भूमि अधिग्रहण घोटाले में बीड के पूर्व जिलाधिकारी अविनाश पाठक की मुश्किलें बढ़ीं?
गवाहों की पुनःपड़ताल और वॉइस सैंपल!

बीड/दि.14– बीड में राष्ट्रीय राजमार्ग के भूमि अधिग्रहण घोटाले मामले में पुलिस की हिरासत में रहे पूर्व जिलाधिकारी अविनाश पाठक के आवाज के नमूने जांच एजेंसियों ने लिए हैं. इस मामले में आज उनकी पुलिस हिरासत समाप्त हो रही है और दोपहर में उन्हें फिर से अदालत में पेश किया जाएगा. जांच के लिए और समय की आवश्यकता बताते हुए पुलिस द्वारा उनकी रिमांड बढ़ाने की मांग किए जाने की संभावना है.
इस बीच, इस मामले में भूमि अधिग्रहण समन्वय शाखा के डाटा एंट्री ऑपरेटर अविनाश चव्हाण को अग्रिम जमानत मिल चुकी है और उसका बयान भी पुलिस ने दर्ज किया है. जांच के दौरान सामने आ रहे नए मुद्दों के आधार पर पहले बयान दर्ज किए गए मुख्य गवाहों की पुनःपड़ताल भी शुरू कर दी गई है.
बीड जिले से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में करोड़ों रुपये के गबन का आरोप है. किसानों को दिए जाने वाले मुआवजे को बढ़ाकर देने के लिए जिलाधिकारी के हस्ताक्षरों का उपयोग कर फर्जी आदेश तैयार किए जाने का खुलासा जांच में हुआ है. इस मामले में सरकार को लगभग 73 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी होने का आरोप है. इस मामले में पहले ही शिवाजीनगर पुलिस स्टेशन में 10 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, जिसमें तत्कालीन जिलाधिकारी अविनाश पाठक का नाम भी शामिल है.
* 67 करोड़ का मुआवजा सीधे 310 करोड़ तक
जांच एजेंसियों से मिली जानकारी के अनुसार, 2025 के दौरान कुल 154 बढ़े हुए मुआवजे के आदेश जारी किए गए. शुरुआत में 67 करोड़ रुपये का मूल मुआवजा बढ़ाकर उसे लगभग 310 करोड़ रुपये तक कर दिया गया. इसमें 241 करोड़ 62 लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा मंजूर किया गया था. इनमें से लगभग 73 करोड़ 4 लाख रुपये संबंधित खातेदारों को वितरित भी किए जा चुके हैं. खास बात यह है कि संबंधित आदेश जारी करते समय जरूरी रजिस्टर एंट्री, दस्तावेज या आधिकारिक रिकॉर्ड भूमि अधिग्रहण समन्वय कार्यालय में उपलब्ध नहीं पाए गए.
* फर्जी आदेशों का शक
राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के अनुसार अधिग्रहित भूमि के लिए बढ़े हुए मुआवजे के लिए खातेदार जिलाधिकारी के पास आवेदन करते हैं. लेकिन बीड के तत्कालीन जिलाधिकारी अविनाश पाठक का 22 अप्रैल 2025 को तबादला होने के बाद भी उनके कार्यकाल की पिछली तारीखों का उपयोग कर फर्जी आदेश जारी किए जाने का आरोप है. जांच में यह भी सामने आया है कि पुरानी तारीखों और कथित फर्जी हस्ताक्षरों के आधार पर 154 मामलों में बढ़े हुए मुआवजे के आदेश जारी किए गए. इसलिए इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है.





