तलेगांव ठाकुर में रेणुका माता के दर्शन के लिए उमड़ रहे श्रद्धालु

नवरात्रि में सप्तशती पाठ, भजन-कीर्तन और महापूजा से भक्तिमय हुआ वातावरण

700 से 800 वर्ष पुराना मंदिर
तलेगांव ठाकुर/दि.13 – तिवसा तहसील के तलेगांव ठाकुर स्थित प्राचीन श्री रेणुका माता मंदिर में नवरात्रि के अवसर पर भक्तिमय वातावरण बना हुआ है. देवी को तलेगांव पंचकोशी की आराध्य और ठाकुर परिवार की कुलस्वामिनी के रूप में पूजा जाता है. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि माता के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना पूरी होती है. यही कारण है कि नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं.

* 700-800 साल पुरानी धार्मिक विरासत
श्री रेणुका माता मंदिर का इतिहास लगभग 700 से 800 वर्ष पुराना बताया जाता है. समय के साथ मंदिर ने भव्य स्वरूप धारण किया है. प्राचीन धार्मिक परंपराओं और स्थानीय श्रद्धा के कारण यह मंदिर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. मंदिर परिसर में रेणुका माता के दर्शन के साथ अन्य प्राचीन धार्मिक स्थलों के दर्शन का भी अवसर मिलता है. पूर्व दिशा में स्थित विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर, राम मंदिर, ऊंची पहाड़ी पर बना श्री दत्त मंदिर, श्री हरिहर मंदिर और मस्तराम बाबा की प्राचीन धूनी इस क्षेत्र की धार्मिक महत्ता बढ़ाते हैं.

* पिंगलाई नदी के किनारे आध्यात्मिक वातावरण
श्री रेणुका माता मंदिर सहित आसपास के कई मंदिर पिंगलाई नदी के किनारे स्थित हैं. सूर्योदय के समय सूर्य की किरणें मंदिर परिसर पर पड़ने से यहां का वातावरण मनमोहक दिखाई देता है. प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों का यह संगम श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.

* नवरात्रि में जप, तप और महापूजा
नवरात्रि के दौरान मंदिर में जप-तप, सप्तशती पाठ, भजन-कीर्तन, होम-हवन, महापूजा और आरती सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. सुबह से शाम तक मंदिर में श्रद्धालुओं की उपस्थिति बनी रहती है. मंदिर परिसर को स्वच्छ और आकर्षक बनाए रखने पर भी ध्यान दिया जा रहा है. अशोक भारती महाराज के मार्गदर्शन में मंदिर की धार्मिक गतिविधियों और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी निभाई जा रही है. तलेगांव ठाकुर का श्री रेणुका माता मंदिर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है. नवरात्रि के दौरान यहां होने वाले धार्मिक अनुष्ठान इस परंपरा को और अधिक जीवंत बनाते हैं.

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