चार लोगों की जान लेने वाली आदमखोर बाघिन ‘पिंकी’ की मौत

18 दिनों के खूनी व नरभक्षी आतंक का नाटकीय अंत

* वर्धा-अमरावती में ‘पिंकी’ ने 18 दिनों तक जमकर मचाया था आतंक
* चार मानव बलि और दर्जनों मवेशियों के शिकार के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन में पकड़ी गई
* शिरजगांव कसबा में ट्रैंक्युलाइज कर किया गया काबू, रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान हुई थी बेहोश
* नागपुर ले जाने से पहले उपचार के दौरान तोड़ा दम, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ होगा मौत का कारण
* परतवाडा के रेस्क्यू सेंटर में पोस्टमार्टम पश्चात किया गया ‘पिंकी’ का अंतिम संस्कार
* ‘पिंकी’ की मौत ने खड़े किए कई सवाल, अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर टिकीं निगाहें
अमरावती/मोर्शी/चांदूर बाजार/दि.8- वर्धा और अमरावती जिलों में पिछले 18 दिनों से दहशत का पर्याय बनी आदमखोर मादा बाघिन ‘पिंकी’ का सोमवार को नाटकीय अंत हो गया. चार लोगों की जान लेने और कई मवेशियों का शिकार कर पूरे क्षेत्र में भय का माहौल पैदा करने वाली इस बाघिन को चांदूर बाजार तहसील के शिरजगांव कसबा क्षेत्र में एक बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सफलतापूर्वक ट्रैंक्युलाइज कर पकड़ लिया गया था, लेकिन कुछ ही घंटों बाद उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई. बाघिन की मौत के साथ ही मोर्शी, वरुड, चांदूर बाजार, सोनोरी, शिरजगांव कसबा, देऊलवाड़ा और आसपास के दर्जनों गांवों ने राहत की सांस ली, हालांकि उसकी मृत्यु के कारणों को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं.
वन विभाग के अनुसार यह वही ‘पिंकी’ बाघिन थी, जिसने 17 अगस्त से 7 सितंबर के बीच चार लोगों को अपना शिकार बनाया था. लगातार बढ़ते हमलों, ग्रामीणों के गुस्से और जनप्रतिनिधियों के दबाव के बीच उसे पकड़ने के लिए अमरावती, वर्धा, मेलघाट, अकोला, नागपुर और पुणे की विशेषज्ञ टीमों को मैदान में उतारा गया था. दो दिनों के भीतर लगातार दो मानव शिकार होने के बाद प्रशासन पर तत्काल कार्रवाई का दबाव और बढ़ गया था.
* दामू आवारे की मौत बनी निर्णायक मोड़
सोमवार दोपहर शिरजगांव कसबा निवासी किसान दिनेश उर्फ दामू आवारे (45) अपने खेत में खाद डालने का काम कर रहे थे. इसी दौरान घात लगाकर बैठी बाघिन ने उन पर हमला कर दिया. हमला इतना भीषण था कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई. घटना की जानकारी मिलते ही पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई. प्रत्यक्षदर्शियों और वन अधिकारियों के अनुसार शिकार करने के बाद भी बाघिन घटनास्थल के आसपास की झाड़ियों में ही बैठी रही. इससे ग्रामीणों में दहशत और आक्रोश दोनों बढ़ गए. बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल की ओर पहुंचने लगे, जिसके कारण स्थिति तनावपूर्ण हो गई. सूचना मिलते ही वन विभाग, पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीमें मौके पर पहुंचीं. क्षेत्र की घेराबंदी कर लोगों को सुरक्षित दूरी पर रखा गया. अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया और तत्काल विशेष रेस्क्यू अभियान शुरू किया गया.
* ड्रोन, थर्मल कैमरा और विशेषज्ञ टीमों की मदद से चला ऑपरेशन
