विज्ञान ने संतान सुख का सपना किया साकार
विश्व आईवीएफ दिवस

* निःसंतान दंपतियों के लिए आईवीएफ बनी नई उम्मीद
अमरावती/दि.25- हर वर्ष 25 जुलाई को विश्व आईवीएफ दिवस मनाया जाता है. यह दिन चिकित्सा विज्ञान की उस ऐतिहासिक उपलब्धि का प्रतीक है, जिसने लाखों निःसंतान दंपतियों को माता-पिता बनने की नई उम्मीद दी. इसी दिन वर्ष 1978 में इंग्लैंड में खतऋ तकनीक से जन्मी दुनिया की पहली ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ का जन्म हुआ था.
विशेषज्ञों के अनुसार, जब सामान्य उपचारों से गर्भधारण संभव नहीं हो पाता, तब इन विट्रो फर्टिलाइजेशन एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आता है. उपचार शुरू करने से पहले दंपति की विस्तृत काउंसलिंग और महिला की ओवरी सहित आवश्यक चिकित्सकीय जांच की जाती है. आईवीएफ प्रक्रिया में दवाओं के माध्यम से अंडाशय को उत्तेजित करना, अंडाणु (एग) निकालना, प्रयोगशाला में शुक्राणु और अंडाणु का निषेचन, भ्रूण (एम्ब्रियो) का विकास, आवश्यकता होने पर भ्रूण को सुरक्षित फ्रीज करना, गर्भाशय में भ्रूण प्रत्यारोपण तथा अंत में रक्त जांच के जरिए गर्भधारण की पुष्टि की जाती है. कुछ मामलों में स्पर्म या एग डोनेशन की भी आवश्यकता पड़ सकती है. गायनेकोलॉजिस्ट एवं इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. रंजीता मालपे के अनुसार, आईवीएफ केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक यात्रा भी है. इस दौरान दंपति, परिवार और डॉक्टर के बीच विश्वास, उचित काउंसलिंग तथा सकारात्मक सोच बेहद महत्वपूर्ण होती है. सही मार्गदर्शन और आधुनिक तकनीक की मदद से माता-पिता बनने का सपना साकार किया जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक के कारण आज खतऋ पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित, सटीक और सफल उपचार पद्धति बन चुकी है, जिससे हजारों परिवारों के जीवन में खुशियां आई हैं.





