‘पिंकी’ का अंत और कई अनुत्तरित सवाल

वर्धा और अमरावती जिले के ग्रामीण इलाकों में करीब तीन सप्ताह तक दहशत का पर्याय बनी मादा बाघिन ‘पिंकी’ का अध्याय आखिरकार समाप्त हो गया. 17 अगस्त से 7 सितंबर के बीच उसके हमलों में चार लोगों की मौत हुई और कई मवेशियों का भी शिकार हुआ. लगातार बढ़ते खतरे के बीच सोमवार को शिरजगांव कसबा क्षेत्र में उसे ट्रैंक्युलाइज कर काबू करने में वन विभाग और बचाव दल को सफलता मिली. प्रभावित गांवों ने राहत की सांस ली. लेकिन यह राहत ज्यादा देर टिक नहीं सकी. नागपुर ले जाने की तैयारी के दौरान उपचार के बीच बाघिन की मौत हो गई.
इस घटना ने एक साथ दो गंभीर मानवीय और वन्यजीव संबंधी प्रश्न हमारे सामने रख दिए हैं. चार परिवारों के उजड़ने का दर्द अपनी जगह है और रेस्क्यू के बाद एक वन्यजीव की मौत भी अपनी जगह. इसलिए इस पूरे प्रकरण को न तो केवल ‘आदमखोर बाघिन के अंत’ के रूप में देखा जा सकता है और न ही केवल वन विभाग की कार्रवाई पर सवाल खड़े करने तक सीमित किया जा सकता है. असल मुद्दा यह है कि इस घटना से हम आगे के लिए क्या सीख लेते हैं.
नरसिंहपुर में 17 अगस्त को राजाभाऊ भोयर की मौत से शुरू हुआ यह सिलसिला भांबोरा के किसान चरणदास ईखे, सोनोरी की उर्मिला इवने और शिरजगांव कसबा के दिनेश उर्फ दामू आवारे तक पहुंच गया. किसी की जान मंदिर में पूजा करते समय गई, कोई खेत में काम कर रहा था, कोई चारा काट रहा था तो कोई खेत में खाद डाल रहा था. यानी इन मौतों का संबंध किसी असाधारण गतिविधि से नहीं, बल्कि ग्रामीणों के रोजमर्रा के जीवन से था. इसके अलावा देऊलवाड़ा, सोनोरी, भांबोरा और आसपास के क्षेत्रों में गाय-बकरियों सहित कई मवेशियों के शिकार की घटनाओं ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ाई. किसान के लिए पशुधन केवल संपत्ति नहीं, उसकी आजीविका का आधार होता है. इसलिए पिंकी के आतंक ने ग्रामीणों में भय के साथ आर्थिक असुरक्षा भी पैदा की. ऐसे हालात में बाघिन को पकड़ने की मांग तेज होना स्वाभाविक था. जब किसी वन्यजीव से लगातार मानव जीवन को खतरा पैदा हो रहा हो और चार लोगों की जान जा चुकी हो, तब मानव सुरक्षा को प्राथमिकता देना प्रशासन की जिम्मेदारी है. इस दृष्टि से पिंकी को जेरबंद करने का निर्णय उचित था.
लेकिन प्रश्न यह है कि इसके बाद क्या हुआ और सफल रेस्क्यू के बाद बाघिन की मौत क्यों हुई. जाहिर तौर पर पिंकी को पकड़ने का अभियान आसान नहीं था. वह वर्धा के बोर अभयारण्य क्षेत्र से निकलकर मोर्शी, वरुड़ और चांदूर बाजार की ओर बढ़ती रही. उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ड्रोन, कैमरा ट्रैप, थर्मल इमेजिंग और अन्य ट्रैकिंग उपकरणों का इस्तेमाल किया गया. अमरावती, वर्धा, मेलघाट, अकोला, नागपुर और पुणे समेत विभिन्न स्थानों के विशेषज्ञों तथा रैपिड रिस्पॉन्स टीम को अभियान में लगाया गया. रेस्क्यू चैरिटेबल ट्रस्ट, पुणे के मुख्य पशुचिकित्सक डॉ. हेमराज के नेतृत्व में भी विशेषज्ञों ने कार्रवाई में भाग लिया. सोमवार को दामू आवारे की मौत के बाद बाघिन घटनास्थल के आसपास झाड़ियों में मौजूद रही. इससे उसे पकड़ने का अभियान तत्काल चलाना पड़ा. विशेषज्ञ शूटरों ने ट्रैंक्युलाइजर डार्ट का इस्तेमाल किया और आखिरकार बाघिन को जिंदा पिंजरे में कैद कर लिया गया.
