महाराष्ट्र के संत साहित्य व लोक संगीत का पूरे विश्व में कोई सानी नहीं
ख्यातनाम गायक व लोक कलाकार अवधूत गांधी का अमरावती मंडल के साथ विशेष बातचीत में कथन

* अपनी संगीत यात्रा के साथ ही परिवार के साथ जुडी संत परंपरा को लेकर दी जानकारी
* शोध प्रतिष्ठान के निमंत्रण पर छत्रपति संभाजी महाराज जयंती उत्सव में शिरकत करने अमरावती आए थे अवधूत गांधी
अमरावती/दि.15- संगीत की अपनी एक अलग दुनिया है, जिसे भौगोलिक सहित किसी भी अन्य बंधन या सीमा में बांधा नहीं जा सकता. बल्कि स्थान व काल के अनुरूप संगीत के अपने अलग-अलग रंग व ढंग जरूर होते हैं, जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में लोक संगीत कहा जाता है. इसके साथ स्थान विशेष में बोली जानेवाली स्थानीय बोली एवं वहां की लोक संस्कृति की सौंधी महक जुडी होती है. प्रत्येक स्थान के लोक संगीत के साथ वहां का स्थानीय साहित्य भी जुडा होता है. इस मामले में महाराष्ट्र को लोक संगीत थोडा अलग कहा जा सकता है, क्योंकि महाराष्ट्रीयन लोक संगीत के साथ आम जनमानस को प्रभावित करनेवाले संत साहित्य का बडे पैमाने पर जुडाव एवं प्रभाव है. यही वजह है कि महाराष्ट्र के लोक संगीत एवं संत साहित्य का पूरी दुनिया में कहीं कोई सानी नहीं है. इस आशय का प्रतिपादन महाराष्ट्र के ख्यातनाम वारकरी लोक संगीत गायक, गीतकार व संगीतकार अवधूत गांधी द्बारा किया गया.
गत रोज छत्रपति संभाजी महाराज स्मारक समिति एवं शोध प्रतिष्ठान द्बारा छत्रपति संभाजी महाराज के जयंती दिवस उपलक्ष्य में नवसारी चौक स्थित छत्रपति संभाजी महाराज स्मृति अभिवादन समारोह में हिस्सा लेने हेतु अमरावती पधारे अवधूत गांधी ने दैनिक ‘अमरावती मंडल’ के साथ विशेष तौर पर बातचीत करते हुए अपना विस्तृत साक्षात्कार दिया, जिसमें उपरोक्त प्रतिपादन करने के साथ ही अवधूत गांधी ने अपने परिवार में चलनेवाली संत सेवा की परंपरा के साथ ही लोकसंगीत के क्षेत्र से अपने जुडाव तथा किसी के जरिए फिल्मों एवं संगीत नाटकों में किए गए अपने कार्यों के बारे में बडे ही विस्तार के साथ जानकारी दी.
इस बातचीत में अवधूत गांधी ने बताया कि वे मूलत: संतश्रेष्ठ श्री संत ज्ञानेश्वर माउली की संजीवन समाधि वाले श्रीक्षेत्र आलंदी से वास्ता रखते हैं और उनका परिवार संत ज्ञानेश्वर की माता की वंशावली के पुजारी परिवार का वंशज हैं, जिसमें संत श्री नरसिंहस्वामी महाराज भी हुए थे, जिनकी समाधि आलंदी में ही स्थित है और उसी समाधि के पास आज उनके परिवार का निवास है, जिसे आश्रम या मठ कहा जाता है. उस समाधि की सेवा आज उनके परिवार की छठवीं पीढी द्बारा की जा रही है. अपने परिवार द्बारा संचालित मठ की महत्ता बताते हुए अवधूत गांधी ने कहा कि श्रीक्षेत्र आलंदी से आषाढी व कार्तिक एकादशी पर पंढरपुर हेतु रवाना होनेवाली संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर माउली की पालखी का पहला विश्राम उनके परिवार द्बारा सेवा किए जानेवाले मठ में ही रहता है.
