कोणार्क के साथ ही अर्बन एनवायरो भी सफाई ठेके के लिए अपात्र
सफाई ठेके पर नागपुर हायकोर्ट का विस्तृत फैसला आया सामने

* अमरावती मनपा का कोणार्क कंपनी के साथ हुआ ठेका करार भी रद्द
* अब पी. गोपीनाथ रेड्डी की कंपनी ही बची एकमात्र पात्र बोलीदाता
* हायकोर्ट ने मनपा को तीन सप्ताह में सफाई ठेके पर फैसला लेने का दिया निर्देश
* निविदा की शर्तों के मुताबिक कोणार्क के पास 150 हाइड्रोलिक वाहन और 12 रिफ्यूज कॉम्पैक्टर का प्रमाण नहीं
* अनुभव की अनिवार्य शर्त भी पूरी नहीं हुई, करार में बाद में दी गई वाहन संबंधी छूट पर भी अदालत की कड़ी टिप्पणी
* अब सभी की निगाहे मनपा के अगले कदम पर, मनपा प्रशासन के लिए फैसला किसी झटके की तरह
अमरावती/नागपुर/दि.9 – अमरावती महानगरपालिका के बहुचर्चित कचरा संकलन एवं परिवहन ठेके को लेकर मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कोणार्क इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और अर्बन एनवायरो वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड को संबंधित निविदा में भाग लेने के लिए अपात्र घोषित कर दिया है. अदालत ने कोणार्क के साथ मनपा द्वारा किया गया 28 नवंबर 2025 का करार भी रद्द कर दिया है. वहीं, इस निविदा में तकनीकी रूप से पात्र बची पी. गोपीनाथ रेड्डी की बोली पर मनपा को नए सिरे से विचार कर निर्णय लेने का आदेश दिया गया है. इस फैसले को अमरावती मनपा के लिए किसी झटके से कम नहीं माना जा रहा. जहां गतरोज इस मामले को लेकर नागपुर हायकोर्ट का ‘ऑपरेटीव ऑर्डर’ सामने आया था. वहीं आज अदालत के फैसले की विस्तृत प्रतिलिपी भी सामने आ गई है. जिससे पूरी स्थिती स्पष्ट हो गई है.
इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अनिल एस. किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश आर. व्यास की खंडपीठ ने 2 सितंबर 2026 को दिए अपने मौखिक निर्णय में स्पष्ट किया कि निविदा में निर्धारित अनिवार्य पात्रता शर्तों का पालन बोली के मूल्यांकन के समय ही होना आवश्यक था. बाद में किए गए करार में शर्तों में बदलाव अथवा छूट देकर किसी अपात्र बोलीदाता को पात्र नहीं बनाया जा सकता. अदालत ने मनपा को निर्देश दिया है कि यदि पी. गोपीनाथ रेड्डी की बोली पर विचार करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है, तो उसे एकमात्र पात्र बोलीदाता के रूप में ठेका देने पर निर्णय लिया जाए. इस संबंध में निर्णय हाईकोर्ट के फैसले की प्रति उपलब्ध कराए जाने की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर लेना होगा.
अमरावती शहर के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहनेवाले इस मामले में याचिकाकर्ता पी. गोपीनाथ रेड्डी कंपनी की ओर से वरिष्ठ विधिज्ञ एड. जुगलकिशोर गिल्डा, एड. अश्विन देशपांडे व एड. वेदांत पांडे ने सफल युक्तिवाद किया. जबकि राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी अभियोक्ता एड. एन. एस. राव तथा अमरावती मनपा की ओर से एड. आर. डी. धर्माधिकारी ने पैरवी की. वहीं कोणार्क इन्फ्रास्ट्रक्चर लि. व अर्बन एनवायरो वेस्ट मैनेजमेंट लि. की ओर से किसी भी अधिवक्ता की पैरवी हेतु अदालत में उपस्थिती नहीं रही.
* 8 अक्तूबर 2025 को निकली थी निविदा
बता दे कि, पूरा मामला मनपा द्वारा 8 अक्तूबर 2025 को जारी निविदा क्रमांक- एएमसी/एसडी/एसडब्ल्यूएमटीईएन/01/2025 से संबंधित है. इस निविदा का उद्देश्य अमरावती शहर के नगरपालिका ठोस कचरे का संकलन कर उसे सुकली/आकोली कंपोस्ट डिपो स्थित प्रसंस्करण संयंत्र अथवा निपटान स्थल तक पहुंचाने के लिए सर्विस ऑपरेटर का चयन करना था. 14 अक्तूबर 2025 को प्री-बिड बैठक हुई थी. इसमें प्रतिभागियों द्वारा कुछ स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद मनपा ने 17 अक्तूबर को कॉरिजेंडम जारी किया. इसके बाद पी. गोपीनाथ रेड्डी सहित तीन कंपनियों को तकनीकी रूप से सफल घोषित किया गया. इनमें कोणार्क इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और अर्बन एनवायरो वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड भी शामिल थीं. तकनीकी निविदा के दस्तावेज सामने आने के बाद पी. गोपीनाथ रेड्डी कंपनी ने दोनों प्रतिस्पर्धी कंपनियों की पात्रता पर गंभीर आपत्तियां उठाईं.
