साहित्य को समर्पित धन्वंतरि थे डॉ. मोतीलाल राठी

अमरावती के साहित्यिक परिवेश को समृद्ध करने में निभाई ऐतिहासिक भूमिका

* कल 9 सितंबर को जयंती दिवस निमित्त विशेष
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने पेशे की सीमाओं से बहुत आगे जाकर समाज और संस्कृति के निर्माण में योगदान देते हैं. स्व. डॉ. मोतीलाल राठी ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व थे. पेशे से चिकित्सक, लेकिन मन से साहित्य, समाज और सेवा के प्रति समर्पित. उन्होंने अमरावती के साहित्यिक वातावरण को समृद्ध करने के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और तपोवन स्थित विदर्भ महारोगी सेवा मंडल के कार्यों में भी उल्लेखनीय योगदान दिया.
मराठी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रा. मधुकर केचे ने उनके योगदान को रेखांकित करते हुए कहा था, डॉक्टर, आपका नाम राठी नहीं, मराठी होना चाहिए था. यह टिप्पणी डॉ. राठी के मराठी साहित्य के प्रति समर्पण की गहरी पहचान थी. आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अमरावती और विदर्भ के उस दौर के साहित्यकारों की स्मृतियों में उनका नाम आज भी उतनी ही आत्मीयता से जीवित है.
* डॉक्टर थे, लेकिन साहित्य उनका दूसरा संसार था
चिकित्सा जैसे व्यस्त पेशे के बावजूद डॉ. राठी ने साहित्य के लिए अपना समय और संसाधन समर्पित किए. प्रा. मधुकर केचे, डॉ. भाऊ मांडवकर, कवि सुरेश भट, उद्धव ज. शेलके, बाबा मोहोड़, उषाताई चौधरी सहित अनेक साहित्यकारों के साथ उन्होंने अमरावती के साहित्यिक जीवन को नई दिशा देने का काम किया. उनकी विशेषता यह थी कि वे केवल स्थापित साहित्यकारों तक सीमित नहीं रहे. नवोदित लेखकों और कवियों को भी उन्होंने प्रोत्साहित किया. बबन सराडकर, शिवा इंगोले, गंगाधर पुसदकर, साहेबराव थोरात, अशोक थोरात, अरुण सांगोले, विष्णु सोलंके, सुनीला झोड, शोभा रोकड़े, शोभा गायकवाड़, संजय महल्ले, कुमार बोबड़े, किशोर फुले, अरविंद महल्ले, सुधाकर देशमुख, किशोर सानप, राजेश महल्ले, राजीव शिंदे और मिर्जा रफी अहमद बेग सहित अनेक साहित्यिकों की पीढ़ी को उनके सहयोग का लाभ मिला.
* साहित्य संगम को दिया मजबूत आधार
वर्ष 1976 में स्थापित साहित्य संगम को पांच दशक पूरे हो चुके हैं. इस संस्था को विस्तार और पहचान दिलाने में डॉ. राठी की महत्वपूर्ण भूमिका रही. साहित्य संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संस्था को केवल पदाधिकारी की तरह नहीं, बल्कि एक कार्यकर्ता की तरह संभाला. साहित्यिक कार्यक्रमों को गति देना, बड़े साहित्यकारों को अमरावती बुलाना और नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ना उनके प्रमुख प्रयासों में शामिल था.
* लाहोटी महाविद्यालय में मराठी कवि सम्मेलनों की परंपरा
अमरावती के श्रीमती केशरबाई लाहोटी महाविद्यालय में उस समय प्रतिवर्ष हिंदी कवि सम्मेलन आयोजित होता था. डॉ. राठी ने इस परंपरा में मराठी कवि सम्मेलन भी जोड़ा. श्री गणेशदास राठी छात्रालय समिति से जुड़े होने और बाद में अध्यक्ष बनने के कारण उन्हें इस दिशा में काम करने का अवसर मिला. उन्होंने कवि श्रेष्ठ सुरेश भट, मधुकर केचे, देविदास सोटे, सुरेश वैराळकर, मंगेश पाडगांवकर, विंदा करंदीकर, वसंत बापट, मिर्जा रफी अहमद बेग, शंकर बडे, विठ्ठल वाघ, श्रीकृष्ण राऊत और नारायण कुलकर्णी कवठेकर जैसे अनेक नामचीन कवियों को अमरावती आमंत्रित किया. इससे शहर में मराठी कवि सम्मेलनों की मजबूत परंपरा विकसित हुई और अमरावती का साहित्यिक वातावरण और समृद्ध हुआ.
* जब डॉ. राठी का घर बन गया साहित्य का मंच
यह वह दौर था, जब अमरावती में आज जैसी सांस्कृतिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं. न सांस्कृतिक भवन था, न विमलाबाई देशमुख सभागृह और न टाउन हॉल. ऐसे समय में डॉ. राठी का बंगला साहित्यिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया. उन्होंने अपने घर का टेबल टेनिस हॉल तक साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए उपलब्ध कराया. बाहर से आने वाले साहित्यकारों और कलाकारों के लिए उनके घर के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे. उनकी पत्नी कमलताई राठी, पुत्र प्रतीक और प्रवीण भी इस साहित्यिक आतिथ्य परंपरा में सक्रिय रूप से सहभागी थे. डॉ. राठी के यहां आने वाला कोई साहित्यकार चाय-नाश्ते के बिना लौट जाए, यह लगभग असंभव था. साहित्य के प्रति डॉ. राठी का समर्पण दरअसल पूरे परिवार की आत्मीयता से जुड़ा हुआ था.