इस बातचीत में अवधूत गांधी ने बताया कि संत ज्ञानेश्वर महाराज की माता के वंश से वास्ता रखनेवाले पूजारी परिवार से रहने के चलते उन्हें संत सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और वे विगत करीब तीन दशकों से श्री नरसिंह स्वामी महाराज की समाधी की सेवा व देखरेख कर रहे हैं. दैनंदिन पूजन कार्य एवं संत सेवा के साथ-साथ संगीत के साथ अपने जुडाव और लोकसंगीत के क्षेत्र में अपनी सक्रियता के बारे में बात करते हुए अवधूत गांधी ने बताया कि वे जब छोटे बच्चे थे, तब उनकी मां उन्हें लोरी के तौर पर नारदीय एवं वारकरी परंपरा के गीत सुनाया करती थी. साथ ही युुवावस्था के दौरान जब वे मठ के दिनक्रमानुसार सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक श्री नरसिंहस्वामी महाराज की समाधि की सेवा में लगे रहते थे, तो वॉकमैन लगाकर पंडित भीमसेन जोशी व पंडित जितेंद्र अभिषेकी जैसे महान शास्त्रीय गायकों के गीत सुना करते थे, जिसके चलते धीरे-धीरे उनमें गीत व संगीत को लेकर रूचि व समझ विकसित होने लगी. इसके साथ ही उनका संबंध महाराष्ट्र के बेहद ख्यातनाम लोकशाहीर व पोवाडा गायक महादेवराव नानवडेकर व उनके पोते गुरूप्रसाद नानवडेकर के साथ आया, जिनके साथ वे कई कार्यक्रमों में ढोलक बजाने हेतु जाया करते थे. इसी तरह लोकसंगीत के ही एक प्रकार भारूड के महान कलाकार हभप विठ्ठल महाराज भोकसे तथा भारूड में डॉक्टरेट करने के साथ ही संत साहित्य एवं वारकरी साहित्य का अच्छा-खासा अध्ययन रहनेवाले डॉ. रामचंद्र देखणे का भी सानिध्य उन्हें प्राप्त हुआ, जिसके चलते उनके भीतर अपने-आप लोकसंगीत की कला विकसित होती चली गई और वे लोकसंगीत कलाकार के रूप में विविध मंचों पर अपनी कला प्रस्तुति देने लगे. साथ ही साथ इस दौरान उनका महाराष्ट्र की लोक संगीत परंपरा का ही हिस्सा रहनेवाले नाट्य संगीत एवं संगीत नाटकों से भी गहरा जुडा हुआ, जिसके चलते उनकी कला का दायरा और भी अधिक विस्तृत हुआ.
