10 साल पहले 9 करोड की लागत से बनी इमारत हुई भंगार

चिखलदरा स्थित एकलव्य आश्रमशाला दुरावस्था का शिकार

* अब साढे 4 करोड की लागत से रिपेरिंग का काम हुआ शुरु
* सन 2011 में बनी इमारत 10 साल में ही रहनेलायक नहीं
चिखलदरा/दि.25 – मेलघाट के आदिवासी बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छे खानपान की सुविधा उपलब्ध कराते हुए उनका जीवनस्तर सुधारने के उद्देश्य को सामने रखकर सरकार द्वारा चिखलदरा में सीबीएसई पैटर्न वाली एकलव्य स्कूल के लिए आदिवासी विकास विभाग की निधि से 9 करोड रुपए खर्च कर सन 2011 में एकलव्य आश्रमशाला की इमारत तैयार की गई थी. जिसमें सैकडों आदिवासी बच्चे पढाई-लिखाई करते हुए अपना भविष्य सुधारने के लिए मेहनत कर रहे थे. मगर नाशिक की महाराष्ट्र ट्रायबल सोसायटी द्वारा बनाई गई यह इमारत अगले 10 साल में ही किसी के रहनेलायक नहीं बची है. जिसके चलते इस इमारत का प्रयोग वर्ष 2021 से करना बंद कर दिया गया. साथ ही अब करीब साढे 4 करोड रुपयों की लागत लगाते हुए इस इमारत को दुरुस्त करने का काम किया जा रहा है.
जानकारी के मुताबिक वर्ष 2011 में 9 करोड रुपयों की लागत से बनी एकलव्य आश्रमशाला की इमारत में अगले 10 साल में ही दीवार की पपडियां गिरने लगी तथा स्लैब के उपर चलने पर कंपन महसूस होने लगा था. साथ ही यहां पर किए गए प्लंबिंग एवं इलेक्ट्रीक फिटींग के काम में भी दिक्कत महसूस होने लगी थी और सन 2021 में तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ने इस इमारत को रहनेयोग्य नहीं बताया था. जिसके चलते वर्ष 2022 में अचलपुर तहसील अंतर्गत बडगांव में एक इमारत को किराए पर लेकर एकलव्य आश्रमशाला को वहां पर स्थलांतरित किया गया था. जहां पर असहनीय हालात के बीच आदिवासी बच्चे रहने और पढाई करने के लिए मजबूर है. वहीं दूसरी ओर अब चिखलदरा स्थित एकलव्य आश्रमशाला की रिपेंरिंग हेतु साढे 4 करोड रुपयों की लागत वाला टेंडर आदिवासी विकास विभाग द्वारा सार्वजनिक लोकनिर्माण विभाग के मार्फत निकालते हुए इसका काम करना शुरु किया गया है.
सार्वजनिक लोकनिर्माण विभाग के जानकार बताते है कि, किसी भी नई इमारत का जीवनमान 40 से 50 वर्ष का होता है और उसकी थोडी-बहुत देखभाल व दुरुस्ती का काम निर्माण के 20 से 25 साल बाद निकलना चाहिए, परंतु महज 10 वर्ष पहले 9 करोड रुपयों की लागत से बनी इमारत 10 वर्ष के भीतर ही रहने के लिए पूरी तरह से अयोग्य हो जाए और फिर उसी इमारत की रिपेरिंग के लिए साढे 4 करोड रुपयों की लागत वाली निविदा जारी की जाए. इसे खुले तौर पर सरकारी निधि की लूट कहा जा सकता है. लेकिन इसे लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों सहित सभी अधिकारियों द्वारा संदेहास्पद ढंग से चुप्पी साधकर रखी गई है. ऐसे में आरोप लगाया जा रहा है कि, आदिवासियों की सुख-सुविधा और उन्हें मुख्य धारा से जोडने हेतु किए जा रहे सरकारी प्रयासों को खुद अधिकारियों द्वारा ही सेंध लगाने का काम किया जा रहा है. जिसके चलते मेलघाट की समस्याएं हल नहीं हो रही है और इस क्षेत्र का विकास भी नहीं हो रहा.

Back to top button