यहीं तक अभियान को एक सफल रेस्क्यू कहा जा सकता था. लेकिन इसके कुछ घंटों बाद तलनी फाटा के पास बनाए गए अस्थायी चिकित्सा केंद्र में बाघिन की हालत बिगड़ गई. चार विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम ने करीब डेढ़ घंटे उपचार किया और शाम लगभग 7.30 बजे उसकी मौत हो गई. वन विभाग के अनुसार मौत का वास्तविक कारण विस्तृत पोस्टमार्टम और जांच के बाद ही सामने आएगा. यही कारण है कि अभी किसी पर सीधे आरोप लगाना उचित नहीं होगा. लेकिन इतने महत्वपूर्ण रेस्क्यू अभियान के बाद बाघिन की मौत हुई है तो कुछ बुनियादी सवालों के जवाब सार्वजनिक होना भी जरूरी है.
वन्यजीव क्षेत्र में यह चर्चा सामने आई है कि बाघिन को तीन डार्ट लगाए गए और दो अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल किया गया. यह बात अभी जांच का विषय है और इसे प्रमाणित तथ्य मानना जल्दबाजी होगी. लेकिन यदि ऐसा हुआ, तो हर डार्ट की मात्रा, दवा का प्रकार, डार्ट के बीच का अंतर और बाघिन के अनुमानित वजन के आधार पर निर्धारित खुराक की जानकारी सामने आनी चाहिए. क्या पहले डार्ट के बाद बाघिन की प्रतिक्रिया का पर्याप्त आकलन किया गया था? दूसरे और तीसरे डार्ट की आवश्यकता क्यों पड़ी? बेहोशी के दौरान उसकी सांस और हृदय गति की लगातार निगरानी हुई या नहीं? आवश्यकता होने पर रिवर्सल दवा कितनी देर में दी गई? परिवहन के दौरान उसकी चिकित्सकीय स्थिति क्या थी? क्या वह पहले से किसी बीमारी, चोट या शारीरिक कमजोरी से जूझ रही थी? इन सवालों का जवाब पोस्टमार्टम, विसरा परीक्षण, चिकित्सकीय रिकॉर्ड और रेस्क्यू अभियान की पूरी वीडियो एवं तकनीकी रिपोर्ट से मिल सकता है. जांच का उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं होना चाहिए. यदि पूरी प्रक्रिया निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार हुई है तो तथ्य वन विभाग और विशेषज्ञों को अनावश्यक आरोपों से मुक्त करेंगे. और यदि कहीं चूक हुई है तो उससे भविष्य के लिए सुधार का रास्ता निकलेगा.
इस अभियान में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को बुलाना अपने आप में गलत नहीं है. कठिन और जोखिमपूर्ण वन्यजीव रेस्क्यू में विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है. लेकिन विदर्भ की भौगोलिक परिस्थितियों, जंगलों की बनावट, स्थानीय रास्तों और यहां के वन्यजीवों के व्यवहार से परिचित स्थानीय वन अधिकारियों एवं बचाव दल के अनुभव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसलिए सवाल किसी ‘बाहरी’ या ‘स्थानीय’ टीम को चुनने का नहीं, बल्कि दोनों के बीच समन्वय का है. भविष्य में ऐसे अभियानों के लिए स्पष्ट कमांड सिस्टम, जिम्मेदारियों का निर्धारण और स्थानीय विशेषज्ञता का प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित होना चाहिए.
पिंकी ‘मानवभक्षी’ बनी ही क्यों, यह सवाल शायद सबसे असहज है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भी. पिंकी के हमले अचानक शुरू हुए या उसकी गतिविधियों में पहले से बदलाव दिखाई दे रहे थे? वह बोर क्षेत्र से निकलकर आबादी के करीब कैसे पहुंची? कैमरा ट्रैप या अन्य निगरानी प्रणालियों से उसकी मौजूदगी का पता पहले क्यों नहीं चला? यदि पता चला था तो समय रहते गांवों को चेतावनी और सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं दी जा सकी? हर बार किसी बाघ के आबादी क्षेत्र में पहुंचने के बाद रेस्क्यू टीम भेजना स्थायी समाधान नहीं हो सकता. जरूरत इस बात की है कि संभावित संघर्ष वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान हो और वहां निगरानी मजबूत की जाए. महाराष्ट्र में मानव जीवन के लिए खतरनाक माने गए करीब 14 बाघों को काबू करने के आदेश जारी होने की जानकारी इस समस्या के व्यापक स्वरूप की ओर संकेत करती है. वर्ष 2018 में अमरावती क्षेत्र में भी एक बाघ के आतंक में दो लोगों की मौत हो चुकी है. यानी पिंकी कोई अकेली और अप्रत्याशित घटना नहीं है.
