एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत पर रोक बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज की

* वर्ष 2020 के फैसले का हवाला देकर दोबारा विचार से इनकार
नई दिल्ली/दि. 23 – अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में 2018 में किए गए संशोधनों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को खारिज कर दी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि इन संशोधनों की संवैधानिक वैधता को अदालत 2020 में ही बरकरार रख चुकी है. इसलिए उसी मुद्दे पर दोबारा विचार करने का कोई आधार नहीं है. इस फैसले के साथ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामलों में अग्रिम जमानत पर लागू वैधानिक रोक तथा एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनिवार्यता नहीं होने संबंधी 2018 के प्रावधान कायम रहेंगे. धारा 18-ए के तहत पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है.
* याचिका में क्या आपत्ति उठाई गई थी?
याचिकाकर्ता ने 2018 के संशोधनों को संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 से जुड़े अधिकारों के विरुद्ध बताते हुए चुनौती दी थी. याचिका में यह भी दावा किया गया था कि कानून के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय और दिशानिर्देश आवश्यक हैं. याचिकाकर्ता ने अग्रिम जमानत पर रोक सहित कठोर प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग की थी.
* 2018 में क्यों किया गया था संशोधन?
मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में एससी-एसटी एक्ट के मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर कुछ सुरक्षा उपाय और सीमित परिस्थितियों में अग्रिम जमानत की गुंजाइश बताई गई थी. इसके बाद संसद ने 2018 में कानून में संशोधन कर धारा 18-ए जोड़ी. इस संशोधन के जरिए एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले अनुमति की आवश्यकता को हटाया गया तथा अग्रिम जमानत पर रोक संबंधी व्यवस्था बहाल की गई.
* 2020 के फैसले का फिर हवाला
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने फरवरी 2020 में पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले में 2018 के संशोधनों को बरकरार रखा था. साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि शिकायत में प्रथमदृष्टया एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध बनता ही नहीं है, तो न्यायालय को सीमित परिस्थितियों में हस्तक्षेप का अधिकार है. मंगलवार की सुनवाई में मौजूदा पीठ ने इसी पूर्व निर्णय और उसमें निर्धारित सुरक्षा उपायों का हवाला देते हुए 2018 के संशोधनों की संवैधानिकता पर दोबारा विचार करने से इनकार कर दिया.
* क्या स्थिति रहेगी?
एससी-एसटी एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक जारी रहेगी. एफआईआर दर्ज करने से पहले सामान्य प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं होगी. गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी. हालांकि, यदि शिकायत से प्रथमदृष्टया एससी-एसटी एक्ट का अपराध नहीं बनता, तो न्यायालय उपयुक्त राहत पर विचार कर सकता है. 2018 के संशोधनों की संवैधानिक वैधता पर 2020 में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला प्रभावी रहेगा.

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