मुर्हा देवी मंदिर को 800 वर्षों की ऐतिहासिक विरासत
महात्मा गांधी ने 29 दिसंबर 1933 को पत्र लिखकर किया था गौरव

नवरात्रि मेले में विदर्भ, खानदेश और मध्य प्रदेश से पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु
अंजनगांव सुर्जी/दि.13 – अमरावती जिले की अंजनगांव सुर्जी तहसील में सातपुड़ा पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा मुर्हा देवी गांव प्राचीन श्री जगदंबा देवी मंदिर के कारण धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी विशेष पहचान रखता है. लगभग 800 वर्षों की विरासत से जुड़ा यह मंदिर आदिवासी समाज की अटूट आस्था, महिलाओं के धार्मिक अधिकार और सामाजिक समानता की ऐतिहासिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है. प्रतिवर्ष शारदीय नवरात्रि के अवसर पर यहां भव्य मेला लगता है, जिसमें विदर्भ, खानदेश और मध्य प्रदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं आदिवासी समुदाय के लोग माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
* आदिवासी श्रद्धालुओं के लिए प्रकट हुईं जगदंबा माता
मुर्हा देवी मंदिर का इतिहास अनेक लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है. स्थानीय मान्यता के मुताबिक प्राचीन काल में सातपुड़ा पर्वत क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी एवं स्थानीय समुदाय के लोगों को जगदंबा माता के दर्शन के लिए नांदेड़ जिले के माहूर जाना पड़ता था. दुर्गम रास्तों और लंबी दूरी के कारण यह यात्रा कठिन थी ऐसी मान्यता है कि, भक्तों की श्रद्धा से प्रसन्न होकर स्वयं जगदंबा माता सातपुड़ा की तलहटी में स्थित मुर्हा गांव में प्रकट हुईं. स्थानीय धार्मिक परंपरा में मुर्हा देवी को माहूर की रेणुका माता और मेहर की शारदा माता की बहन माना जाता है. एक अन्य प्रचलित लोककथा के मुताबिक इस क्षेत्र में मुर्हा नामक दैत्य का आतंक था, उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए माता ने प्रकट होकर उसका संहार किया और उसे जंजीरों से बांधकर एक कुएं में कैद कर दिया. इसी दैत्य के नाम पर गांव और देवी का नाम मुर्हा देवी पड़ने की मान्यता प्रचलित है.
* महात्मा गांधी के पत्र से जुड़ा मंदिर का ऐतिहासिक गौरव
मुर्हा देवी मंदिर की विशेष पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है. इसका संबंध देश में अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक समानता के लिए चले ऐतिहासिक आंदोलन से भी जुड़ा है. महात्मा गांधी ने देशभर में अस्पृश्यता के विरुद्ध जनजागरण करते हुए समाज के वंचित वर्गों को मंदिरों में प्रवेश और समान धार्मिक अधिकार दिलाने की पहल की थी. इसी पृष्ठभूमि में मुर्हा देवी मंदिर को हरिजन समुदाय के लोगों के लिए खोला गया था. उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी के मुताबिक इस पहल की सराहना करते हुए महात्मा गांधी ने 29 दिसंबर 1933 को मुर्हा देवी संस्थान को एक विशेष पत्र लिखा था. गांधीजी के इस पत्र का उल्लेख मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को और भी विशेष बनाता है धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक भेदभाव को दूर करने तथा समानता का संदेश देने वाली इस परंपरा के कारण मुर्हा देवी मंदिर को क्षेत्र के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है.
* मंदिर की अनूठी परंपरा
मुर्हा देवी मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक है देवी के गर्भगृह में महिलाओं द्वारा पूजा-अर्चना किया जाना यहां गर्भगृह में पुरुषों के प्रवेश पर परंपरागत प्रतिबंध है और देवी की पूजा का अधिकार महिलाओं के पास है महिला पुजारियों की यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है जो इस मंदिर को एक अलग पहचान प्रदान करती है. मंदिर में विराजमान जगदंबा देवी की प्रतिमा काले पाषाण की बनी हुई है स्थानीय एवं प्रचलित जानकारी के मुताबिक यह प्रतिमा लगभग 800 वर्ष पुरानी मानी जाती है वर्षभर श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं संत झिंग्राजी महाराज के वास्तव्य और देवीभक्ति से भी इस देवस्थान को आध्यात्मिक महत्व प्राप्त होने की मान्यता है.
* शारदीय नवरात्रि में भक्ति का महासंगम, सजता है आस्था का मेला
हर वर्ष अश्विन माह में शारदीय नवरात्रि के दौरान मुर्हा देवी में भव्य मेले का आयोजन होता है. नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक उत्सव में विदर्भ, खानदेश और मध्य प्रदेश से श्रद्धालु तथा आदिवासी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में माता के दर्शन के लिए आते हैं. मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक गतिविधियों के कारण भक्तिमय वातावरण बना रहता है. नवरात्रि के अलावा चैत्र पूर्णिमा पर भी मंदिर में विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. मेले के दौरान गांव और आसपास के क्षेत्र में अस्थायी बाजार सजते हैं. कृषि उपयोग की वस्तुओं, दैनिक जरूरत के सामान, पारंपरिक कलाकृतियों और खानपान की दुकानों से मेले की रौनक बढ़ जाती है. इससे स्थानीय व्यापारियों और छोटे व्यवसायियों को भी रोजगार एवं आय के अवसर मिलते हैं.
* आस्था के साथ सामाजिक समरसता की विरासत
मुर्हा देवी का जगदंबा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लोकपरंपरा, आदिवासी संस्कृति, महिला सहभागिता और सामाजिक समानता की विरासत को संजोने वाला महत्वपूर्ण केंद्र है. देवी के प्रकट होने से जुड़ी कथाएं आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का आधार हैं. वहीं महात्मा गांधी के पत्र से जुड़ा इतिहास इस मंदिर के सामाजिक महत्व को रेखांकित करता है. सातपुड़ा की तलहटी में स्थित यह प्राचीन देवस्थान आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. नवरात्रि का मेला धार्मिक उत्सव के साथ-साथ मुर्हा गांव की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है. श्रद्धा, परंपरा और सामाजिक समरसता का यह संगम मुर्हा देवी मंदिर को विदर्भ के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में एक अलग स्थान प्रदान करता है.





