गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की स्वदेशी वैक्सीन को डब्ल्यूएचओ की मान्यता
सीरम इंस्टीट्यूट की ‘सर्वावैक’ को मिला प्रीक्वालिफिकेशन दर्जा

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां भी कर सकेंगी खरीद
नई दिल्ली/दि. 6 – गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर की रोकथाम के लिए विकसित भारत की पहली स्वदेशी क्वाड्रिवेलेंट ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) वैक्सीन ‘सर्वावैक’ को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने प्रीक्वालिफिकेशन का दर्जा प्रदान किया है. इस मान्यता के साथ ही संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियां और वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रम अब इस वैक्सीन की खरीद कर सकेंगे. पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित इस वैक्सीन को मिली यह मान्यता कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है.
सीरम इंस्टीट्यूट को अब तक डब्ल्यूएचओ की 32वीं प्रीक्वालिफिकेशन स्वीकृति प्राप्त हुई है. डब्ल्यूएचओ का प्रीक्वालिफिकेशन दर्जा मिलने का अर्थ है कि संबंधित वैक्सीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावशीलता के मानकों पर खरी उतरी है. इससे वैश्विक स्तर पर इसकी स्वीकार्यता और उपयोग का दायरा बढ़ने की संभावना है.
* एचपीवी संक्रमण से होता है सर्वाइकल कैंसर
विशेषज्ञों के अनुसार ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) संक्रमण लंबे समय तक शरीर में सक्रिय रहने पर गर्भाशय ग्रीवा कैंसर का कारण बन सकता है. सर्वाइकल कैंसर के लगभग 99 प्रतिशत मामलों में एचपीवी संक्रमण प्रमुख कारण माना जाता है. ‘सर्वावैक’ वैक्सीन एचपीवी के प्रकार 6, 11, 16 और 18 से सुरक्षा प्रदान करती है. इनमें एचपीवी 16 और 18 को सर्वाइकल कैंसर के प्रमुख कारणों में शामिल माना जाता है, जबकि 6 और 11 अन्य एचपीवी संबंधी रोगों से जुड़े होते हैं.
* लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए उपयोगी
यह एक जेंडर-न्यूट्रल वैक्सीन है, जिसे 9 से 26 वर्ष आयु वर्ग के लड़के और लड़कियों दोनों को लगाया जा सकता है. भारत में इस वैक्सीन के उपयोग को औषधि नियंत्रक महानिदेशक (डीसीजीआई) पहले ही मंजूरी दे चुके हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एचपीवी टीकाकरण के व्यापक उपयोग से भविष्य में सर्वाइकल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है. डब्ल्यूएचओ की मान्यता मिलने के बाद इस स्वदेशी वैक्सीन की वैश्विक पहुंच और अधिक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.





