डफरीन अग्निकांड : एक सप्ताह बाद भी कई सवाल अनुत्तरित

साप्ताहिक समीक्षा रिपोर्ट

अमरावती/दि.31 – डफरीन (जिला स्त्री) अस्पताल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष (एसएनसीयू/एनआईसीयू) में 24 अगस्त की तड़के हुई आग की घटना ने न केवल अमरावती, बल्कि पूरे महाराष्ट्र को झकझोर दिया. इस हादसे में तीन नवजात शिशुओं की दर्दनाक मृत्यु हुई, जबकि कई अन्य बच्चों को समय रहते सुरक्षित बाहर निकालकर विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया. घटना के एक सप्ताह बाद भी दुर्घटना के वास्तविक कारण, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और सुरक्षा व्यवस्था की विफलता को लेकर अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं.
* घटना की भयावहता
24 अगस्त की तड़के लगभग 3.30 बजे डफरीन अस्पताल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष में अचानक आग लग गई. प्रारंभिक जानकारी में वेंटिलेटर में विस्फोट या तकनीकी खराबी को आग का कारण बताया गया. आग इतनी तेजी से फैली कि वार्ड में भर्ती नवजात शिशुओं को तत्काल बाहर निकालने की चुनौती खड़ी हो गई. अस्पताल कर्मियों और बचाव दल ने कई बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन तीन मासूमों की जान नहीं बचाई जा सकी. घटना के बाद पूरे जिले में शोक और आक्रोश का वातावरण बन गया. मृत बच्चों के परिजनों ने लापरवाही के आरोप लगाए, जबकि राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की.
* जांच का पहला सप्ताह : समितियां, दौरे और बयान
घटना के तुरंत बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश पर स्वास्थ्य सेवा आयुक्त डॉ. संजय काटकर की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय सत्यशोधन समिति गठित की गई. समिति में स्वास्थ्य, अग्निशमन, विद्युत, जैव-चिकित्सा अभियांत्रिकी तथा चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल किया गया. समिति ने डफरीन अस्पताल पहुंचकर घटनास्थल का निरीक्षण किया, ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों, नर्सों, वार्ड बॉय, तकनीकी कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों के बयान दर्ज किए. बचाए गए नवजातों की स्थिति का भी जायजा लिया गया. समिति की बैठक मूल रूप से अस्पताल में प्रस्तावित थी, लेकिन आंदोलन और विरोध की आशंका के चलते इसे जिला कलेक्टर कार्यालय में स्थानांतरित करना पड़ा. समिति ने संकेत दिए हैं कि अंतिम रिपोर्ट तैयार करने से पहले तकनीकी रिपोर्टों का अध्ययन किया जाएगा और लगभग एक सप्ताह में सरकार को निष्कर्ष सौंपे जाएंगे.
* फायर ऑडिट पर सबसे बड़ा विवाद
डफरीन अग्निकांड के बाद सबसे बड़ा विवाद फायर ऑडिट और सुरक्षा व्यवस्थाओं को लेकर सामने आया. अस्पताल प्रशासन का दावा है कि उन्होंने समय-समय पर संबंधित विभागों को पत्र लिखकर फायर ऑडिट कराने की मांग की थी. दूसरी ओर सार्वजनिक बांधकाम विभाग (पीडब्ल्यूडी) के विद्युत विभाग ने दावा किया कि फायर अलार्म, अग्निशमन और विद्युत सुरक्षा प्रणाली पूरी तरह कार्यरत थी. विभाग के अनुसार जून और अगस्त 2026 में निरीक्षण तथा परीक्षण किए गए थे और सभी व्यवस्थाएं संतोषजनक पाई गई थीं. यहीं से विवाद और गहरा हो गया. भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष चित्रा वाघ ने अमरावती दौरे के दौरान अस्पताल प्रशासन और पीडब्ल्यूडी दोनों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि दोनों विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं और उनमें से कोई न कोई पक्ष झूठ बोल रहा है. उन्होंने मामले की पुलिस जांच तथा दोषियों पर सदोष मनुष्यवध का मामला दर्ज करने की मांग की.
* फायर कंट्रोल रूम पर लगे गंभीर आरोप
घटना के बाद सामने आए एक अन्य खुलासे ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया. रिपोर्टों के अनुसार आग लगने के समय फायर कंट्रोल रूम पर ताला लगा हुआ था. साथ ही अस्पताल के अधिकांश कर्मचारियों को आधुनिक अग्निशमन प्रणाली संचालित करने का प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था. यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला माना जाएगा. सवाल यह भी है कि करोड़ों रुपये खर्च कर स्थापित की गई सुरक्षा प्रणाली का उपयोग संकट की घड़ी में क्यों नहीं हो सका. हालांकि सार्वजनिक बांधकाम विभाग ने इन आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया है कि अस्पताल प्रशासन को प्रणाली हस्तांतरित करते समय मॉक ड्रिल कराई गई थी और कर्मचारियों को प्राथमिक प्रशिक्षण दिया गया था.
