डफरीन अग्निकांड की जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी

तीन नवजातों की मौत के 15 दिन बाद जांच रिपोर्ट हुई पेश

* उच्चस्तरीय समिति ने पीडब्ल्यूडी-दमकल विभाग को भी लिया निशाने पर
* एसएनसीयू स्टाफ को स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म, स्प्रिंकलर और रेस्क्यू सिस्टम चलाने का प्रशिक्षण नहीं रहने की बात कही
* जनवरी-जुलाई के अनिवार्य फायर ऑडिट में लापरवाही और देरी के दिए स्पष्ट संकेत
* अब जिम्मेदार अधिकारियों पर लटक रही कार्रवाई की तलवार, मचा हड़कंप
* जांच समिति ने डफरीन अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की सिफारिश भी की
अमरावती/मुंबई/दि. 8- स्थानीय जिला स्त्री अस्पताल (डफरीन) के नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष (एसएनसीयू) में 24 अगस्त को हुए भीषण अग्निकांड और तीन नवजात शिशुओं की मौत के मामले में आखिरकार उच्चस्तरीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. राज्य सरकार द्वारा गठित समिति ने सोमवार, 7 सितंबर को अपनी रिपोर्ट शासन को प्रस्तुत की. इस रिपोर्ट को फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार इसमें अस्पताल प्रशासन के साथ-साथ सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), अग्निशमन व्यवस्था और सुरक्षा ऑडिट से जुड़े तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं.
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि जिस एसएनसीयू में बेहद गंभीर अवस्था में नवजातों का उपचार किया जा रहा था, वहां कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों को स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म, वॉटर स्प्रिंकलर, फायर पंप, रेस्क्यू मैनेजमेंट तथा नाइट मॉक ड्रिल जैसी महत्वपूर्ण अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं के संचालन और आपातकालीन बचाव प्रक्रिया का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अत्याधुनिक अग्नि सुरक्षा उपकरण लगाए जाने के बावजूद यदि उन्हें संचालित करने की जानकारी ही कर्मचारियों को नहीं थी, तो आपात स्थिति में इन प्रणालियों का लाभ कैसे मिलना था?
* सुरक्षा उपकरण मौजूद, लेकिन संचालन का प्रशिक्षण नहीं
समिति की रिपोर्ट से जुड़े सूत्रों के अनुसार डफरीन अस्पताल में अग्निशमन एवं सुरक्षा के लिए विभिन्न उपकरण उपलब्ध थे, लेकिन एसएनसीयू के कर्मचारियों को इन उपकरणों के प्रभावी उपयोग का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया था. विशेष रूप से स्मोक डिटेक्टर से मिलने वाले संकेत पर तत्काल क्या करना है, फायर अलार्म कैसे सक्रिय करना है, वॉटर स्प्रिंकलर और फायर पंप प्रणाली का उपयोग कैसे करना है, नवजातों को किस क्रम में सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना है और आग के दौरान रेस्क्यू मैनेजमेंट कैसे संचालित करना है, इसकी व्यावहारिक जानकारी कर्मचारियों को नियमित रूप से नहीं दी गई. इतना ही नहीं, रात के समय अचानक आग लगने जैसी परिस्थिति से निपटने के लिए नाइट मॉक ड्रिल भी प्रभावी तरीके से नहीं किए जाने की बात रिपोर्ट में सामने आने की जानकारी है. नवजात वार्ड जैसे अत्यंत संवेदनशील विभाग में यह कमी जांच समिति के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी.
* फायर ऑडिट को लेकर सबसे गंभीर सवाल
डफरीन अग्निकांड के बाद सबसे अधिक विवाद फायर ऑडिट को लेकर सामने आया था. अब उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट में भी इस मुद्दे को महत्वपूर्ण स्थान दिए जाने की जानकारी है. सूत्रों के मुताबिक अस्पताल प्रशासन ने फायर ऑडिट कराने के लिए पीडब्ल्यूडी को पत्राचार किया था, लेकिन अपेक्षित समय में कार्रवाई नहीं हुई. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख होने की बात सामने आई है कि अस्पताल में हर वर्ष जनवरी और जुलाई में फायर ऑडिट किया जाना अपेक्षित था, लेकिन इस प्रक्रिया में लापरवाही और देरी हुई. यही बिंदु अब जांच के दायरे को अस्पताल प्रशासन से आगे बढ़ाकर पीडब्ल्यूडी और संबंधित अग्निशमन व्यवस्था तक ले गया है. समिति ने संबंधित विभागों के दस्तावेज, पत्राचार, तकनीकी रिपोर्ट तथा अधिकारियों के बयान का अध्ययन किया है.