मराठी लोक संगीत को मराठी फिल्मों तक लाने के बारे में पूछे गए सवाल को लेकर अवधूत गांधी का कहना रहा कि महाराष्ट्र का लोकसंगीत हमेशा से ही मराठी फिल्मों के संगीत का हिस्सा रहा है और कई संगीतकारों ने अपनी धुनों में मराठी लोक संगीत का ही प्रयोग किया है. नाट्य संगीत एवं संगीत नाटकों में काम करने के दौरान ख्यातनाम दिग्दर्शक, गीतकार व अभिनेता दिग्पाल लांजेकर के साथ हुई अपनी मित्रता का उल्लेख करते हुए अवधूत गांधी ने बताया कि दिग्पाल लांजेकर के साथ हुई मित्रता के चलते ही उनका वर्ष 2010 में प्रदर्शित मराठी फिल्म ‘टारगेट’ से बतौर गायक व गीतकार डेब्यू हुआ था. बहुत बडी स्टारकास्ट वाली उस फिल्म में उन्होंने वेस्टर्न स्टाइल के दो गीत गाए थे और एक गोंधल के पद लिखे थे. इसके उपरांत उन्होंने वर्ष 2016 में प्रदर्शीत मराठी फिल्म ‘वाय-झेड’ में एक लोकगीत गाने के साथ ही वर्ष 2017-18 में प्रदर्शित ‘शिवराज अष्टक’ की दूसरी फिल्म ‘फत्त ेशिकस्त’ में संत तुकाराम महाराज के अभंगों को गीत के तौर पर गाया था, जो काफी प्रचलित हुए थे. इस बातचीत में अवधूत गांधी ने इस बात का भी विशेष तौर उल्लेख किया कि उनके मित्र रहनेवाले दिग्दर्शक, गीतकार व अभिनेता दिग्पाल लांजेकर द्बारा ही छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन कार्यों एवं शिवकालीन इतिहास से महाराष्ट्र सहित देश व दुनिया को परिचित कराने हेतु ‘शिवराज अष्टक’ के तहत 8 फिल्मों के निर्माण का संकल्प लिया गया है तथा इस श्रृंखला के तहत निर्मित होनेवाली प्रत्येक फिल्म में उनकी कहीं ना कहीं कोई भूमिका जरूर है.
इसके साथ ही संगीत नाटकों के साथ ही मराठी धारावाहिकों में अपनी सक्रियता के बारे में जानकारी देते हुए अवधूत गांधी ने बताया कि संगीत नाटकों में काम करने का सिलसिला 2006 से शुरू हुआ था, जो अब भी जारी है. इस दौरान उन्होंने कई नाटकों में संगीत देने के साथ-साथ प्रमुख भुमिकाएं भी निभाई. साथ ही संत साईंबाबा धारावाहिक में दास गणू का किरदार निभाने के साथ ही संत ज्ञानेश्वर मालिका में क्रिएटीव हेड का जिम्मा संभालते हुए एक भूमिका भी निभाई थी. इसके अलावा वारकरी साहित्य व संगीत से पूरी दुनिया को परिचित कराने हेतु उन्होंने ‘द वारकरीज – एक्स्टसी थ्रू म्युझिक’ नामक एक विशेष संगीत अलबम भी बनाया था, जिसे अंडरस्कोअर रिकॉर्डस के लेबल अंतर्गत जारी किया गया था.
संत सेवा के चलते अपने जीवन में आश्चर्यजनक रूप से कई सकारात्मक बदलाव एवं चमत्कार होने का दावा करते हुए अवधूत गांधी ने बताया कि वे वर्ष 1999 से संगीत के क्षेत्र में सक्रिय हो चुके थे और उन्हें कई बार रिकॉर्डिग के लिए आलंदी से पुणे जाना होता था. परंतु परिवार में संत सेवा की परंपरा रहने और उनके हिस्से में रोजाना श्री नरसिंहस्वामी महाराज की समाधि की सेवा का जिम्मा रहने के चलते वे कई बार रिकॉर्डिंग के लिए पुणे नहीं जा पाते थे और खुद को यह सोचकर समझाया करते थे कि संगीत के क्षेत्र में उनका कुछ नहीं हो सकता है, क्योंकि वे पुणे नहीं जा सकते हैं और पुणे से रिकॉर्डिग स्टुडियो आलंदी नहीं आ सकता है. शायद यह बात उनके आराध्य श्री नरसिंहस्वामी महाराज को पता चल गई, जिसके बाद एक चमत्कार हुआ. घटना दरसल