देश और महाराष्ट्र में बाघों की संख्या बढ़ना संरक्षण की बड़ी उपलब्धि है. लेकिन संरक्षण का अर्थ केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं है. उनके लिए पर्याप्त जंगल, प्राकृतिक शिकार, पानी और सुरक्षित आवागमन के रास्ते भी जरूरी हैं. जंगलों पर मानवीय दबाव बढ़ रहा है. खेती का विस्तार, सड़कें, निर्माण और अन्य विकास परियोजनाएं कई क्षेत्रों में वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन को प्रभावित करती हैं. जब जंगल के भीतर पर्याप्त संसाधन और सुरक्षित रास्ते नहीं मिलते, तो वन्यजीव मानव बस्तियों के करीब आते हैं. वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों का जीवन भी उन्हीं जंगलों की सीमाओं से जुड़ा हुआ है. इसलिए वन्यजीव कॉरिडोर की पहचान और सुरक्षा, जंगलों के बीच संपर्क बनाए रखना तथा संवेदनशील क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों का वैज्ञानिक नियमन अब वैकल्पिक उपाय नहीं, अनिवार्यता है.
संवेदनशील गांवों में केवल यह अपील करना कि किसान अकेले खेत में न जाएं, पर्याप्त नहीं है. किसान के लिए खेत में जाना रोजमर्रा की मजबूरी है. चारा काटना, फसल देखना, सिंचाई करना और मवेशियों की देखभाल करना वह लंबे समय तक टाल नहीं सकता. इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों में स्थायी निगरानी व्यवस्था, कैमरा ट्रैप, ड्रोन निगरानी, तत्काल अलर्ट सिस्टम और प्रशिक्षित स्थानीय त्वरित प्रतिक्रिया दल होना चाहिए. किसी वन्यजीव की गतिविधि सामने आते ही संबंधित गांवों तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. साथ ही वन्यजीव हमलों में मारे गए लोगों के परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता, मुआवजा और प्रशासनिक सहयोग मिलना चाहिए. मानव-वन्यजीव संघर्ष में सबसे बड़ी कीमत ग्रामीण परिवार ही चुकाते हैं, उन्हें केवल सावधानी बरतने की सलाह देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकती.
पिंकी ने चार लोगों की जान ली. इसलिए उसे पकड़ना जरूरी था. लेकिन रेस्क्यू के बाद उसकी मौत की जांच भी उतनी ही जरूरी है. दोनों बातों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना गलत होगा. पिंकी की मौत की निष्पक्ष जांच हो, पोस्टमार्टम और विसरा रिपोर्ट के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं तथा रेस्क्यू में इस्तेमाल दवाओं, उनकी मात्रा, चिकित्सकीय निगरानी और परिवहन की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा हो. यदि कोई चूक सामने आती है तो जिम्मेदारी तय हो; और यदि प्रक्रिया सही पाई जाती है तो तथ्यों के आधार पर अनावश्यक विवाद भी समाप्त होना चाहिए. लेकिन इससे आगे बढ़कर अमरावती-वर्धा क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष की दीर्घकालीन योजना बनाना ज्यादा जरूरी है. संवेदनशील गांवों की सूची, सुरक्षित वन्यजीव कॉरिडोर, नियमित निगरानी, स्थानीय विशेषज्ञता, प्रशिक्षित रेस्क्यू दल और त्वरित चेतावनी तंत्र-इन सबको एक स्थायी व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा.
पिंकी का आतंक समाप्त हो गया है, लेकिन मानव और वन्यजीव के बीच बढ़ता टकराव अभी खत्म नहीं हुआ. चार इंसानी मौतों और एक बाघिन की मौत को केवल एक घटना मानकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी. सवाल अब यह नहीं है कि पिंकी पकड़ी गई या नहीं. असली सवाल यह है कि अगली पिंकी पैदा होने से पहले क्या हमारी व्यवस्था इतनी तैयार होगी कि न किसी किसान की जान जाए और न किसी वन्यजीव को मानव बस्ती तक आने की नौबत आए? यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सीख होनी चाहिए.





