रेत उत्खनन से अनावश्यक डोह निर्मिति, जिले की जल व्यवस्था खतरे में

नदी किनारों के टूटकर बहने की संभावना

* अगले सीजन में रेत संग्रह की होगी दिक्कत
* बारिश में उफान पर रहनेवाली नदियां गर्मी में सूख रही
* कुओें व बोअरवेल का जलस्तर तेजी से घट रहा
* जल किल्लत का मानवीय जीवन पर दूरगामी परिणाम
अमरावती /दि.5– इन दिनों जिले में अलग-अलग स्थानों पर स्थित लगभग सभी रेतीघाटों पर जमकर हुए रेत उत्खनन की वजह से नदी के जलपात्रों मे ं बडे-बडे डोह यानी गढ्ढे बन गये हैं. जिसके चलते जल परिसंस्था को खतरे में कहा जा सकता है. ज्ञात रहे कि सामने बारिश का मौसम है और बारिश के मौसम दौरान सभी नदियों में बाढ वाली स्थिति रहती है. जब पानी का प्रवाह काफी जबर्दस्त ढंग से तेज रहता है. जिसके चलते बडे- बडे गढ्ढों में पानी भर जाने की वजह से नदी किनारे वाले क्षेत्रों में जलस्तर की समस्या रहने के साथ-साथ अगले सीजन के दौरान रेत संग्रह को लेकर भी दिक्तत रहेगी. इसके अलावा रेतीघाटों के जमकर किए जाते रेत उत्खनन की वजह से होनेवाली दिक्कतों का मानवीय जीवन पर भी दूरगामी परिणाम हो सकता है.

नदी किनारे वाले गांवों पर परिणाम
नदी किनारे स्थित गांवों में रहनेवाले कई किसानों के कुओं का जलस्तर घट जाने की शिकायत बडे पैमाने पर सामने आयी है. कुछ स्थानों पर नदी के किनारे से जमीन के टीले ढहकर गिर जाने की वजह से खेतों का नुकसान हुआ है. नदी पात्र में रहनेवाले गहरे गढ्ढों की वजह से आम नागरिकों व जानवरों की सुरक्षा पर भी सवालिया निशान लगते नजर आ रहे है. साथ ही कई नदी पात्रों में बारिश के बाद रेती के पुनर्उत्पादन की क्षमता भी कम हुई ह््ै.

* पर्यावरण की दृष्टि से नदियों का संरक्षण जरूरी
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर केवल घोषणाबाजी करने व कार्यक्रम आयोजित करने की बजाय नदियों का संरक्षण करना ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है. नदियों के जीवित रहने पर ही भूजल, कृषि, जैवविविधता एवं मानवीय जीवन का आधार टिका रहेगा. अन्यथा रेत की लालच में नदियों की असमय मौत होती रहेगी तथा भावी पीढियों को विरासत के तौर पर नदियों के सूखे पात्र ही मिलेंगे.

* नदी में रेत क्यों महत्वपूर्ण
नदी में रेत रहने से भूजल पुनर्भरण में सहायता होती है, नदियों का नैसर्गिक प्रवाह टिका रहता है. बाढ नियंत्रण में मदद होती है. जलचरों को प्राकृतिक अधिवास उपलब्ध होता है. नदी किनारे धूप एवं पानी की गुणवत्ता का स्तर बनाए रखने में रेत की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में यदि नदी पात्रों से रेत का अतिरिक्त उत्खनन किया जाए तो नदी पात्र में बडे-बडे गढ्ढे बन जाते है और नदी के किनारे फुटने लगते है. साथ ही साभ भूजलस्तर घट जाने की वजह से कुएं एवं बोअरवेल सुख जाते हैं.

* जलचरों पर परिणाम
रेत उत्खनन का जलचरों के जीवन पर भी गंभीर असर पडता दिखाई दे रहा है. नदी में मछलियों की प्रजाति, जल वनस्पति व अन्य सूक्ष्म जीवों का अधिवास नष्ट हो रहा है. गर्मी के मौसम के दौरान नदी पात्र में जमा होने वाली गंदगी, नदी पात्र में रेत के घटते स्तर तथा उत्खनन की वजह से बने बडे-बडे गढ्ढों के चलते जलचरों का जीवन खतरे में कहा जा सकता है.

* क्या कहते है ग्रामीण
नदी नालों के किनारे रहनेवाले ग्रामीणों के मुताबिक किसी समय नदियों में पूरे साल भर पानी रहा करता था. लेकिन अब केवल बारिश के मौसम दौरान नदियों में बाढ दिखाई देती है तथा बारिश का मौसम बीतते ही नदियों में जलस्तर कम होने लगता है तथा गर्मी का मौसम आते-आते सभी नदी नाले पूरी तरह से सूख जाते है. जहां एक ओर बारिश के मौसम दौरान आनेवाली बाढ के चलते नदियों के किनारे रहनेवाली खेतों की उपजाउ मिट्टी बह जाती है. वहीं गर्मियों के मौसम दौरान नदियों के सूख जाने की वजह से कुओं एवं बोअरवेल में भी जलस्तर घट जाता है.

