अमरावती विधान परिषद के चुनावी मैदान में

सांप निकल जाने पर लाठी पीट रही कांग्रेस

* ऐन चुनावी मुहाने पर शुरू किया बैठकों व चर्चाओं का दौर
* आज सुबह बडे नेताओं की हुई बैठक, शाम में गुट नेताओं से होगी चर्चा
* कांग्रेस के ही भीतर आरोप प्रत्यारोप का दौर तेज, अपने ही सदस्यों को लेकर पैदा किया जा रहा संदेह
* कौन ‘सेट’ हुआ, कौन नहीं, इसे लेकर भी कांग्रेस में जबर्दस्त चर्चा
* प्रत्याशी तय करते समय कोई नेता नहीं आया था सामने, समन्वय व एकजुटता थे नदारद
* अब पासा उलटने व बाजी पलटने के साथ ही हर कोई खुद को दिखा रहा फिक्रमंद                                                                अमरावती/दि.16 – विधान परिषद की सीट हेतु अमरावती के स्थानीय स्वायत्त निकाय निर्वाचन क्षेत्र में होने जा रहे चुनाव के मैदान में अब कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेताओं द्बारा सांप निकल जाने के बाद लकीर पर लाठी पीटने का काम किया जा रहा है. जिसके तहत अब जब प्रत्यक्ष मतदान की प्रक्रिया शुरू होने में मात्र एक दिन का समय शेष बचा है, तो कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेताओं द्बारा चर्चाओं एवं बैठकों का दौर शुरू किया गया है. जिसके तहत जहां आज सुबह सांसद बलवंत वानखडे के मालटेकडी के कांग्रेस नगर रोड स्थित जनसंपर्क कार्यालय में शहर एवं जिला कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं व पदाधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी. वहीं आज शाम 7 बजे मनपा सहित जिले की सभी नगर परिषदों व नगर पंचायतों के कांग्रेस गट नेताओं की बैठक बुलाई गई है. इस जरिए कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेताओं द्बारा कहीं न कहीं पार्टी नेतृत्व सहित अमरावतीवासियों के सामने अपनी एकजुटता दर्शाने का नाकाम कयास किया जा रहा है. जबकि हकीकत यह है कि विधान परिषद के चुनाव दौरान अमरावती में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह से संभ्रम एवं बिखराव का शिकार दिखी.
सबसे खास बात यह रही कि जब विधान परिषद चुनाव लिए प्रत्याशी तय करने का मौका था, तब कांग्रेस से किसी भी बडे नेता या पदाधिकारी की ओर से कोई पहल नहीं की गई. बल्कि हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचता नजर आया. साथ ही विधान परिषद चुनाव की ऐन नामांकन प्रक्रिया के समय प्रत्याशी तय करते समय भी कांग्रेस का कोई स्थानीय बडा नेता सामने नहीं था. बल्कि उस समय कोई इधर घूम रहा था, तो कोई उधर घूम रहा था. उस वक्त प्रत्याशी तय व घोषित करते समय कांग्रेस के स्थानीय नेताओं व पदाधिकारियों सहित निकाय सदस्यों की कोई बैठक या चर्चा नहीं हुई थी. बल्कि कई सदस्यों को तो अब भी शायद यह पता नहीं होगा कि हकीकत में कांग्रेस की ओर से तय किया गया प्रत्याशी कौन है व दिखता कैसा है. इस बात से चुनाव को लेकर कांग्रेस की स्थिति और नेताओं की गंभीरता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.
ध्यान देनेवाली बात यह भी है कि कांग्रेस प्रत्याशी के अप्रत्यक्ष तौर पर चुनावी मैदान से अपने कदम पीछे ले लिए. जाने के बाद जिस तरह से कांग्रेस के भीतर एक दूसरे को लेकर आरोप प्रत्यारोप का दौर चला. उसने कहीं न कहीं कांग्रेस से सभी स्थानीय नेताओं, पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच संदेह के घेरे में खडा कर दिया. क्योंकि लगभग हर किसी ने एक दूसरे पर बिकाउ होने का आरोप लगाते हुए अगले व्यक्ति पर पैसे लेकर बिक जाने या बैठ जाने का आरोप लगाया. ऐसे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस के स्थानीय नेताओं कहीं न कहीं खुद अपने ही पार्षदों पर अविश्वास जताते हुए उन्हें संदेह के घेरे में खडा कर दिया.
