कर्ज संस्कृति का खतरनाक संदेश

भारतीय अर्थव्यवस्था में इन दिनों एक नया शब्द आम लोगों की समझ से परे तेजी से लोकप्रिय हो रहा है-हेयरकट. सामान्य नागरिक के लिए हेयरकट का अर्थ बाल कटवाना होता है, लेकिन बैंकिंग और दिवाला कानून की दुनिया में इसका अर्थ है कि बैंक और वित्तीय संस्थाएं अपने हजारों करोड़ रुपये के कर्ज़ का बड़ा हिस्सा छोड़ दें और उसे व्यावहारिक समाधान मान लें. ताजा मामला एस्सेल समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़ा है. राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) द्वारा स्वीकृत पुनर्भुगतान योजना के अनुसार हजारों करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले कर्जदाताओं को बेहद मामूली राशि मिलने जा रही है. यह मामला केवल एक उद्योगपति या एक कारोबारी समूह का नहीं है. यह भारतीय बैंकिंग व्यवस्था, दिवाला कानून और आर्थिक न्याय की अवधारणा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.
सवाल यह नहीं है कि कानून ने क्या कहा. सवाल यह है कि क्या न्याय भी वही कहता है? इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प तर्क यह सामने आया कि संबंधित कर्ज़ कंपनियों ने लिया था, व्यक्तिगत रूप से नहीं. लेकिन यह तर्क उतना ही सुविधाजनक है जितना किसी जहाज के कप्तान का यह कहना कि जहाज डूबा है, वह नहीं. व्यापार की दुनिया में जब कंपनियां विस्तार करती हैं, निवेश जुटाती हैं, बाजार पर कब्जा करती हैं और मुनाफा कमाती हैं, तब उसका श्रेय प्रवर्तकों और मालिकों को मिलता है. लेकिन जब वही कंपनियां कर्ज़ के बोझ तले दब जाती हैं, तब अचानक यह कहा जाने लगता है कि कर्ज़ कंपनी का था, व्यक्ति का नहीं. यही वह बिंदु है जहां व्यक्तिगत गारंटी की अवधारणा सामने आती है. यदि किसी उद्योगपति ने स्वयं गारंटर बनकर बैंकों से कर्ज़ दिलवाया है, तो फिर संकट के समय यह कहना कि मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं, केवल कानूनी तर्क हो सकता है, नैतिक तर्क नहीं.
यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार का गृह ऋण 10 लाख रुपये का हो और बैंक उससे कहे कि तुम केवल 30 हजार रुपये लौटा दो, बाकी माफ, तो शायद पूरा देश बैंक की शाखाओं के बाहर कतार में खड़ा दिखाई देगा. लेकिन ऐसा कभी नहीं होता. मध्यमवर्गीय व्यक्ति की एक किस्त चूक जाए, तो फोन आने लगते हैं. दो किस्तें चूक जाएं, तो नोटिस पहुंच जाती हैं. तीन किस्तें चूक जाएं, तो वसूली एजेंट सक्रिय हो जाते हैं और कई मामलों में संपत्ति कुर्की की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है. लेकिन जब मामला हजारों करोड़ रुपये का होता है, तब शब्द बदल जाते हैं. वसूली रिजोल्यूशन बन जाती है. घाटा हेयरकट बन जाता है और कर्ज़ माफी व्यावसायिक पुनर्गठन कहलाने लगती है. यही वह दोहरा मानदंड है जो आम नागरिक को सबसे अधिक विचलित करता है.
जब किसी उद्योगपति का कर्ज़ डूबता है, तब अक्सर यह कहा जाता है कि नुकसान बैंक का हुआ. लेकिन बैंक का पैसा आखिर आता कहां से है? वह जनता की बचत है. वह वेतनभोगी कर्मचारी की एफडी है. वह किसान की जमा पूंजी है. वह पेंशनभोगी की जीवनभर की कमाई है. वह करदाता के पैसों से पुनर्पूंजीकृत सार्वजनिक बैंकों की संपत्ति है. इसलिए जब हजारों करोड़ रुपये की वसूली नहीं हो पाती, तब नुकसान किसी अमूर्त संस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज का होता है. दुखद यह है कि इस नुकसान का बोझ अंततः उसी करदाता पर पड़ता है, जिसे इस प्रक्रिया में कहीं सुना ही नहीं जाता. लेकिन जब हजारों करोड़ डूब जाते हैं और कानून उसे ‘समाधान’ कहता है.
