फूट गया रे, सब कुछ फूट गया! आसमान से बादल कब फूटेगा

अमरावती/दि.22- आज महाराष्ट्र के गांव-गांव में, चौपालों पर, खेत-खलिहानों में और चाय की टपरी पर बैठा आम आदमी एक ही सवाल पूछ रहा है कि आखिर यह सब चल क्या रहा है. सुबह उठकर अखबार खोलिए, टीवी देखिए या मोबाइल पर खबरें पढ़िए, कहीं न कहीं किसी परीक्षा का पेपर लीक होने की खबर जरूर मिल जाएगी. गरीब किसान, मजदूर और मेहनतकश परिवारों के बच्चे दिन-रात एक करके पढ़ाई करते हैं. मां-बाप पेट काटकर, कर्ज लेकर, कभी जमीन गिरवी रखकर तो कभी घर के गहने बेचकर बच्चों को शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भेजते हैं. उनकी एक ही उम्मीद होती है कि बेटा या बेटी पढ़-लिखकर नौकरी पाएगा और परिवार का भविष्य बदलेगा. लेकिन परीक्षा से ठीक पहले पेपर लीक हो जाता है. वर्षों की मेहनत, जागी हुई रातें और आंखों में संजोए सपने पलभर में बिखर जाते हैं. मेहनत करने वाले बच्चे पीछे रह जाते हैं और व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाने वाले आगे निकल जाते हैं. यह केवल पेपर लीक नहीं है, यह लाखों युवाओं के विश्वास का टूटना है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सिर्फ पेपर ही नहीं फूट रहे, राजनीति भी बिखर रही है. परंतु आसमान से बादल नहीं फूट रहे और बारिश नहीं हो रही.
जहां तक राजनीति का सवाल है तो आज कोई नेता एक दल में है, तो कल दूसरे दल में दिखाई देता है. आज जिस विचारधारा की कसमें खाई जाती हैं, कल उसी को छोड़कर सत्ता के दूसरे दरवाजे पर दस्तक दी जाती है. कभी विधायक टूटते हैं, कभी सांसद टूटते हैं और कभी पूरे के पूरे राजनीतिक दल ही बंट जाते हैं. ऐसे में मतदाता आखिर किस पर भरोसा करे. गांव का साधारण आदमी तपती धूप में मतदान केंद्र तक जाता है, घंटों लाइन में खड़ा रहता है और जिसे अपना प्रतिनिधि चुनता है, वही प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद अपने स्वार्थ के हिसाब से पाला बदल लेता है. जनता के पानी, सड़क, रोजगार, शिक्षा और खेती के सवाल पीछे छूट जाते हैं, जबकि सत्ता और पद की राजनीति आगे निकल जाती है. यह केवल दलों की टूट-फूट नहीं है, बल्कि यह विश्वास की टूटन है. यह लोकतंत्र की नींव में पड़ती दरार है और इन सबके बीच सबसे ज्यादा परेशान है किसान और आम आदमी.
एक ओर व्यवस्था की खामियां हैं, दूसरी ओर प्रकृति की बेरुखी. जून का महीना खत्म होने को है, लेकिन बारिश का इंतजार खत्म नहीं हो रहा. खेत तैयार हैं, बीज खरीदे जा चुके हैं, खाद का इंतजाम हो चुका है, लेकिन आसमान अब तक मेहरबान नहीं हुआ. अमरावती सहित विदर्भ के कई इलाकों में हजारों हेक्टेयर भूमि पर बुआई अटकी हुई है. संतरे के बाग सूखने लगे हैं. किसानों ने कर्ज लेकर खेती की तैयारी की है, लेकिन बारिश नहीं होने से उनकी चिंता बढ़ती जा रही है. हर सुबह किसान आसमान की ओर उम्मीद से देखता है और हर शाम निराश होकर घर लौट आता है. ऐसे में गांव-गांव से एक ही पुकार सुनाई दे रही है कि हे भगवान! नेताओं और लोगों का टूटना-फूटना तो शायद नहीं रुकेगा, लेकिन अब तू ही आसमान फोड़कर बरस जा. प्रकृति अब गरीबों पर दया करे, समय पर बारिश हो, सूखी धरती फिर से हरी हो जाए और किसानों के चेहरे पर मुस्कान लौट आए. युवाओं के सपनों को नई उड़ान मिले और मेहनत का सम्मान हो. क्योंकि इंसानों ने भले ही विश्वास तोड़ दिया हो, निष्ठाएं बदल दी हों और रिश्तों का अर्थ बदल दिया हो, लेकिन गांव का आदमी आज भी आसमान पर भरोसा करता है. इसी भरोसे के सहारे वह तपती धूप में खड़ा है, बादलों की राह देख रहा है और पहली बारिश की बूंदों का इंतजार कर रहा है.

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