* 150 हाइड्रोलिक वाहनों की अनिवार्य शर्त
पी. गोपीनाथ रेड्डी की ओर से अदालत में मुख्य आपत्तियों में से एक टेंडर की धारा 2.9 (ई) से संबंधित थी. इस शर्त के तहत बोलीदाता के नाम पर पिछले सात वर्षों के भीतर पंजीकृत कम से कम 150 हाइड्रोलिक सिस्टम वेस्ट कलेक्शन वाहन होना अनिवार्य था. प्रत्येक वाहन का आरसी बुक भी स्वामित्व के प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत करना जरूरी था. याचिकाकर्ता का आरोप था कि कोणार्क द्वारा प्रस्तुत वाहनों में बड़ी संख्या ऐसे वाहनों की थी, जो टेंडर में निर्धारित हाइड्रोलिक सिस्टम वेस्ट कलेक्शन वाहन की श्रेणी में नहीं आते थे. दस्तावेजों में गार्बेज टिपर, ट्रैक्टर, गार्बेज वैन, डंपर प्लेसर, टिल्ट कैब और अन्य मशीनरी का उल्लेख था. मनपा ने इसका बचाव करते हुए कहा था कि ऐसे वाहन भी कचरा परिवहन में व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं और संबंधित अधिकारियों ने वाहनों का सत्यापन किया है. लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि आवश्यक पात्रता के अनुरूप हाइड्रोलिक सिस्टम वेस्ट कलेक्शन वाहनों के स्वामित्व का पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया था.
* 12 रिफ्यूज कॉम्पैक्टर भी नहीं मिले पात्र
निविदा की धारा 2.9 (जी) के तहत कम से कम 12 रिफ्यूज कॉम्पैक्टर होना अनिवार्य था और प्रत्येक का आरसी बुक स्वामित्व के प्रमाण के रूप में देना था. अदालत ने पाया कि प्रस्तुत दस्तावेजों में किसी भी आरसी बुक से यह स्पष्ट नहीं होता कि संबंधित वाहन वास्तव में रिफ्यूज कॉम्पैक्टर है. अदालत ने इसे निविदा की अनिवार्य शर्त का पालन नहीं माना. इसके अलावा, कोणार्क द्वारा प्रस्तुत कई वाहनों का स्वामित्व कोणार्क ग्रीन एनवायरो के नाम पर था, जो कोणार्क की सहायक कंपनी बताई गई. मनपा ने अदालत में कहा कि कोणार्क के पास इस कंपनी के 10 हजार में से 9,900 शेयर हैं, इसलिए स्वामित्व संबंधी शर्त पूरी होती है. लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि, केवल शेयरधारिता पर्याप्त नहीं है. यदि वाहन सहायक कंपनी के नाम पर हैं तो निविदा की शर्त के अनुसार उन्हें वैध समझौते के तहत संचालित और अनुरक्षित किए जाने का दस्तावेजी प्रमाण होना चाहिए था, जो रिकॉर्ड पर नहीं था. अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किया कि कोणार्क ग्रीन एनवायरो का गठन 29 जून 2022 को हुआ था, जबकि सूची में शामिल कुछ वाहन वर्ष 2013 में ही पंजीकृत थे. ऐसे में उन वाहनों के स्वामित्व और उनके वैध उपयोग को लेकर आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए.
* तीन वर्ष का लगातार अनुभव भी पूरा नहीं
कोणार्क की पात्रता को प्रभावित करने वाला एक और महत्वपूर्ण बिंदु अनुभव की अनिवार्य शर्त थी. निविदा में पिछले सात वर्षों में लगातार कम से कम तीन वर्ष तक डोर-टू-डोर कचरा संकलन और उसे डंपिंग स्थल तक पहुंचाने का अनुभव होना जरूरी था. इसके साथ एक परियोजना में न्यूनतम 150 टीपीडी या दो परियोजनाओं में 180 टीपीडी की क्षमता का अनुभव निर्धारित किया गया था. कोणार्क ने उल्हासनगर महानगरपालिका के अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे. अदालत के अनुसार, 1 मार्च 2024 का प्रमाणपत्र कोणार्क एनवायरो प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड, यानी सहायक कंपनी के नाम पर था और 5 दिसंबर 2013 से 31 मार्च 2023 तक का अनुभव दर्शाता था. वहीं, 12 अगस्त 2025 का प्रमाणपत्र कोणार्क के नाम पर था, लेकिन उसमें 1 अप्रैल 2023 से 8 अक्टूबर 2025 तक का अनुभव बताया गया था. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1 अप्रैल 2023 से 8 अक्टूबर 2025 तक की अवधि तीन वर्ष पूरी नहीं करती. इसलिए निविदा जारी होने की तारीख तक लगातार तीन वर्ष के अनिवार्य अनुभव की शर्त पूरी नहीं हुई. अदालत ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों से कोणार्क के पास निर्धारित कार्य का आवश्यक अनुभव नहीं, बल्कि मुख्य रूप से ऑपरेटर के रूप में अनुभव दिखाई देता है.
