लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे की सुपुत्री कॉमरेड शांताबाई साठे का निधन
90 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस, अंत तक स्वाभिमान बनाए रखा

मुंबई./दि.9- लोकशाहीर कॉमरेड अन्नाभाऊ साठे की सुपुत्री और कम्युनिस्ट आंदोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता कॉ. शांताबाई साठे (दोडके) का 4 मई को दोपहर 5 बजे कांदिवली (मुंबई) के एक निजी अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वह 90 वर्ष की थीं. उनके निधन से अन्नाभाऊ के विचारों की विरासत को संजोने वाली एक स्वाभिमानी कड़ी टूट जाने की भावना व्यक्त की जा रही है. शांताबाई अविवाहित थीं. उनके परिवार में छोटी बहन शकुंतला, भतीजे, भांजी और नाती-पोते हैं.
* बचपन से ही आंदोलन के संस्कार
कॉ. शांताबाई, अन्नाभाऊ की पत्नी कॉ. जयवंताबाई की बेटी थीं. बचपन से ही उन पर कम्युनिस्ट पार्टी के संस्कार थे. उन्होंने ’बाल संघ’ और तत्कालीन ’लाल बावटा कला पथक’ के लिए कार्य किया. उस समय उन्होंने कॉ. डांगे की बेटी रोज़ा देशपांडे, कॉ. आर. बी. मोरे के बेटे सत्येंद्र व कमल, पूर्व महापौर कॉ. मिरजकर के बेटे प्रभाकर और कॉ. सुमन मोकाशी के साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
* जेल यात्रा और श्रमिक आंदोलन
1949 के दौरान जब कम्युनिस्ट पार्टी पर दमन चक्र चल रहा था, तब शांताबाई ने कुछ महीने जेल में भी बिताए. परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण मात्र 16 वर्ष की आयु में उन्होंने एक दवा कंपनी में नौकरी कर ली. नौकरी के साथ-साथ वह पार्टी के श्रमिक संगठन का काम देखती थीं.
* मानवीयता और पारिवारिक लगाव
शांताबाई का व्यक्तित्व अत्यंत संवेदनशील और प्रेमपूर्ण था. अपनी अल्प आय में से वह हर महीने वाटेगांव में अन्नाभाऊ की पहली पत्नी (कोंडाबाई) को आर्थिक सहायता भेजती थीं. अन्नाभाऊ के पहले परिवार के साथ, विशेषकर उनके बेटे मधुकर के साथ उनके अत्यंत घनिष्ठ संबंध थे.
* साहित्य और रंगमंच में योगदान
वह अन्नाभाऊ की कहानियों, उपन्यासों और लोकनाट्यों की पहली पाठक हुआ करती थीं. शाहीर अमर शेख और शाहीर दत्ता गव्हाणकर के कलापथक में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की. 70 के दशक में ’काई चालं न गा’ लोकनाट्य में उन्होंने अभिनय किया. 1986 में ’लोकमंच’ संस्था के प्रसिद्ध लोकनाट्य ’अकलेची गोष्ट’ में निर्देशन सहायता और अभिनय किया.
* अंत तक स्वाभिमान बनाए रखा
वृद्धावस्था में कलाकार पेंशन प्राप्त करने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. शासन के सामने उन्होंने कभी ’जी हुजूरी’ नहीं की. लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे की इस बेटी को समाज से जो मान-सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला, इसका मलाल उन्हें अंत तक था. फिर भी उन्होंने अपना स्वाभिमान और श्रमिक आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता अंतिम सांस तक निभाई.