* अस्पताल प्रशासन और पीडब्ल्यूडी के दावों में था विरोधाभास
अग्निकांड के बाद अस्पताल प्रशासन और पीडब्ल्यूडी के विद्युत विभाग की ओर से फायर ऑडिट को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए थे. अस्पताल प्रशासन का पक्ष था कि ऑडिट के लिए संबंधित विभाग को पत्र दिए गए थे, जबकि पीडब्ल्यूडी की ओर से सुरक्षा व्यवस्था की जांच और आवश्यक कार्यवाही किए जाने का दावा किया गया था. समिति ने इन्हीं विरोधाभासी दावों की भी पड़ताल की. उपलब्ध जानकारी के अनुसार रिपोर्ट में जिम्मेदारियों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी टिप्पणी की गई है. यदि शासन समिति के निष्कर्षों को स्वीकार करता है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई से लेकर अन्य कानूनी कार्रवाई तक की संभावना बन सकती है.
* तीन मासूमों की मौत ने पूरे राज्य को झकझोर दिया
बता दें कि 24 अगस्त की तड़के करीब साढ़े तीन बजे डफरीन अस्पताल के एसएनसीयू में कथित रूप से वेंटिलेटर में विस्फोट के बाद आग लग गई थी. देखते ही देखते धुआं और आग नवजात वार्ड में फैल गई. उस समय वार्ड में उपचाराधीन नवजातों के कारण स्थिति बेहद गंभीर हो गई थी. अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों ने कई नवजातों को तत्काल सुरक्षित बाहर निकाला, लेकिन इस भयावह हादसे में तीन नवजातों की मौत हो गई. बाद की प्राथमिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी हादसे की भयावहता सामने आई. एक नवजात का करीब 75.5 प्रतिशत शरीर झुलस गया था, जबकि दूसरे नवजात के शरीर का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा जला था. तीसरे नवजात के शरीर पर अपेक्षाकृत कम जलने के निशान पाए गए, लेकिन धुआं श्वसन मार्ग में पहुंचने के कारण उसकी सांस रुक गई थी. इस घटना के बाद अस्पताल की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, वेंटिलेटर की तकनीकी स्थिति, फायर ऑडिट, कर्मचारियों के प्रशिक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई सवाल उठे थे.
* सीएम फडणवीस के निर्देश पर गठित हुई थी उच्चस्तरीय समिति
घटना की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश पर उसी दिन उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई थी. समिति को यह पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई थी कि आग लगने के वास्तविक कारण क्या थे, सुरक्षा व्यवस्था में कहां कमी रही और तीन नवजातों की मौत के लिए किसी स्तर पर प्रशासनिक, तकनीकी अथवा मानवीय लापरवाही जिम्मेदार थी या नहीं. समिति ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा अस्पताल प्रशासन, डॉक्टरों, नर्सों, तकनीकी कर्मचारियों और संबंधित विभागों के अधिकारियों से जानकारी ली. इसके अलावा अग्निशमन व्यवस्था, विद्युत प्रणाली, उपकरणों के रखरखाव, फायर ऑडिट और आपातकालीन बचाव व्यवस्था से संबंधित दस्तावेजों की भी जांच की गई.
* 11 सदस्यीय समिति में कौन-कौन?