* अर्बन एनवायरो भी पात्रता पूरी नहीं कर सकी
हाईकोर्ट ने केवल कोणार्क ही नहीं, बल्कि अर्बन एनवायरो वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड की पात्रता पर भी सवालों को स्वीकार किया. अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि अर्बन एनवायरो भी निविदा की आवश्यक अनुभव संबंधी शर्तों को पूरा नहीं करती थी. इस तरह वित्तीय बोली खोलने के लिए तकनीकी रूप से सफल घोषित किए गए तीन बोलीदाताओं में से दो-कोणार्क और अर्बन एनवायरो-को हाईकोर्ट ने अपात्र करार दिया. नतीजतन पी. गोपीनाथ रेड्डी कंपनी ही एकमात्र ऐसी बोलीदाता बचती है, जिसे अदालत के समक्ष उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे बढ़ने योग्य माना गया है.
* करार में बाद में जोड़ी गई शर्त बनी बड़ा मुद्दा
मामले में सबसे गंभीर पहलुओं में से एक 28 नवंबर 2025 को मनपा और कोणार्क के बीच हुए करार में मूल निविदा की शर्तों से अलग प्रावधान शामिल किया जाना था. अदालत ने विशेष रूप से करार की धारा 31.1 का उल्लेख किया. इसके तहत ठेकेदार को आवश्यक वाहनों की व्यवस्था करनी थी और नए खरीदे गए वाहनों को उपलब्ध कराने का प्रावधान था. साथ ही आयुक्त को ऐसी गाड़ियों के संचालन की अनुमति देने का अधिकार दिया गया था, जिन्हें 1 अप्रैल 2025 से दो वर्ष पहले तक खरीदा गया हो. हाईकोर्ट ने माना कि यह छूट मूल निविदा में निर्धारित नहीं थी और इससे कोणार्क को पुराने वाहनों के उपयोग की ऐसी राहत मिल गई, जो मूल निविदा की अनिवार्य शर्तों के अनुरूप नहीं होती. अदालत ने साफ कहा कि बोली प्रक्रिया पूरी होने और बोलीदाताओं द्वारा निर्धारित शर्तों के आधार पर अपनी दरें प्रस्तुत करने के बाद करार के स्तर पर ऐसी नई शर्त नहीं जोड़ी जा सकती, जिससे किसी एक बोलीदाता को फायदा हो या अनिवार्य पात्रता शर्त कमजोर हो जाए.
* ‘बाद का करार’ अपात्रता को ठीक नहीं कर सकता
खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि निविदा में निर्धारित पात्रता का परीक्षण बोली के मूल्यांकन के समय ही होना चाहिए. यदि कोई बोलीदाता उस समय अनिवार्य शर्त पूरी नहीं करता, तो बाद में किए गए वर्क ऑर्डर या करार में नई शर्तें जोड़कर उसकी कमी दूर नहीं की जा सकती. अदालत ने इसी आधार पर कहा कि कोणार्क की वाहन और अनुभव संबंधी मूल पात्रता में जो कमी थी, उसे बाद में किए गए करार से वैध नहीं बनाया जा सकता. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निविदा प्रक्रिया में सभी बोलीदाताओं के साथ निष्पक्षता और समान व्यवहार जरूरी है.
* 28 नवंबर का सात वर्षीय करार अब रद्द
कोणार्क के साथ किया गया करार 28 नवंबर 2025 से सात वर्ष यानी 84 महीने के लिए था. हाईकोर्ट ने कहा कि इस अवधि का पर्याप्त हिस्सा अभी बाकी है. इसलिए करार को रद्द करना आवश्यक है. अदालत ने स्पष्ट आदेश में कहा कि, कोणार्क और अर्बन एनवायरो दोनों को 8 अक्टूबर 2025 की संबंधित निविदा में भाग लेने के लिए अपात्र घोषित किया जाता है. मनपा और कोणार्क के बीच 28 नवंबर 2025 का करार रद्द और निरस्त किया जाता है. मनपा पी. गोपीनाथ रेड्डी की निविदा पर विचार करे. यदि उसे ठेका देने में कोई कानूनी बाधा नहीं है और वह एकमात्र पात्र बोलीदाता है अथवा अन्यथा पात्रता पूरी करती है, तो उसके पक्ष में ठेका देने पर निर्णय लिया जाए. मनपा को यह निर्णय तीन सप्ताह के भीतर लेना होगा.