* वन समृध्द मेलघाट में जीवनदायी नदियों ने छोडे प्राण
प्रचुर प्राकृतिक संपदा से ओतप्रोत मेलघाट क्षेत्र की धारणी तहसील में काफी बडगा सिपना और खंडु जैसी महत्वपूर्ण नदिया हैं. जिनमें बारिश के मौसम दौरान बाढ और कभी-कभी प्रलयंकारी बाढ भी आती है. साथ ही इन पहाडी नदियों में किसी समय साल के 12 महीने पानी रहा करता था. लेकिन विगत कुछ वर्षो से फरवरी और मार्च माह के दौरान भी इन नदियों के जलपात्र सूखे दिखाई देने लगे है. इस समय जून माह का पहला सप्ताह चल रहा है और मेलघाट क्षेत्र की नदियां सूखी पडी रहकर अपनी अंतिम सांसे गिन रही है. इस स्थिति के चलते वन्यप्राणियों व पालतु मवेशियों सहित नदी नालों के किनारे रहनेवाले आम नागरिकों को भी भीषण जल किल्लत महसूस होनी शुरू हो गई है.
उल्लेखनीय है कि प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता ह््ै. परंतु पर्यावरण दिवस पर ही अमरावती जिले के मेलघाट में नदी नाले अपनी अंतिम सांसे गिन रहे है. मेलघाट की धारणी तहसील में केवल तापी नदी के तीन रेतीघाटों पर रेत उत्खनन करने की अनुमति प्राप्त है. जिसके जरिए सरकार को करोडों रूपयों का राजस्व भी प्राप्त हुआ है. लेकिन अन्य नदी नालों से रेत उत्खनन की कोई अनुमति नहीं रहने के बावजूद आसपास के रेत तस्करों द्बारा पूरे नदी पात्र को लगभग छलनी करते हुए रेत का अवैध उत्खनन किया गया है. इसके लिए प्रशासनिक अनदेखी सबसे बडी वजह साबित हो रही है.

* पूर्णा नदी हुई नाले में तब्दील
आसेगांव पूर्णा परिसर की जीवनवाहिनी मानी जाती पूर्णा नदी इन दिनों खुद अपने जीवन एवं अस्तित्व को लेकर संघर्ष करती दिखाई दे रही है. सतपुडा की पर्वत श्रृखला से उदगम होकर आगे बढनेवाली पूर्णानदी को धार्मिक एवं सांस्कृतिक के साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. कभी बारहों मास बहनेवाली पूर्णा नदी आज अवैध रेत उत्खनन के मकड जाल में फंसी हुई है. नदी का पात्र इस समय कई स्थानों पर बेहद संकुचित हो गया है तथा नदी पात्र में बडे-बडे गढ्ढे बने दिखाई दे रहे है. अनियंत्रित रेत उत्खनन की वजह से नदी का प्राकृतिक प्रभाव बाधित हुआ है तथा भुजल स्तर पर भी विपरित परिणाम दिखाई दे रहा है. जिसकी वजह से पर्यावरणीय संतुलन बिगडने का भी खतरा पर्यावरण विशेषज्ञों द्बारा जताया जा रहा है. इसके अलावा नदीपात्र में बने रहनेवाले गहरे गढ्ढों की वजह से बारिश के मौसम सहित गणेश विसर्जन के दौरान हादसे घटित होने की काफी अधिक संभावना बढ जाती है और इससे पहले भी पूर्णा नदी में ऐसे हादसे कई बार घटित हो चुके है.

* अनियंत्रित रेत तस्करी के चलते वर्धा नदी का अस्तित्व खतरे में
अमरावती को वर्धा जिले की सीमा से होकर बहने वाली वर्धा नदी को किसी समय जैवविविधता, नैसर्गिक साधन संपत्ति एवं पर्यावरणीय समृध्दि का प्रतीक माना जाता था. नदीपात्र में साफ सुथरे पानी, जलचरों की विविध प्रजातियां, नदी किनारे हरियाली एवं परिसर में पक्षियों की मौजूदगी के चलते इस नदी को विशेष महत्व प्राप्त था. परंतु विगत कुछ वर्षो से रात के समय बडे पैमाने पर भारी भरकम मशीनों के जरिए नदीपात्र से रेत का जमकर उत्खनन किया जा रहा है. इस अनियंत्रित रेत उत्खनन के चलते वर्धा नदी मेंं मछलियों व पशुओं सहित अन्य जलचरों के प्राकृतिक अधिवास के लिए खतरा पैदा हो गया है. नदी के अस्तित्व एवं पर्यावरणीय संतुलन को टिकाए रखने हेतु अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ कडी कार्रवाई की मांग अब जोर पकडने लगी है.
तिवसा तहसील अंतर्गत ईसापुर, उंबरखेड व चांदुर ढोरे इन तीन रेतीघाटों की ही अधिकृत तौर पर नीलामी हुई है. वहीं जावरा, फत्तेपुर, भारवाडी, धामंत्री एवं नमस्कारी के पांच रेतीघाटों के लिए दो बार नीलामी की प्रकिया चलाने के बावजूद कोई बोलीकर्ता आगे नहीं आने की वजह से इन रेतीघाटों की नीलामी नहीं हो पायी. लेकिन इन रेतीघाटों से रेत का अवैध उत्खनन लगातार जारी है.

* अमरावती में रेत उत्खनन की स्थिति
मंजूर रेतीघाट – 53
नीलामी हो चुके घाट – 33
मंजूर रेत स्टॉक – 163295 ब्रास
नीलाम रेत स्टॉक- 91432 ब्रास
उत्खनन की गई रेत – 34602 ब्रास
प्राप्त राजस्व – 13 करोड 17 लाख 28 हजार
घरकुल धारकों को उपलब्ध रेत- 889 ब्रास
लाभ प्राप्त घरकुल धारक – 663

Back to top button