वन विभाग ने इस अभियान को अत्यंत संवेदनशील मानते हुए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया. बाघिन की सटीक लोकेशन पता लगाने के लिए ड्रोन, कैमरा ट्रैप, थर्मल इमेजिंग उपकरण और विशेष ट्रैकिंग टीमों को लगाया गया. रेस्क्यू चैरिटेबल ट्रस्ट, पुणे के मुख्य पशु चिकित्सक डॉ. हेमराज के नेतृत्व में अभियान संचालित किया गया. नागपुर, पुणे, अमरावती और स्थानीय वन विभाग की संयुक्त टीम ने कई घंटों तक बाघिन की गतिविधियों पर नजर रखी. झाड़ियों में छिपी बाघिन की स्थिति स्पष्ट होने के बाद वन विभाग के आरआरयू (रैपिड रिस्पॉन्स यूनिट) दल और विशेषज्ञ शूटरों ने उसे ट्रैंक्युलाइजर डार्ट मारा. डार्ट लगने के बाद कुछ समय तक वह इधर-उधर घूमती रही, लेकिन धीरे-धीरे उसका प्रभाव बढ़ा और वह बेहोश हो गई. इसके बाद वनकर्मियों ने अत्यंत सावधानी से उसे सुरक्षित पिंजरे में बंद किया. अभियान की सफलता की खबर मिलते ही घटनास्थल पर मौजूद ग्रामीणों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने राहत व्यक्त की.
* नागपुर ले जाने की तैयारी, रास्ते में बिगड़ी हालत
वन विभाग की योजना बाघिन को आगे के उपचार और निगरानी के लिए नागपुर स्थित वन्यजीव बचाव केंद्र भेजने की थी. इसके लिए उसे विशेष वाहन से रवाना किया गया. रास्ते में मोर्शी मार्ग पर तलणी फाटा स्थित अस्थायी चिकित्सा केंद्र में उसे चिकित्सकीय निगरानी हेतु रोका गया. यहां चार विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम ने लगभग डेढ़ घंटे तक उसका उपचार किया. बाघिन की शारीरिक स्थिति को स्थिर करने के प्रयास किए गए, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी हालत बिगड़ती चली गई. शाम करीब 7.30 बजे चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इसके बाद उसका शव परतवाड़ा स्थित रेस्क्यू सेंटर लाया गया, जहां पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी की गई है. जिसके उपरांत वनविभाग के नियमानुसार ‘पिंकी’ नामक मादा बाघिन के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि मौत का वास्तविक कारण विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगा.
* ‘पिंकी’ की मौत के बाद उठे कई सवाल
‘पिंकी’ बाघिन की मौत के साथ ही वन्यजीव विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों के बीच चर्चा का नया दौर शुरू हो गया है. सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सफलतापूर्वक ट्रैंक्युलाइज कर पकड़ी गई बाघिन की अचानक मौत कैसे हो गई? स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि बाघिन को एक नहीं, बल्कि दो ट्रैंक्युलाइजर डार्ट लगाए गए थे. कुछ विशेषज्ञों ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या उसकी उम्र और वजन के अनुरूप दवा की मात्रा तय की गई थी या नहीं. इसके अलावा यह भी चर्चा है कि बेहोशी के बाद उसे समय पर रिवर्सल इंजेक्शन दिया गया था या नहीं. क्या आवश्यक एंटीबायोटिक्स और अन्य जीवनरक्षक उपचार समय पर उपलब्ध कराए गए? क्या अत्यधिक तनाव और लगातार मानव बस्तियों में भटकने के कारण उसकी शारीरिक स्थिति पहले से कमजोर हो चुकी थी? हालांकि वन विभाग ने इन सभी अटकलों पर फिलहाल कोई आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार किया है. अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सकीय परीक्षण के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा.
* सांसद बलवंत वानखड़े ने उठाया था मुद्दा
लगातार हो रहे मानव हमलों के बाद क्षेत्र में जबरदस्त जनाक्रोश पैदा हो गया था. विशेष रूप से सोनोरी गांव में युवती की मौत और उसके अगले ही दिन दामू आवारे के शिकार बनने के बाद ग्रामीणों का धैर्य जवाब देने लगा था. इसी पृष्ठभूमि में सांसद बलवंत वानखड़े ने जिलाधिकारी आशीष येरेकर से चर्चा कर तत्काल प्रभावी कार्रवाई की मांग की थी. उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट रूप से मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आग्रह किया था. इसके बाद रेस्क्यू अभियान की गति बढ़ाई गई और चंद्रपुर, नागपुर तथा पुणे से विशेषज्ञ टीमों को बुलाया गया. अभियान के दौरान पूर्व सांसद नवनीत राणा और विधायक प्रवीण तायडे भी घटनास्थल पर मौजूद रहे तथा पूरी कार्रवाई पर नजर बनाए रखी.
