‘उस’ बाघिन अंगों के नमूने भेजे गए नागपुर की लैब में
लैब की रिपोर्ट बताएगी ‘पिंकी’ की मौत की असली वजह

* लैब की रिपोर्ट बताएगी ‘पिंकी’ की मौत की असली वजह
* हिस्टोपैथोलॉजी-टॉक्सिकोलॉजी जांच से खुलेगा मौत का राज
* पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
अमरावती/दि.9 – चार लोगों की जान लेने वाली बाघिन ‘पिंकी’ की जेरबंदी के बाद हुई मौत का वास्तविक कारण अब नागपुर स्थित न्यायवैद्यक प्रयोगशाला की जांच रिपोर्ट से सामने आने की उम्मीद है. पोस्टमार्टम के बाद बाघिन के विभिन्न अंगों और ऊतकों के नमूने हिस्टोपैथोलॉजी और टॉक्सिकोलॉजी जांच के लिए नागपुर भेजे गए हैं. प्रारंभिक पोस्टमार्टम में मौत का कारण ‘कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर’ यानी हृदय और श्वास-प्रश्वास की क्रिया बंद होना बताया गया है. हालांकि, यह अंतिम निष्कर्ष नहीं है. न्यायवैद्यक जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि बाघिन की मौत किसी बीमारी, दवा की प्रतिक्रिया, ट्रैंक्युलाइजेशन से जुड़ी जटिलता या किसी अन्य कारण से हुई. रिपोर्ट आने के बाद ही मौत की परिस्थितियों को लेकर उठ रहे सवालों पर स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी.
* पोस्टमार्टम के बाद किया गया अंतिम संस्कार
बता दे कि, सोमवार देर शाम मृत बाघिन के शव को परतवाड़ा वन डिपो परिसर स्थित ट्रांजिट ट्रीटमेंट सेंटर लाया गया था. मंगलवार सुबह अचलपुर के पशु चिकित्सकीय अधिकारी डॉ. चंद्रशेखर धंदर की टीम ने क्षेत्र संचालक ज्योति बैनर्जी की उपस्थिति में शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोपहर करीब 12.30 बजे सेंटर के समीप ही बाघिन का अंतिम संस्कार किए जाने की जानकारी है. अंतिम संस्कार में चुनिंदा वन अधिकारियों की मौजूदगी बताई जा रही है. इसी प्रक्रिया को लेकर भी वन्यजीव प्रेमियों की ओर से पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं. उनका कहना है कि इतने संवेदनशील मामले में पोस्टमार्टम, नमूने सुरक्षित करने और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया का स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए. हालांकि, इस संबंध में वन विभाग की ओर से निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई किए जाने की बात कही गई है. अंतिम संस्कार को लेकर उठ रहे सवालों पर भी आधिकारिक स्पष्टीकरण अपेक्षित है.
* तीन डार्ट को लेकर भी जांच की मांग
बाघिन को ट्रैंक्युलाइज किए जाने की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं. प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि पुणे की रेस्क्यू टीम के साथ चंद्रपुर और अमरावती के वडाली वन विभाग की टीम ने बाघिन पर एक साथ तीन डार्ट दागे. इनमें एक डार्ट गर्दन के पास, दूसरा पेट और तीसरा पिछले हिस्से में लगने की बात कही जा रही है. दावा है कि डार्ट लगने के बाद बाघिन तत्काल बेहोश हो गई और उसके बाद उसने दोबारा आंखें नहीं खोलीं. हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है. इसलिए तीन डार्ट में किस दवा का इस्तेमाल हुआ, प्रत्येक डार्ट में कितनी मात्रा थी, कुल कितनी मात्रा शरीर में गई और उसका बाघिन की मौत से कोई संबंध था या नहीं, इन सभी सवालों का जवाब वैज्ञानिक जांच से ही मिल सकेगा.
विशेषज्ञों के अनुसार ट्रैंक्युलाइजेशन के दौरान दवा की मात्रा का निर्धारण पशु के अनुमानित वजन, उम्र, स्वास्थ्य और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है. इसलिए केवल डार्ट की संख्या के आधार पर मौत का कारण तय नहीं किया जा सकता. यही वजह है कि टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण होगी.