* सुरेश भट के साथ आत्मीय रिश्ता
कवि सुरेश भट के साथ डॉ. राठी का संबंध विशेष रूप से उल्लेखनीय था. भट के कठिन दौर में उनका साथ देने वालों में डॉ. राठी के साथ अरविंद ढवले और मीनाताई ढवले का भी महत्वपूर्ण स्थान था. सुरेश भट के चर्चित कार्यक्रम ‘रंग माझा वेगळा’ को अमरावती लाने में डॉ. राठी और अरविंद ढवळे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. नागपुर में कार्यक्रम देखने के बाद दोनों अमरावती के लिए कार्यक्रम की तारीख लेकर लौटे. लगभग पांच दशक पहले नगर वाचनालय में आयोजित इस कार्यक्रम में इतनी भीड़ उमड़ी कि सभागृह में पैर रखने तक की जगह नहीं थी. टिकट लेकर आए अनेक रसिकों ने बाहर से ही अनुरोध किया कि वे टिकट के पैसे देने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें खड़े होकर ही कार्यक्रम देखने दिया जाए. यह आयोजन अमरावती की साहित्यिक चेतना और सुरेश भट की लोकप्रियता का यादगार उदाहरण बन गया. इसमें डॉ. राठी ने तन-मन-धन से सहयोग किया.
* साहित्य को अखबारों तक पहुंचाने की पहल
डॉ. राठी साहित्य को केवल सभागृहों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे. उन्होंने साहित्य को व्यापक समाज तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्रों के माध्यम से भी पहल की. लगभग पांच दशक पहले उन्होंने दैनिक नागपुर पत्रिका की चार पृष्ठों की, नागपुर टाइम्स की एक पृष्ठ की और दैनिक हितवाद की पूर्ण पृष्ठ की साहित्यिक पूरक सामग्री प्रकाशित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उस समय यह अपने आप में बड़ा साहित्यिक उपक्रम था.
* साहित्यकारों का ‘माहेरघर’ था उनका घर
डॉ. मोतीलाल राठी का निवास साहित्यकारों और कलाकारों के लिए एक आत्मीय आश्रय जैसा था. उनके बंगले में बने गेस्ट हाउस में हृदयनाथ मंगेशकर, जीवन किर्लोस्कर, सुरेश भट, विठ्ठल वाघ, शंकर बडे, मिर्जा रफी अहमद बेग और नारायण कुलकर्णी कवठेकर जैसे अनेक नामचीन साहित्यकार और कलाकार ठहरे. हृदयनाथ मंगेशकर के अमरावती कार्यक्रम के दौरान उनके ठहरने की व्यवस्था भी डॉ. राठी के यहां की गई थी. उन्होंने जिस आत्मीयता से साहित्यकारों और कलाकारों का स्वागत किया, वह उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था.
* तपोवन और स्वास्थ्य सेवा में भी समर्पण
डॉ. मोतीलाल राठी का योगदान साहित्य तक सीमित नहीं था. विदर्भ महारोगी सेवा मंडल, तपोवन से उनका गहरा जुड़ाव रहा. उस दौर में तपोवन पहुंचना भी आसान नहीं था. कई बार रिक्शा चालक वहां जाने को तैयार नहीं होते थे. इसके बावजूद डॉ. राठी नियमित रूप से तपोवन जाते और मरीजों की जांच करते. पद्मश्री डॉ. शिवाजीराव पटवर्धन की सेवा परंपरा से जुड़े इस संस्थान में उन्होंने लंबे समय तक योगदान दिया और बाद में संस्था के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला. स्वास्थ्य सेवा मंडल के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर निःशुल्क दवाखाने शुरू करने में भी उन्होंने योगदान दिया. कुछ दवाखानों में वे स्वयं मरीजों की जांच करते थे. चिकित्सा उनके लिए केवल व्यवसाय नहीं, सेवा थी. कम से कम दवा और मरीज को जल्द से जल्द राहत उनका मूलमंत्र था.
* उनकी विरासत आज भी जीवित है
डॉ. मोतीलाल राठी ने अमरावती में केवल साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित नहीं करवाए, बल्कि एक ऐसा साहित्यिक वातावरण तैयार किया, जिसमें स्थापित साहित्यकारों के साथ नवोदित प्रतिभाओं को भी स्थान मिला. उन्होंने अपने पेशे से अर्जित प्रतिष्ठा और संसाधनों का उपयोग साहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के लिए किया. यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व किसी एक क्षेत्र की सीमा में बांधा नहीं जा सकता. आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा प्रोत्साहित साहित्यिक पीढ़ी, उनके सहयोग से विकसित संस्थाएं और उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियां उनकी विरासत को जीवित रखे हुए हैं.
‘रहे न रहें हम, महका करेंगे’ की पंक्तियों की तरह डॉ. मोतीलाल राठी भी हमारे बीच भले ही उपस्थित न हों, लेकिन अमरावती के साहित्यिक संसार और उनकी पीढ़ी के हृदय में उनकी स्मृति आज भी उसी आत्मीयता से महक रही है.
– प्रा. डॉ. नरेशचंद्र काठोले
संचालक, मिशन आईएएस, अमरावती कैंप

Back to top button