* 18 दिनों का रक्तरंजित सफर
वन विभाग के अनुसार यह बाघिन मूल रूप से वर्धा जिले के बोर अभयारण्य क्षेत्र से बाहर निकली थी. इसके बाद वह लगातार स्थान बदलते हुए अमरावती जिले के विभिन्न इलाकों तक पहुंच गई. लगभग 18 दिनों के दौरान उसने वर्धा, मोर्शी, वरुड और चांदूर बाजार क्षेत्र में आतंक मचाया. जंगल से निकलकर खेतों और आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंचने के कारण ग्रामीणों में भय का माहौल बन गया था. इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में भय का ऐसा वातावरण बना दिया था कि लोग खेतों में अकेले जाने से डरने लगे थे. कई गांवों में किसानों ने समूह में खेतों पर जाना शुरू कर दिया था.
* मवेशियों पर भी लगातार हमले
मानवों के अलावा बाघिन ने कई गायों, बकरियों और अन्य पशुओं को भी अपना शिकार बनाया. देऊलवाड़ा, सोनोरी, भांबोरा, शिरजगांव कसबा और आसपास के गांवों में पशुधन पर हुए हमलों से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा. ग्रामीणों का आरोप था कि बाघिन लगातार जंगल छोड़कर खेतों और आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश कर रही थी, जिससे खेती-किसानी और सामान्य जीवन दोनों प्रभावित हो रहे थे.
* राहत के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष पर नई बहस
बाघिन की मौत से तत्काल खतरा जरूर समाप्त हो गया है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को एक बार फिर सामने ला दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों पर बढ़ते दबाव, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में कमी, शिकार प्रजातियों की घटती संख्या और वन्यजीव कॉरिडोर में बाधाओं के कारण बाघ अब मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि केवल किसी आदमखोर वन्यजीव को पकड़ना या मारना स्थायी समाधान नहीं है. भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जंगलों की सुरक्षा, वन्यजीव कॉरिडोर का संरक्षण, आधुनिक निगरानी प्रणाली और ग्रामीण क्षेत्रों में त्वरित चेतावनी तंत्र विकसित करना आवश्यक है.
* भय खत्म हुआ, लेकिन सवाल बाकी हैं
करीब 18 दिनों तक दो जिलों में दहशत फैलाने वाली आदमखोर बाघिन ‘पिंकी’ का अंत भले ही हो गया हो, लेकिन उसके पीछे कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई है. चार परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके हैं, अनेक किसानों को पशुधन का नुकसान झेलना पड़ा है और पूरा क्षेत्र लंबे समय तक भय के साये में जीता रहा. अब सबकी निगाहें पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह बताएगी कि आखिर सफल रेस्क्यू के बाद बाघिन की मौत किन परिस्थितियों में हुई. फिलहाल क्षेत्र को राहत जरूर मिली है, लेकिन ‘पिंकी’ की कहानी मानव-वन्यजीव संघर्ष की उस चुनौती की याद दिलाती रहेगी, जिसका समाधान आने वाले समय में प्रशासन और वन विभाग के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है.
* चार मानव बलियां, जिनसे कांप उठा पूरा क्षेत्र
– 17 अगस्त : नरसिंगपुर (वर्धा)
मंदिर में पूजा कर रहे राजाभाऊ भोयर (74) पर हमला कर बाघिन ने पहली मानव बलि ली.

– 27 अगस्त : भांबोरा (मोर्शी)
खेत में काम कर रहे किसान चरणदास ईखे (55) को अपना शिकार बनाया.

– 6 सितंबर : सोनोरी (चांदूर बाजार)
चारा काटने गई युवती उर्मिला बाजीराव इवने (22) पर हमला कर उसकी जान ले ली.

– 7 सितंबर : शिरजगांव कसबा
खेत में खाद डाल रहे किसान दिनेश उर्फ दामू आवारे (45) को मौत के घाट उतार दिया.

 

Back to top button