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) को भारत के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों में गिना जाता है. इस कानून का उद्देश्य था कि, समयबद्ध समाधान, संपत्तियों का संरक्षण, बैंकों की वसूली में सुधार और जानबूझकर कर्ज़ न चुकाने वालों पर दबाव. लेकिन पिछले कुछ वर्षों के अनुभवों ने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है. यदि अधिकांश मामलों में बैंकों को अपने दावों का बहुत छोटा हिस्सा ही वापस मिल रहा है, तो क्या कानून अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर पा रहा है? कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाना और आर्थिक न्याय मिल जाना, दोनों एक ही बात नहीं हैं. समाज में कानून केवल विवाद सुलझाने का माध्यम नहीं होता, वह संदेश भी देता है और आज जो संदेश जा रहा है, वह चिंताजनक है. संदेश यह कि यदि आप छोटे उधारकर्ता हैं, तो आपके लिए नियम कठोर हैं. लेकिन यदि आप बड़े कॉरपोरेट हैं, आपके ऊपर हजारों करोड़ का कर्ज़ है और आपके पास महंगे वकीलों की टीम है, तो आपके लिए व्यवस्था कहीं अधिक उदार हो सकती है. यह धारणा भले पूरी तरह सही न हो, लेकिन बार-बार सामने आने वाले ऐसे मामलों से आम नागरिक के मन में यही भावना जन्म लेती है और किसी भी आर्थिक व्यवस्था के लिए यह भावना अत्यंत घातक होती है.
देश का मध्यमवर्ग आज यह नहीं पूछ रहा कि सुभाष चंद्रा दोषी हैं या निर्दोष. वह यह भी नहीं पूछ रहा कि, अदालत का फैसला कानूनी रूप से सही है या गलत. उसका सवाल इससे कहीं अधिक सीधा है कि, जो राहत हजारों करोड़ रुपये के कर्ज़ में मिल सकती है, उसका एक अंश भी आम नागरिक को क्यों नहीं मिलता? क्यों एक किसान की जमीन नीलाम हो जाती है? क्यों एक छोटे व्यापारी की दुकान सील हो जाती है? क्यों एक नौकरीपेशा व्यक्ति की संपत्ति कुर्क हो जाती है और दूसरी ओर हजारों करोड़ रुपये के मामलों में समाधान का रास्ता निकल आता है? यही प्रश्न व्यवस्था की विश्वसनीयता को चुनौती देता है. कानून का सम्मान तभी होगा, जब न्याय दिखाई देगा. किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में दिवाला कानून आवश्यक है. व्यापार में जोखिम होता है.
हर कारोबारी विफलता को धोखाधड़ी नहीं कहा जा सकता. लेकिन उतना ही सत्य यह भी है कि, कानून का उद्देश्य केवल उद्योगपतियों को दूसरा अवसर देना नहीं, बल्कि कर्ज़दाताओं और जनता के हितों की रक्षा करना भी है. यदि आम लोगों को यह लगने लगे कि व्यवस्था बड़े लोगों के लिए नरम और छोटे लोगों के लिए कठोर है, तो कानून के प्रति सम्मान कमजोर पड़ने लगता है और यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. सुभाष चंद्रा का यह प्रकरण केवल एक कारोबारी विवाद नहीं है. यह उस आर्थिक संस्कृति का आईना है, जिसमें लाभ का निजीकरण और घाटे का सामाजिककरण होता दिखाई देता है. मुनाफा निजी हाथों में जाता है, लेकिन नुकसान अंततः बैंकों, निवेशकों और करदाताओं को उठाना पड़ता है. यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो सबसे बड़ा नुकसान केवल बैंकों का नहीं होगा. सबसे बड़ा नुकसान उस भरोसे का होगा, जिस पर पूरी वित्तीय व्यवस्था खड़ी होती है.
आज जरूरत किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध की नहीं है. जरूरत इस बात की है कि देश की दिवाला प्रक्रिया केवल कानूनी रूप से वैध ही नहीं, बल्कि नैतिक रूप से भी न्यायसंगत दिखाई दे. क्योंकि जिस व्यवस्था में छोटे कर्ज़दार पर कानून का डंडा और बड़े कर्ज़दार पर हेयरकट की कृपा बरसती दिखाई दे, वहां सबसे पहले न्याय की भावना दिवालिया होती है और किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा आर्थिक संकट दूसरा नहीं हो सकता.

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