका आयुक्त डॉ. मंगेश गोंदावले पर टिकी हैं. शहरवासियों का सवाल है कि क्या बिना फायर एनओसी संचालित हो रहे अस्पतालों, कोचिंग क्लासेस और मंगल कार्यालयों के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया जाएगा? या फिर कुछ दिनों की सख्ती और बैठकों के बाद यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
* जनता पूछ रही है, अगला हादसा कहां होगा?
डफरिन अस्पताल में तीन नवजातों की मौत ने अमरावती को झकझोर दिया है. लेकिन उससे भी भयावह तथ्य यह है कि शहर में लगभग 90 अस्पताल ऐसे हैं, जिनकी अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर आधिकारिक मुहर ही नहीं है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन अगली त्रासदी का इंतजार कर रहा है, या फिर इस बार वास्तव में जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी? क्योंकि जब अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान ही सुरक्षा मानकों के बिना चल रहे हों, तब मरीजों की जिंदगी आखिर किसके भरोसे है?





