परतवाडा अश्लील वीडियो मामले में आरोपी छात्र को हाईकोर्ट से जमानत

मामले में अब तक कोई पीडिता नहीं आयी सामने

* परतवाडा सहित ग्रामीण पुलिस की जांच पर उठे गंभीर सवाल
* सह-आरोपी के बयान के आधार पर हुई गिरफ्तारी पर अदालत ने जताई आपत्ति
अमरावती/नागपुर/ दि.12 – परतवाड़ा के चर्चित कथित अश्लील वीडियो वायरल प्रकरण में गिरफ्तार 20 वर्षीय छात्र मानव दीपकराव सुगंधे को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने आज नियमित जमानत देना मंजूर किया. जिसके बाद इस पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है. एक ओर अदालत ने आरोपी के खिलाफ ठोस साक्ष्यों के अभाव का उल्लेख किया है, वहीं दूसरी ओर इस मामले की जांच कर रही परतवाड़ा पुलिस और अमरावती जिला ग्रामीण पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. जिस मामले को पुलिस ने अत्यंत संवेदनशील बताते हुए पॉक्सो एक्ट, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया था, उसी मामले में अदालत ने पाया कि आरोपी को मुख्य रूप से सह-आरोपी के बयान के आधार पर आरोपी बनाया गया है. इसके बाद पुलिस की जांच की गुणवत्ता और साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं.
* क्या है पूरा मामला?
परतवाड़ा पुलिस स्टेशन में अपराध क्रमांक 291/2026 के तहत मामला दर्ज किया गया था. पुलिस के अनुसार टेलीग्राम एप के माध्यम से कुछ युवतियों और नाबालिग लड़कियों के आपत्तिजनक फोटो एवं वीडियो उनकी सहमति के बिना प्रसारित किए जाने की शिकायत प्राप्त हुई थी. शिकायत के आधार पर पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की और कुछ युवकों को आरोपी बनाया. इनमें छात्र मानव सुगंधे का भी नाम शामिल किया गया.
* हाईकोर्ट ने किन आधारों पर दी जमानत?
आरोपी की ओर से अदालत में प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि मानव सुगंधे का कथित वीडियो निर्माण या प्रसारण से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है. उसे केवल सह-आरोपी के कथित बयान के आधार पर मामले में शामिल किया गया है. बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि मानव 20 वर्षीय छात्र है तथा उसकी परीक्षाएं 20 जून से शुरू होने वाली हैं. ऐसे में उसे अनावश्यक रूप से जेल में रखना उसके शैक्षणिक भविष्य को प्रभावित करेगा.
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम. एम. नेरलिकर ने पाया कि जांच एजेंसी की ओर से आरोपी के खिलाफ कोई ऐसा प्रत्यक्ष और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे उसकी सीधी संलिप्तता सिद्ध हो सके. अदालत ने छात्र की आयु, शिक्षा और आगामी परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए उसे नियमित जमानत प्रदान कर दी.
* 50 हजार के मुचलके पर मिली रिहाई
अदालत ने मानव सुगंधे को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के दो जमानतदारों पर रिहा करने का आदेश दिया है. साथ ही अदालत ने कुछ सख्त शर्तें भी लगाई हैं कि, आरोपी किसी भी तरह से साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा. किसी गवाह को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा. पुलिस को अपना वर्तमान पता और मोबाइल नंबर उपलब्ध कराएगा. प्रत्येक सोमवार को संबंधित पुलिस थाने में उपस्थित रहेगा. जांच में पूर्ण सहयोग करेगा.
* सबसे बड़ा सवाल: अब तक कोई पीड़िता क्यों नहीं आई सामने?
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित पहलू यह है कि मामला दर्ज होने, गिरफ्तारी होने और कई दिनों तक व्यापक चर्चा में रहने के बावजूद अब तक कोई भी कथित पीड़िता सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है. पुलिस ने दावा किया था कि कुछ युवतियों और नाबालिग लड़कियों के आपत्तिजनक वीडियो और फोटो वायरल किए गए, लेकिन अब तक न तो किसी पीड़िता का सार्वजनिक बयान सामने आया है और न ही पुलिस की ओर से ऐसी कोई स्पष्ट जानकारी दी गई है जिससे आरोपों की गंभीरता को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित किया जा सके. यही कारण है कि अब स्थानीय स्तर पर पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता और जांच की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
* ग्रामीण पुलिस की जांच पर उठे सवाल
हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच एजेंसी के पास पर्याप्त डिजिटल साक्ष्य, फॉरेंसिक रिपोर्ट अथवा प्रत्यक्ष प्रमाण होते तो अदालत को आरोपी के खिलाफ ठोस सामग्री नहीं होने की टिप्पणी नहीं करनी पड़ती. विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराध और डिजिटल कंटेंट से जुड़े मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. मोबाइल डेटा, चैट रिकॉर्ड, सर्वर लॉग, डिजिटल ट्रेसिंग और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर जांच को मजबूत बनाया जाता है. यदि इन पहलुओं पर पर्याप्त कार्य नहीं हुआ है तो यह जांच एजेंसी की गंभीर कमजोरी मानी जा सकती है.
* क्या केवल सह-आरोपी के बयान पर हुई गिरफ्तारी?
अदालत में हुई सुनवाई से यह तथ्य भी सामने आया कि आरोपी के खिलाफ प्रमुख आधार सह-आरोपी का बयान था. कानूनी जानकारों के अनुसार केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर किसी व्यक्ति की संलिप्तता सिद्ध नहीं मानी जाती, जब तक उसके समर्थन में स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य मौजूद न हों. यही कारण है कि हाईकोर्ट ने मामले में आरोपी को राहत देते हुए जांच एजेंसी के समक्ष अप्रत्यक्ष रूप से साक्ष्यों की मजबूती का प्रश्न खड़ा कर दिया है.
* जांच पूरी होने तक बरकरार रहेंगे सवाल
हालांकि पुलिस का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है और आरोपपत्र दाखिल होना बाकी है. इसलिए अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. लेकिन हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद यह मामला केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस जांच की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर भी बहस का विषय बन गया है.
* इस मामले में उठ रहे प्रमुख सवाल
अब तक कोई कथित पीड़िता सामने क्यों नहीं आई. आरोपी के खिलाफ पुलिस के पास कौन से प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं. क्या गिरफ्तारी केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर की गई. डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों की स्थिति क्या है. आरोपपत्र में पुलिस कौन से नए तथ्य पेश करेगी. क्या जांच एजेंसी अदालत में अपने आरोपों को सिद्ध कर पाएगी.
* नजरें अब आरोपपत्र पर
फिलहाल पूरे मामले में सभी की नजरें पुलिस द्वारा दाखिल किए जाने वाले आरोपपत्र पर टिकी हैं. यदि जांच एजेंसी मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत करती है तो मामला नई दिशा ले सकता है, लेकिन यदि अदालत में भी ठोस प्रमाणों का अभाव बना रहता है तो यह प्रकरण जिला ग्रामीण पुलिस की जांच पद्धति पर और बड़े सवाल खड़े कर सकता है. फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश ने आरोपी छात्र को राहत जरूर दी है, लेकिन इस पूरे मामले को लेकर उठ रहे प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं.

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