हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम 1956 लागू होने के बाद
पुरानी रूढ़ियों और परंपराओं से ज्यादा कानून को प्राथमिकता : हाईकोर्ट

नागपुर/दि.27 – हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद यदि किसी विधवा महिला को बच्चा गोद लेना हो, तो उसके लिए पति द्वारा जीवित रहते दी गई अनुमति आवश्यक नहीं है, ऐसा महत्वपूर्ण फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने दिया है. दत्तक लेने के पीछे पति का नाम और वंश आगे बढ़े, ऐसी भावना भले हो, लेकिन इससे यह नहीं माना जा सकता कि दत्तक ‘पति के लिए’ लिया गया है, ऐसा न्यायमूर्ति रोहित जोशी की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया.
* 1984 से संपत्ति विवाद
नागपुर के सावनेर तहसील में भगवान नामक व्यक्ति की जमीन के वारिसाना हक को लेकर लगभग चार दशकों से यह विवाद चल रहा था. भगवान के बेटे घनश्याम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी चंद्रभागा ने 1971 में जगदीश जीवतोडे को गोद लिया था. हालांकि, भगवान की बेटी अन्नपूर्णा के वारिसों ने इस दत्तक प्रक्रिया को चुनौती देते हुए दावा किया कि चंद्रभागा के पास पति की स्पष्ट अनुमति नहीं थी, इसलिए दत्तक अमान्य है.
संबंधित पक्षों पर ‘बनारस स्कूल ऑफ हिंदू लॉ’ लागू होता है और उस प्रथा के अनुसार विधवा को पति की स्पष्ट सहमति के बिना बच्चा गोद लेने का अधिकार नहीं है. दत्तक पत्र में ‘पति का नाम और परिवार आगे बढ़े’ ऐसा उल्लेख होने के कारण यह दत्तक पति के लिए लिया गया था और इसलिए हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 8 लागू नहीं होती, ऐसा उनका दावा था.
* जिला न्यायालय को शीघ्र सुनवाई के निर्देश
इस बीच, जिला न्यायालय ने दत्तक को वैध ठहराते हुए वादियों को संपत्ति में आधा हिस्सा देने और बंटवारे का आदेश दिया था. हालांकि, मूल वाद में बंटवारे और अलग कब्जे की मांग ही नहीं की गई थी. संबंधित पक्षों को इस संबंध में स्वतंत्र रूप से दलील रखने का अवसर दिए बिना ऐसा राहत देना उचित नहीं था, ऐसा हाईकोर्ट ने कहा. इसलिए बंटवारे से संबंधित आदेश रद्द करते हुए यह मुद्दा नए सिरे से विचार के लिए प्रथम अपील न्यायालय को वापस भेज दिया गया. हालांकि, दत्तक वैध होने का निष्कर्ष बरकरार रखा गया है. यह संपत्ति विवाद 1984 में दायर दीवानी मुकदमे से शुरू हुआ था. पूरे 42 वर्षों बाद भी मामला लंबित होने पर हाईकोर्ट ने प्रथम अपील न्यायालय को जल्द से जल्द फैसला देने के निर्देश दिए.