* नई व्यवस्था होने तक कोणार्क से ही जारी रहेगा कचरा उठाव
हाईकोर्ट ने करार रद्द करने के बावजूद शहर की सफाई व्यवस्था को अचानक ठप होने से बचाने के लिए अंतरिम व्यवस्था भी तय की है. अदालत ने निर्देश दिया है कि जब तक मनपा पी. गोपीनाथ रेड्डी की निविदा पर निर्णय नहीं लेती, तब तक सुकली/आकोली प्रसंस्करण स्थल तक नगरपालिका ठोस कचरे के संकलन एवं परिवहन का काम कोणार्क के माध्यम से जारी रखा जाएगा. इसका अर्थ यह है कि हाईकोर्ट के फैसले के तत्काल बाद शहर में कचरा उठाने की व्यवस्था बंद नहीं होगी. नई व्यवस्था अथवा नए ठेकेदार का निर्णय होने तक वर्तमान कार्य जारी रखा जाएगा.
* रेड्डी को ठेका नहीं मिला तो क्या होगा?
फैसले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पी. गोपीनाथ रेड्डी कंपनी को सीधे ठेका मिल जाएगा. अदालत ने रेड्डी कंपनी को स्वत: ठेका देने का आदेश नहीं दिया है. अदालत ने मनपा को उसकी निविदा पर कानून और निविदा की शर्तों के अनुरूप विचार कर निर्णय लेने को कहा है. इसलिए मनपा प्रशासन को अब रेड्डी की बोली का विस्तृत परीक्षण करना होगा. यदि कोई कानूनी अथवा तकनीकी बाधा सामने आती है और उसे ठेका देना संभव नहीं होता, तो निविदा प्रक्रिया को नए सिरे से आगे बढ़ाने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है.
* पहले से विवादों में था कोणार्क का सफाई ठेका
अमरावती मनपा का कोणार्क के साथ किया गया सफाई और कचरा परिवहन करार शुरुआत से ही विवादों में रहा है. निविदा प्रक्रिया से लेकर कंपनी के कामकाज और करार की शर्तों तक पर पार्षदों ने सवाल उठाए थे. नई निर्वाचित आमसभा के शुरुआती दौर में ही कोणार्क के ठेके को लेकर तीखी आपत्तियां सामने आई थीं. स्वच्छता अभ्यास गट ने भी ठेके की शर्तों और बाद में किए गए करार का अध्ययन कर कई मुद्दे उठाए थे. कुछ पार्षदों ने आरोप लगाया था कि मूल निविदा और अंतिम करार के बीच महत्वपूर्ण अंतर हैं तथा करार में ऐसी शर्तें शामिल की गईं, जिनसे कंपनी को लाभ पहुंच सकता है. इन आरोपों को लेकर कार्रवाई और जांच की मांग भी लगातार होती रही. अब हाईकोर्ट के फैसले में भी मूल निविदा की शर्तों से अलग करार में प्रावधान जोड़े जाने को गंभीरता से दर्ज किया गया है. इससे पहले उठाई गई आपत्तियों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है.
* मनपा के सामने अब तीन सप्ताह की चुनौती
हाईकोर्ट ने मनपा को स्पष्ट समयसीमा दे दी है. अब प्रशासन के सामने तीन सप्ताह के भीतर अगला निर्णय लेने की चुनौती है. एक ओर शहर की रोजाना सफाई और कचरा परिवहन व्यवस्था को सुचारु रखना है, वहीं दूसरी ओर अदालत के फैसले के अनुरूप निविदा प्रक्रिया को कानूनी रूप से आगे बढ़ाना है. मनपा प्रशासन आदेश की विस्तृत प्रतिलिपि का अध्ययन कर यह भी तय कर सकता है कि फैसले के खिलाफ कोई अन्य कानूनी उपाय अपनाया जाना है या नहीं. फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले ने कोणार्क के सात वर्षीय सफाई ठेके की नींव ही हिला दी है और पी. गोपीनाथ रेड्डी कंपनी को दोबारा मैदान में सबसे मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है. अब अमरावती शहर की निगाहें मनपा प्रशासन के उस निर्णय पर टिकी हैं, जो अगले तीन सप्ताह में इस बहुचर्चित सफाई ठेके का भविष्य तय करेगा.





