डफरीन अग्निकांड में उच्चस्तरीय समिति ने सरकार को सौंपी रिपोर्ट

तीन मासूमों की मौत में ‘सिस्टम’ की कई कड़ियां घेरे में

* एसएनसीयू स्टाफ को फायर सिस्टम का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं
* फायर ऑडिट में भी लापरवाही के संकेत
* वेंटिलेटर-वॉर्मर की खरीद से लेकर तकनीकी मंजूरी
* रखरखाव और सुरक्षा व्यवस्था तक उठे सवाल
* पीडब्ल्यूडी और अग्निशमन तंत्र की भूमिका भी जांच के दायरे में
अमरावती/दि.8- अमरावती के जिला स्त्री अस्पताल (डफरीन) में 24 अगस्त की तड़के हुए अग्निकांड में तीन नवजात शिशुओं की मौत के मामले ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. घटना की जिम्मेदारी तय करने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति ने सोमवार, 7 सितंबर को अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी. रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार इसमें अस्पताल प्रशासन के साथ-साथ पीडब्ल्यूडी, अग्निशमन व्यवस्था, फायर ऑडिट और एसएनसीयू की आपातकालीन तैयारियों को लेकर गंभीर कमियां सामने आई हैं.
जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक समिति ने यह भी पाया कि एसएनसीयू में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों को स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म, वॉटर स्प्रिंकलर, फायर पंप, रेस्क्यू मैनेजमेंट और नाइट मॉक ड्रिल के संबंध में पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि जीवनरक्षक नवजातों वाले विभाग में अग्नि सुरक्षा की आधुनिक प्रणालियां उपलब्ध थीं, लेकिन उन्हें आपात स्थिति में संचालित करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण ही नहीं था, तो सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?
* सुरक्षा उपकरणों के बावजूद प्रशिक्षण का अभाव
डफरीन के एसएनसीयू में नवजात शिशु गंभीर अवस्था में उपचाराधीन रहते हैं. ऐसे विभाग में आग जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए कर्मचारियों को केवल उपकरणों की जानकारी ही नहीं, बल्कि नियमित व्यावहारिक प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल भी जरूरी होती है. समिति की रिपोर्ट से संबंधित जानकारी के अनुसार एसएनसीयू कर्मचारियों को स्मोक डिटेक्टर से संकेत मिलने के बाद की जाने वाली कार्रवाई, फायर अलार्म सक्रिय करने, वॉटर स्प्रिंकलर और फायर पंप के इस्तेमाल, नवजातों की आपातकालीन निकासी तथा रेस्क्यू मैनेजमेंट का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला था. रिपोर्ट में नाइट मॉक ड्रिल के अभाव अथवा प्रभावी ढंग से नहीं होने को भी गंभीर कमी के तौर पर देखा गया है. रात के समय अचानक आग लगने की स्थिति में स्टाफ किस तरह प्रतिक्रिया देगा, इसके लिए नियमित अभ्यास नहीं होने से आपदा के दौरान भ्रम और देरी की आशंका बढ़ जाती है.
* फायर ऑडिट में भी लापरवाही के संकेत
डफरीन अग्निकांड के बाद सबसे ज्यादा सवाल फायर ऑडिट को लेकर उठे थे. अब समिति की रिपोर्ट में भी इस पहलू को महत्वपूर्ण माना गया है. सूत्रों के अनुसार अस्पताल प्रशासन ने फायर ऑडिट के लिए पीडब्ल्यूडी को पत्र दिए थे, लेकिन अपेक्षित समय में कार्रवाई नहीं हुई. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख होने की जानकारी है कि जनवरी और जुलाई में नियमित फायर ऑडिट किया जाना अपेक्षित था, लेकिन इस प्रक्रिया में लापरवाही और देरी हुई. यही कारण है कि समिति की जांच का दायरा अस्पताल प्रशासन से आगे बढ़कर पीडब्ल्यूडी और अग्निशमन व्यवस्था तक पहुंचा. संबंधित विभागों के बीच हुए पत्राचार, तकनीकी दस्तावेज, ऑडिट रिपोर्ट और अधिकारियों के बयान भी जांच का हिस्सा बनाए गए.