यहां यह कहना कतई अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि का्रंगेस के पास भी विधान परिषद के चुनाव हेतु तैयारी करने और किसी दमदार प्रत्याशी को खोजते हुए उसे चुनाव लडने हेतु तैयार करने के लिए भरपूर समय भी था. लेकिन इसके बावजूद भी कांग्रेस के स्थानीय नेताओं द्बारा उस समय का कोई उपयोग या सदुपयोग नहीं किया गया बल्कि उस समय हर कोई ‘अपनी अपनी डफली, अपना अपना राग’ वाली स्थिति में हाथ पर हाथ धरे बैठा था और विधान परिषद के लिए अमरावती शहर सहित जिले से वास्ता रखनेवाले किसी कट्टर कांग्रेसी व्यक्ति के नाम पर कोई विचार विमर्श तक नहीं हुआ. बल्कि ऐन समय पर अमरावती के कांग्रेसियों सहित राजनीतिक के क्षेत्र में पूरी तरह से अनजान व गुमनाम रहनेवाले हर्षजीत देशमुख को नागपुर से उठाकर अमरावती लाते हुए उन्हें विधान परिषद के लिए कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया. जिनके नाम और दावेदारी को लेकर खुद कांग्रेस के भी कई स्थानीय नेताओं व जनप्रतिनिधियों ने हैरानी जताई थी, क्योंकि विधान परिषद के लिए प्रत्याशी तय करते समय कांग्रेस के स्थानीय नेताओं व पदाधिकारियों द्बारा शहर सहित जिले के कांग्रेसी जनप्रतिनिधियों एवं कांग्रेस के गुट नेताओं के साथ कोई चर्चा या बैठक नही की गई थी. जबकि अब जब नामांकन भरने के तुरंत बाद कांग्रेस प्रत्याशी बीमार होकर अस्पताल में इलाज हेतु भर्ती है तो अब महज एक दिन बाद होने जा रहे चुनाव के मुहाने पर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं व पदाधिकारियों को अपने गुट नेताओं के साथ चर्चा और बैठक करने की याद आयी है.
कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इस बार के विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस की बहुत बुरी तरह से भद्द पिटनेवाली है. जिसके लिए कांग्रेस के स्थानीय नेता और पदाधिकारी भी पूरे तरह से जिम्मेदार है. माना कि पिछली बार की तरह इस बार भी विधान परिषद के चुनाव में सत्तापक्ष का पलडा भारी रहने की पूरी संभावना है. लेकिन यदि पिछले चुनाव परिणाम से सबक लेते हुए कोंग्रेस के स्थानीय नेताओं द्बारा किसी समर्पित कांग्रेसी पार्षद या पदाधिकारी को अपना प्रत्याशी बनाकर चुनावी मैदान में उतारा गया होता तो कम से कम उसे कांग्रेस सहित महाविकास आघाडी के सदस्यों मतदाताओं के वोट को मिलते और चुनाव में एक रोमांच भी बना रहता. साथ ही इस बात की भी संभावना बनी रहती कि पसंदक्रम के अनुसार होनेवाले इस चुनाव में दूसरी पसंद वाले वोटों की वजह से ही कोई उलटफेर हो जाए. लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेताओं व पदाधिकारियों की निष्क्रियता एवं लापरवाही के चलते ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया और अब पूरा मामला हाथ से निकल जाने के बाद कांग्रेस नेताओं द्बारा चुनाव को लेकर रणनीति तय करने मतदान से ठीक एक दिन परहले चर्चा एवं बैठक करने का हास्यास्पद काम किया जा रहा है. जिसे देखते हुए केवल इतना ही कहा जा सकता है कि ‘अब पछताय होत क्या, जब चिडिया चुग गई खेत’

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