ऐसी थी कि उन्होंने वर्ष 2010 में पुणे में आयोजित ‘बाजा-गाजा’ नामक कार्यक्रम में हिस्सा लेेकर वारकरी संगीत की प्रस्तुति दी थी. उस कार्यक्रम में महान गायिका पद्मभूषण शुभा मुद्गल सहित उनकी टीम में शामिल हार्मोनियम वादक सुधीर नायक व तबला वादक अनिश प्रधान भी उपस्थित थे, जिन्होंने उनसे यह जानना चाहा कि क्या इस वारकरी संगीत को रिकॉर्डबध्द किया गया है और जैसे ही शुभा मुद्गल को यह पता चला कि इस संगीत को कहीं भी रिकॉर्ड नहीं किया गया है, तो उन्होंने तुरंत ही उन गीतों व संगीत की सीडी बनाने का निर्णय लिया और अचानक ही यह तय हुआ कि यह पूरी रिकॉर्डिंग पुणे की किसी स्टुडियो की बजाय आलंदी के किसी मठ या मंदिर में की जाएगी. जिसके बाद साउंड इंजिनियरों ने आलंदी आकर श्री नरसिंहस्वामी महाराज के समाधि मंदिर का मुआयना करते हुए उस जगह को रिकॉर्डिंग के लिए पूरी तरह से योग्य बताया. इसके उपरांत पुणे से रिकॉर्डिंग के पूरे स्टूडियो को आलंदी शिफ्ट करते हुए एकादशीवाले दिन मठ में पूरी रिकॉर्डिंग की गई. साथ ही वहां पर महान गायिका पद्मभूषण शुभा मुद्गल ने उनका करीब 2 घंटे तक साक्षात्कार लेने के उपरांत दो नामांकित अंग्रेजी अखबारों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अपने लेख भी प्रकाशित किए. उस दिन उन्हें यह महसूस हुआ, मानों खुद श्री नरसिंहस्वामी महाराज ने उनके लिए रिकॉर्डिंग स्टुडियो को पुणे से आलंदी स्थित मठ में शिफ्ट करवाया था.
वारकरी संगीत सहित महाराष्ट्र के लोकसंगीत एवं भारतीय संगीत के भविष्य को लेकर बेहद आशान्वित रहनेवाले अवधूत गांधी ने कहा कि इन दिनों युवा पीढी शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत की ओर बडी तेजी से आकर्षित हो रही है तथा नई पीढी के गायकों, गीतकारक व संगीतकारों द्बारा लोकसंगीत की ओर अच्छा-खासा ध्यान दिया जा रहा है, जिसके चलते लोक संगीत के नए कलाकारों को भी अच्छे खासे मंच मिलने लगे हैं और लोकसंगीत का दायरा भी बढ रहा है. यही वजह है कि कई विद्यापीठों में लोकसंगीत को लेकर पाठ्यक्रम व प्रशिक्षण भी शुरू हो गया है. ख्यातनाम संगीतकार अजय-अतुल का इसमें जबरदस्त योगदान रहने का विशेष उल्लेख करते हुए अवधूत गांधी ने कहा कि अजय-अतुल ने हिंदी व मराठी फिल्मों में दिए अपने संगीत के जरिए एक नए तरिके का ट्रेंड सेट किया है, जिसके चलते मराठी लोक संगीत के लिए अब अच्छे दिन आए हैं.
इस बातचीत के दौरान आलंदी व पंढरपुर के साथ अमरावती के रहनेवाले संबंधों से खुद को पूरी तरह परिचित बताते हुए अवधूत गांधी ने कहा कि उनकी माताजी मूलत: श्रीक्षेत्र पंढरपुर से वास्ता रखती हैं, जिनके परिवार में माता रूक्मिणी की सेवा की परंपरा रही है, जिसके चलते उन्हें पूरी तरह से ज्ञात है कि माता रूक्मिणी का मायका अमरावती के श्रीक्षेत्र कौंडण्यपुर में स्थित है. साथ ही वे यह भी जानते हैं कि अमरावती यह ज्ञानेशकन्या के तौर पर परिचित महान संत गुलाबराव महाराज की जन्मभूमि व कर्मभूमि भी रही है. यही वजह है कि अपने जीवन में दूसरी बार अमरावती आने का सौभाग्य मिलने के चलते वे बेहद अभिभूत हैं और आगे भी बार-बार अमरावती आने की इच्छा रखते हैं.
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