* अस्पताल प्रशासन तथा पीडब्ल्यूडी के दावों में विरोधाभास
अग्निकांड के बाद फायर ऑडिट को लेकर अस्पताल प्रशासन और पीडब्ल्यूडी के विद्युत विभाग के दावों में विरोधाभास सामने आया था. अस्पताल प्रशासन की ओर से कहा गया कि फायर ऑडिट के लिए संबंधित विभाग को पत्राचार किया गया था, जबकि पीडब्ल्यूडी की ओर से सुरक्षा व्यवस्था की जांच और आवश्यक कार्यवाही किए जाने का दावा किया गया. इन परस्पर विरोधी दावों की समिति ने पड़ताल की. अब रिपोर्ट में किसकी भूमिका कितनी रही और किस स्तर पर चूक हुई, इसे लेकर सरकार के निर्णय का इंतजार है. यदि समिति की सिफारिशों को शासन स्वीकार करता है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई अथवा अन्य वैधानिक कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है.
* वेंटिलेटर और वॉर्मर की खरीद भी सवालों के घेरे में
अग्निकांड के बाद अस्पताल में इस्तेमाल किए जा रहे वेंटिलेटर और वॉर्मर की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए. आरोप यह भी लगाया गया कि कुछ उपकरण अपेक्षित गुणवत्ता के नहीं थे और एक विशेष कंपनी से उपकरणों की खरीद के लिए कथित तौर पर अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाया गया. हालांकि, इन आरोपों को अंतिम तथ्य मानने से पहले तकनीकी जांच और सरकारी स्तर पर निष्कर्ष आवश्यक है. लेकिन यदि किसी जीवनरक्षक उपकरण की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं तो उसकी खरीद, तकनीकी परीक्षण, निविदा प्रक्रिया, गुणवत्ता प्रमाणन, इंस्टॉलेशन, कमीशनिंग और रखरखाव की पूरी श्रृंखला की जांच स्वाभाविक रूप से जरूरी हो जाती है. यही कारण है कि अब जांच का महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जिस उपकरण से घटना की शुरुआत होने की बात सामने आई, उसका तकनीकी परीक्षण कब और किसने किया था तथा घटना से पहले उसके रखरखाव या खराबी से संबंधित कोई शिकायत दर्ज हुई थी या नहीं.
* तकनीकी मंजूरी देने वाले भी जांच के दायरे में
जीवनरक्षक उपकरणों की सरकारी खरीद में तकनीकी विशेषज्ञों और खरीद समिति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में यदि उपकरणों की गुणवत्ता पर सवाल साबित होते हैं तो केवल आपूर्ति करने वाली कंपनी ही नहीं, बल्कि तकनीकी मंजूरी देने वाले अधिकारियों और खरीद प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी जांचना जरूरी होगा. जांच के दौरान यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि उपकरण की गुणवत्ता किस आधार पर स्वीकार की गई, प्रमाणपत्रों की जांच कैसे हुई और अस्पताल में लगाने के बाद उसकी कार्यक्षमता का परीक्षण किस स्तर पर किया गया.
* रात की ड्यूटी से लेकर रेस्क्यू व्यवस्था तक सवाल
घटना के समय एसएनसीयू में तैनात स्टाफ की भूमिका को लेकर भी आरोप सामने आए थे. कुछ रिपोर्टों में रात के समय कर्मचारियों के पर्याप्त सतर्क नहीं होने के आरोप लगाए गए. लेकिन अब समिति की रिपोर्ट में कर्मचारियों के प्रशिक्षण की कमी सामने आने की जानकारी के बाद जिम्मेदारी का सवाल और जटिल हो गया है. यदि कर्मचारियों को फायर सिस्टम और रेस्क्यू मैनेजमेंट का पर्याप्त प्रशिक्षण ही नहीं दिया गया था, तो आपात स्थिति में उनसे किस स्तर की प्रतिक्रिया की अपेक्षा की गई थी? इसका जवाब केवल ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों से नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रशासनिक अधिकारियों से भी मांगा जाना जरूरी है.