* पहली बार मवेशी के शिकार के बाद ही कार्रवाई की मांग
वन्यजीव प्रेमियों का यह भी कहना है कि ‘पिंकी’ द्वारा पहली बार बकरी का शिकार किए जाने के बाद ही उसकी गतिविधियों को गंभीरता से लेते हुए निगरानी और रोकथाम के उपाय तेज कर दिए जाने चाहिए थे. उनका आरोप है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए जाने के कारण स्थिति बिगड़ती गई और बाद में तीन अन्य लोगों सहित कुल चार नागरिकों की जान चली गई. हालांकि, इस आरोप की भी प्रशासनिक और वन विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर जांच आवश्यक है. यह पता लगाया जाना चाहिए कि बाघिन की मौजूदगी और उसकी गतिविधियों की सूचना विभाग को कब-कब मिली, उसके बाद कौन-कौन से कदम उठाए गए और उसे पकड़ने की कार्रवाई किस आधार पर और कब शुरू की गई. यदि कहीं देरी या समन्वय की कमी सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. वहीं यदि विभाग ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार समय पर कार्रवाई की थी तो तथ्य सामने रखकर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए.
* गड़चिरोली के बाघ को दो माह से टीटीसी में रखने पर भी सवाल
‘पिंकी’ की मौत के साथ ही वन्यजीवों को लंबे समय तक बंद परिसर में रखने का मुद्दा भी चर्चा में आ गया है. करीब दो महीने पहले इसी तरह मानव बस्तियों में आतंक पैदा करने वाले गड़चिरोली के एक नरभक्षी बाघ को पकड़कर परतवाड़ा के ट्रांजिट ट्रीटमेंट सेंटर में रखा गया था. बताया जाता है कि वह अब भी वहीं है. इस बाघ को अब तक प्राकृतिक अधिवास में क्यों नहीं छोड़ा गया अथवा उसके संबंध में आगे क्या निर्णय लिया गया, इसकी स्पष्ट आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आने से वन्यजीव प्रेमियों में सवाल उठ रहे हैं. प्राकृतिक आवास में रहने वाले बाघ को लंबे समय तक सीमित परिसर में रखने के दौरान उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति की निगरानी कैसे की जा रही है, यह भी महत्वपूर्ण विषय है. यदि किसी वन्यजीव को लंबे समय तक रेस्क्यू सेंटर में रखना आवश्यक है तो उसके पीछे वैज्ञानिक कारण और उपचार योजना स्पष्ट होनी चाहिए. साथ ही, पुनर्वास या प्राकृतिक अधिवास में छोड़े जाने के संबंध में भी विशेषज्ञों की राय और निर्धारित प्रोटोकॉल की जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए.
* अब अंतिम रिपोर्ट पर टिकी सभी की निगाहें
‘पिंकी’ की मौत को लेकर फिलहाल कई दावे और सवाल सामने हैं, लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक जांच पूरी होना जरूरी है. पोस्टमार्टम में सामने आया कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर मौत की तत्काल चिकित्सकीय स्थिति बता सकता है, लेकिन उसके पीछे का मूल कारण क्या था, यह हिस्टोपैथोलॉजी और टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट से स्पष्ट होने की उम्मीद है. इसलिए अब सबसे जरूरी है कि जांच निष्पक्ष, वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से पूरी हो. दवाओं का रिकॉर्ड, ट्रैंक्युलाइजेशन की पूरी प्रक्रिया, बाघिन की मेडिकल हिस्ट्री, उपचार के दौरान की निगरानी, परिवहन और पोस्टमार्टम से संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखे जाएं. ‘पिंकी’ ने चार लोगों की जान ली थी, इसलिए उसकी जेरबंदी जरूरी थी. लेकिन जेरबंदी के बाद उसकी मौत क्यों हुई, इस सवाल का जवाब भी उतनी ही गंभीरता से तलाशना होगा. अंतिम रिपोर्ट केवल पिंकी की मौत का कारण नहीं बताएगी, बल्कि भविष्य में ऐसे रेस्क्यू अभियानों को अधिक सुरक्षित और वैज्ञानिक बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.





