असमानता वाला विकास टिकाउं नहीं
जस्टिस भूषण गवई का कहना

नागपुर/दि.15 – विकास और समानता ये दो अवधारणाएँ एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं. समानता के बिना कोई भी विकास वास्तविक अर्थों में टिकाऊ नहीं हो सकता, ऐसा मत भूषण गवई ने मंगलवार को व्यक्त किया. हैदराबाद स्थित भारतीय विधि विद्यापीठ में आयोजित डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर स्मृति व्याख्यान में ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट और सबस्टैंटिव इक्वैलिटी’ विषय पर वे बोल रहे थे.
* विकास केवल आर्थिक प्रगति नहीं
गवई ने कहा कि केवल कानून में समानता पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को वास्तविक समान अवसर देने के लिए ठोस कदम आवश्यक हैं. विकास की अवधारणा को केवल आर्थिक प्रगति और बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रखा जा सकता. विकास न्यायसंगत, समावेशी और सभी को समान लाभ देने वाला होना चाहिए. महाराष्ट्र के उदाहरण देते हुए उन्होंने विदर्भ में किसानों की आत्महत्याएँ, अनियमित बारिश से होने वाला नुकसान और गन्ना काटने वाली महिला मजदूरों पर हो रहे अन्याय का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय और आर्थिक संकटों का प्रभाव सभी पर समान नहीं होता, बल्कि गरीब और आदिवासी समुदाय को सबसे अधिक नुकसान होता है. शहरी विकास मॉडल पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, शहर मजदूरों के श्रम पर खड़े हैं, लेकिन उन्हें ही बुनियादी सुविधाएँ और आवास नहीं मिलता.
* असमानता बढ़ाने वाला विकास टिकाऊ नहीं
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि विकास असमानता बढ़ाता है, तो वह टिकाऊ नहीं हो सकता. संवैधानिक दृष्टिकोण समझाते हुए उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और मानवीय गरिमा आपस में जुड़े हुए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में पर्यावरणीय अधिकार भी शामिल हैं, जिसे न्यायालयों ने मान्यता दी है. ऐतिहासिक असमानताओं को बनाए रखने वाला विकास भविष्य में टिकाऊ नहीं हो सकता. इसलिए नीति निर्माण में सामाजिक न्याय, समान अवसर और कमजोर वर्गों को केंद्र में रखना आवश्यक है.
* ‘वन साइज फिट्स ऑल’ नीति असफल
डॉ. आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए गवई ने राजनीतिक समानता और सामाजिक-आर्थिक असमानता के बीच के विरोधाभास को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट का प्रभाव गरीब, आदिवासी और श्रमिक वर्ग पर अधिक पड़ता है. इसलिए ‘वन साइज फिट्स ऑल’ नीति असफल होती है और नीतियों में वंचित वर्गों का विशेष ध्यान रखना जरूरी है. साथ ही उन्होंने विश्वविद्यालयों को संवैधानिक प्रयोगशाला की तरह काम करने की सलाह दी, जहाँ मजदूरों के लिए बुनियादी सुविधाएँ, स्वास्थ्य सुरक्षा और शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए जाएँ.