* अस्पताल प्रबंधन की कार्यशैली पर उठे प्रश्न
अग्निकांड के कुछ ही दिनों बाद अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर नए विवाद सामने आए. भाजपा नेत्री चित्रा वाघ के अस्पताल दौरे के दौरान दो नवप्रसूता महिलाओं को अस्पताल परिसर में घंटों वाहन का इंतजार करते पाया गया. एक महिला को गांव लौटना था, जबकि दूसरी को नागपुर रेफर किया गया था, लेकिन एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं थी. आरोप लगे कि अस्पताल परिसर में वाहन खड़े होने के बावजूद डीजल और चालक की व्यवस्था नहीं थी. मामला सामने आते ही अधिकारियों को फटकार लगाई गई और तत्काल वाहन उपलब्ध कराए गए. घटना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि यदि हादसे के बाद भी अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में मरीजों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी.
* एसएनसीयू को भूतल पर स्थानांतरित करने का निर्णय
हादसे के बाद स्वास्थ्य विभाग ने महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए तीसरी मंजिल पर संचालित एसएनसीयू को अस्थायी रूप से निचली मंजिल पर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. अधिकारियों का मानना है कि आपातकालीन परिस्थितियों में ऊपरी मंजिलों से नवजातों को सुरक्षित बाहर निकालना कठिन होता है. इसलिए भूतल पर नई व्यवस्था विकसित की जा रही है, जहां 15 से 17 वेंटिलेटर लगाने की योजना है. यह कदम भविष्य में जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
* राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बना हादसा
डफरीन अग्निकांड ने जल्द ही राजनीतिक रंग भी ले लिया. शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने अस्पताल का दौरा किया तथा अपनी-अपनी मांगें रखीं. शिवसेना की नेता सुषमा अंधारे ने जांच समिति के समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत कर प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की मांग की. वहीं सांसद बलवंत वानखेडे ने कथित रूप से दुर्घटना से जुड़े वेंटिलेटर आपूर्तिकर्ता ‘शिलर’ कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने तथा उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग मुख्यमंत्री से की. भाजपा नेताओं ने विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया, जबकि विपक्ष ने सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया.
* सबसे महत्वपूर्ण सवाल : जिम्मेदार कौन?
एक सप्ताह की जांच और बहस के बाद भी कुछ बुनियादी प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं, आग वास्तव में वेंटिलेटर विस्फोट से लगी या किसी अन्य तकनीकी कारण से? क्या फायर अलार्म और अग्निशमन प्रणाली समय पर सक्रिय हुई थी? फायर ऑडिट और इलेक्ट्रिकल ऑडिट वास्तव में हुआ था या नहीं? यदि हुआ था तो दुर्घटना क्यों नहीं रोकी जा सकी? क्या कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया था? उपकरणों की गुणवत्ता और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या इस दुर्घटना को रोका जा सकता था?
* राज्य की नजर समिति की अंतिम रिपोर्ट पर
डफरीन अग्निकांड केवल एक अस्पताल दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, सुरक्षा मानकों, जवाबदेही और प्रशासनिक समन्वय की बड़ी परीक्षा बन गया है. तीन नवजातों की मौत ने स्वास्थ्य तंत्र की उन कमजोरियों को उजागर किया है, जिन पर लंबे समय से पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया. अब पूरे राज्य की नजर सत्यशोधन समिति की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी है. यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी रही तथा दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई हुई, तो यह घटना भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है. लेकिन यदि मामला केवल विभागीय दावों और प्रतिदावों तक सीमित रह गया, तो तीन मासूमों की मौत केवल आंकड़ों में दर्ज होकर रह जाएगी. डफरीन अग्निकांड का पहला सप्ताह समाप्त हो चुका है, लेकिन न्याय, जवाबदेही और सुधार की असली परीक्षा अब शुरू होती है.

 

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