उच्चस्तरीय समिति की अध्यक्षता राज्य स्वास्थ्य सेवा आयुक्त डॉ. संजय काटकर ने की. स्वास्थ्य उपनिदेशक (परिवहन) जयंत मुले समिति के सचिव/सदस्य सचिव थे. समिति में विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया था. उपलब्ध जानकारी के अनुसार समिति के सदस्यों में समिति अध्यक्ष के तौर पर स्वास्थ्य सेवा आयुक्त डॉ. संजय काटकर, समिति सचिव के तौर पर स्वास्थ्य सेवा (परिवहन) उपनिदेशक जयंत मुले, सदस्यों के तौर पर प्रादेशिक बायोमेडिकल/तकनीकी अधिकारी (अकोला परिमंडल) नितीन सावले, तकनीकी अधिकारी (छत्रपति संभाजीनगर) मनीष मगरे, विद्युत मंडल (दक्षता) अधीक्षक अभियंता दयानंद बहात्रे (छत्रपति संभाजीनगर), चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संचालनालय के प्रतिनिधि डॉ. सुशांत माने, आईडीडब्ल्यू के अधीक्षक अभियंता अविनाश धोंडगे, अग्निशमन सेवा महाविद्यालय (नागपुर) के निदेशक सुधीर इंगले, एम्स नागपुर के कार्यकारी निदेशक डॉ. निशांत बनाईत, स्वास्थ्य सेवा निदेशक (अस्पताल) डॉ. नितीन अंबाडेकर तथा अशासकीय सदस्य के तौर पर पत्रकार गजानन मोहोड समावेश था. समिति में स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, विद्युत सुरक्षा और अग्निशमन क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल करने का उद्देश्य हादसे के प्रत्येक तकनीकी और प्रशासनिक पहलू की स्वतंत्र जांच करना था.
* कई विभागों की जवाबदेही तय होने के संकेत
रिपोर्ट सार्वजनिक होने से पहले ही उसके कथित निष्कर्षों ने प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है. यदि सूत्रों की जानकारी सही है, तो समिति ने केवल अस्पताल प्रशासन को जिम्मेदार ठहराने के बजाय फायर ऑडिट, पीडब्ल्यूडी की भूमिका, अग्निशमन व्यवस्था और कर्मचारियों के प्रशिक्षण जैसे विभिन्न पहलुओं को भी अपनी जांच में शामिल किया है. इससे साफ है कि सरकार के सामने अब केवल यह सवाल नहीं है कि आग कैसे लगी, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि आग लगने के बाद उपलब्ध सुरक्षा व्यवस्था ने अपेक्षित तरीके से काम क्यों नहीं किया और संबंधित कर्मचारियों को उसका संचालन करने का प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया गया.
* भविष्य में हादसे रोकने के लिए सुधारों की सिफारिश
समिति ने कथित तौर पर भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कई महत्वपूर्ण उपायों की सिफारिश की है. इनमें सरकारी अस्पतालों में नियमित फायर एवं इलेक्ट्रिकल ऑडिट, एसएनसीयू/एनआईसीयू/आईसीयू कर्मचारियों के लिए विशेष फायर सेफ्टी प्रशिक्षण, नियमित मॉक ड्रिल, रात्रिकालीन आपातकालीन अभ्यास, अग्निशमन उपकरणों की कार्यक्षमता की नियमित जांच तथा आपातकालीन निकासी योजना को मजबूत करना शामिल है. इसके अलावा अत्यंत संवेदनशील वार्डों में लगे वेंटिलेटर और अन्य बायोमेडिकल उपकरणों की स्वतंत्र तकनीकी जांच तथा उनके रखरखाव की निगरानी मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिए जाने की जानकारी है.
* अब सरकार के फैसले का इंतजार
उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट शासन तक पहुंचने के बाद अब कार्रवाई की गेंद राज्य सरकार के पाले में है. रिपोर्ट में यदि अधिकारियों की जिम्मेदारी और लापरवाही तय की गई है, तो उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होती है, इस पर सभी की नजर है. डफरीन अग्निकांड ने केवल तीन नवजातों की जान नहीं ली, बल्कि सरकारी अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं. इसलिए इस रिपोर्ट का महत्व केवल डफरीन अस्पताल तक सीमित नहीं है. सरकार यदि समिति की सिफारिशों को राज्यभर के सरकारी अस्पतालों में लागू करती है, तो यह भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है. तीन मासूमों की मौत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या इस हादसे से व्यवस्था सबक लेगी, या जांच रिपोर्ट भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगी?

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