* 24 अगस्त की वह भयावह रात
बता दे कि, 24 अगस्त को तड़के करीब 3.30 बजे एसएनसीयू में कथित रूप से वेंटिलेटर में विस्फोट के बाद आग लगी थी. वार्ड में नवजात शिशुओं के उपचार के कारण स्थिति बेहद संवेदनशील थी. आग और धुएं के बीच डॉक्टरों, नर्सों तथा अन्य कर्मचारियों ने बच्चों को सुरक्षित निकालने का प्रयास किया, लेकिन तीन नवजातों को नहीं बचाया जा सका. बाद में प्राथमिक पोस्टमार्टम जांच में दो नवजातों की मौत गंभीर रूप से झुलसने तथा तीसरे की मौत धुएं के कारण सांस रुकने से होने की जानकारी सामने आई. एक नवजात का करीब 75.5 प्रतिशत शरीर झुलस गया था, जबकि दूसरे के शरीर का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा जला था. तीसरे नवजात के शरीर पर करीब चार प्रतिशत जलने के निशान थे, लेकिन धुआं श्वसन मार्ग में पहुंचने के कारण उसकी सांस रुक गई थी.
* 11 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति ने की जांच
घटना के तत्काल बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश पर उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई. समिति की अध्यक्षता राज्य स्वास्थ्य सेवा आयुक्त डॉ. संजय काटकर ने की, जबकि स्वास्थ्य उपनिदेशक (परिवहन) जयंत मुले समिति के सचिव/सदस्य सचिव थे. समिति में स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, विद्युत सुरक्षा और अग्निशमन क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल किया गया था. जिनमें प्रादेशिक बायोमेडिकल/तकनीकी अधिकारी (अकोला परिमंडल) नितीन सावले, तकनीकी अधिकारी (छत्रपति संभाजीनगर) मनीष मगरे, विद्युत मंडल (दक्षता) अधीक्षक अभियंता दयानंद बहात्रे (छत्रपति संभाजीनगर), चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संचालनालय के प्रतिनिधि डॉ. सुशांत माने, आईडीडब्ल्यू के अधीक्षक अभियंता अविनाश धोंडगे, अग्निशमन सेवा महाविद्यालय (नागपुर) के निदेशक सुधीर इंगले, एम्स नागपुर के कार्यकारी निदेशक डॉ. निशांत बनाईत, स्वास्थ्य सेवा निदेशक (अस्पताल) डॉ. नितीन अंबाडेकर तथा अशासकीय सदस्य के तौर पर पत्रकार गजानन मोहोड समावेश था. समिति ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के साथ संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए तथा अग्निशमन, विद्युत व्यवस्था, उपकरणों के रखरखाव और फायर ऑडिट से संबंधित दस्तावेजों की जांच की.
* भविष्य के लिए व्यापक सुरक्षा सुधार की सिफारिश
सूत्रों के अनुसार समिति ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सरकारी अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया है. इसमें नियमित फायर एवं इलेक्ट्रिकल ऑडिट, एसएनसीयू-एनआईसीयू-आईसीयू कर्मचारियों का विशेष प्रशिक्षण, नियमित मॉक ड्रिल, नाइट मॉक ड्रिल, अग्निशमन उपकरणों की कार्यक्षमता जांच, आपातकालीन निकासी योजना और बायोमेडिकल उपकरणों की स्वतंत्र तकनीकी जांच जैसे उपाय शामिल हैं.
* अब असली परीक्षा सरकार की
रिपोर्ट सरकार तक पहुंच चुकी है. अब सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होगा, रिपोर्ट के निष्कर्षों पर सरकार क्या कार्रवाई करती है? यदि किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो जवाबदेही तय होनी चाहिए. यदि फायर ऑडिट में चूक हुई है तो उसकी जिम्मेदारी निश्चित होनी चाहिए. यदि उपकरणों की गुणवत्ता पर आरोप सही साबित होते हैं तो खरीद प्रक्रिया से लेकर आपूर्ति और तकनीकी मंजूरी तक पूरी श्रृंखला की जांच होनी चाहिए. और यदि कर्मचारियों को प्रशिक्षण नहीं दिया गया था तो यह भी तय होना चाहिए कि प्रशिक्षण की जिम्मेदारी किसकी थी. डफरीन अग्निकांड इसलिए केवल अमरावती का मामला नहीं है. यह राज्य के सरकारी अस्पतालों की सुरक्षा संस्कृति, प्रशासनिक जवाबदेही और जीवनरक्षक उपकरणों की खरीद व्यवस्था की भी परीक्षा है. तीन नवजातों की मौत का दर्द तभी कम होगा, जब जांच रिपोर्ट केवल फाइल बंद करने का दस्तावेज न बने, बल्कि जिम्मेदारी तय करने और पूरी व्यवस्था बदलने का आधार बने.

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