स्मृतिशेष दादासाहब गवई का मातृभूऋणमोचन दिन

आषाढ, श्रावण ये दो मराठी महिनों का त्यौहार की दृष्टि से महत्व है. उसी प्रकार महान पुरूषों के संत-महंतों की जयंती पुण्यतिथि की दृष्टि से महत्वपूर्ण लगती है. उसमें ही स्मृतिशेष रा.सु. उपाख्य दादासाहब गवई की 25 जुलाई की पुण्यतिथि यानी मातृभूऋणमोचन दिन है.
जुलाई- अगस्त यह दो माह अत्यंत महत्वपूर्ण लगते है. उसमें त्यौहारों की रेलचेल खाने के लिए खानपान की रेलचेल, कथा पुराण, सुनानेवाले तथा सुननेवाले मनोरंजन और जो उपकार मानते है, ऋण कबूल करते है उनकी याद कर ऋणमुक्त होने के लिए अनेक कार्य करते है. उसमें सज्जन नागरिक सत्कार करने के अवसर ढूंढते रहते है. राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पुण्यतिथि, पुण्य शलोक अहिल्यादेवी पुण्यतिथि इसी माह में आती है. 2 अक्तूबर को महात्मा गांधी जयंती, लालबहादूर शास्त्री जयंती इसी माह में, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी. जे. अब्दुल कलाम जयंती, दादासाहेब गवई जयंती इसी माह में 30 अक्तूबर को और महाराष्ट्रीयन लोगों के लिए पंढरपुर यात्रा आषाढी एकादशी इसी माह में आती है.
जिन्हें 3-3 राज्यों के राज्यपाल पद संभाला है, वैश्विक बौध्द परिषद के उपाध्यक्ष पद संभाला है, विधान परिषद का पद संभाला है, विरोधी पक्ष नेता पद संभाला उन्होंने अंतिम क्षण तक राष्ट्रसेवा करने का प्रयास किया. वे स्मृतिशेष रा.सु. उर्फ दादासाहब गवई की पुण्यतिथि 25 जुलाई को ही इसलिए उनके जन्मस्थान विद्यानगरी दारापुर में उनको चाहनेवाले सभी दूर- दूर से उनकी समाधिस्थल पर अभिवादन करने के लिए एकत्रित होते है क्यों ?
‘थोर महात्मे होवूनी गेले चरित्र त्यांचे पहा जरा ।
आपण त्यांच्या समान व्हावे हाच सापडे बोध खरा ॥
उत्सवों का राजा दिवाली उत्सव को लक्ष्मीपूजन के दिन दादासाहब का जन्म हुआ. माता-पिता सरूबाई-सूर्यभानजी गवई ने बहुत खुशी से इस बालक का नाम रामकृष्ण रखा वह दिन 30 अक्तूबर 1929 था. उनकी प्राथमिक शिक्षा दारापुर में ही हुई. उसके बाद पूर्णा नदी पार करके 10 वीं तक शिक्षा टापर हाईस्कूल खोलापुर में हुई और उच्च शिक्षा व्ही.एम.व्ही. में हुई. विद्यार्थी जीवन से उनमें नेतृत्व के गुण दिखाई दिए. 1954 में उन्होंने नागपुर विद्यापीठ की बी.ए. की पदवी प्राप्त की. विद्यार्थी जीवन से ही उनमें नेतृत्व, वकृत्व व कर्तूत्व के गुण थे. इसलिए उन्होंने 1956 में डॉ. आंबेडकर के साथ बौध्द धर्म की दीक्षा ली व समाज कार्यो के लिए अपना जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया. यहीं से ही उनके प्रेरणादायी शिक्षा की शुरूआत हुई. शिक्षा लिए बिना न रहे, खराब कर्म न करे, अच्छे कार्य किए बिना भोजन न करे, अन्याय सहन न करे, इसके लिए संघर्ष करने से न डरे, इसके लिए उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी (गवई गट) स्थापित की व उन्हें अनेकों ने भरपूर प्रतिसाद दिया. इसलिए आज अनुसूचित जाती-जमाती को जो सुविधा है. वही उन्होंने बौध्दधर्म के लिए भी दिलवाई है. इसके लिए आरमुगम साहब कुंभारे व गवई साहब अनशन पर बैठे थे. अमरावती में हुई सभा में आरमुगम साहब का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद विद्यार्थी रहते हुए भूषण गवई ने किया तथा उन्हें प्रेक्षकों की ओर से वाहवाही मिली. उस अमरावती की सभा में हम भी प्रेक्षक श्रोता के रूप में थे.
समझ लीजिए यदि ऐसे समाज सुधारक महान पुरूष प्रत्येक समाज में नहीं होते तो क्या होता ? जिसका एक ही उत्तर है अराजकता बढकर क्रुर राक्षसों की, वासनाधीन और नशेडी लोगों की संख्या बढ जाती. इसलिए संत कहते है.
‘थोर महात्मे होवूनी गेले चरित्र त्यांचे पहा जरा ।
आपण त्यांच्या समान व्हावे हाच सापडे बोध खरा ॥
उनकी यादों से आचरण में बदलाव आता है. विचारों में परिवर्तन होता है. उनका प्रचार होने पर दुराचार कम होकर सदाचार संपन्न समाज निर्मिति होती है. जो राष्ट्र की प्रगति के लिए सहायक होते है. जैसा दादासाहेब ने दीक्षाभूमि के अध्यक्ष के रूप में सकस कार्य कर दुनिया में 9 वे आश्चर्य के रूप में भारत में ही नहीं तथा भारत से बाहर भी दीक्षाभूमि में उनकी ख्याति हुई. देश परदेश से लाखों की संख्या में बौध्द धर्म के ही नहीं तथा डॉ. बाबासाहब की विचारों और दादासाहब के दूरदर्शिता को अभिवादन करने के लिए अन्य पयर्टक आते है और अभिवादन करते है.
2005 को थिलोरी में इर्यामाजी वाक्रपंजर विद्यालय में स्नेहसम्मेन के कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में दादासाहब आए थे. उनकी मुलाकात के लिए हम भी दारापुर से मनोहरान श्रीखंडे, कै. रूपरावजी कुरलकर, वगैरे आदि मंडली थिलोरी में गये थे. नेत्रदीपक मल्लखां, बनेट, बंदेश वगैरे के डेमॉस्ट्रेशन के बाद दादासाहब का भाषण हुआ. जिसमें प्रमुख मुद्दा आज भी याद आता है.
सभी के सभी पीन ड्रॉप सायलेंट वातावरण में सुनते थे और दादासाहब ने आगे कहा , ऐसी क्रीडा स्पर्धा के कारण अपनी जात, धर्म, पंथ, विभाग भूलकर एकाग्र मन से खिलाडियों की प्रशंसा कर प्रोत्साहन देने के लिए आए है, ऐसा कहते ही जोरदार तालियों की कडकडाहट सुनाई दी.
इस प्रकार उनके भाषण की शैली, सामनेवाले की नाडी पहचानकर उसे योग्य दवा पिलाने की योग्यता उनमें थी. जिसके कारण गली से दिल्ली तक उनके भाषण और उनके आवाहन को प्रतिसाद देनेवाले अनुयायी सदैव उनके साथ रहते है और इसलिए उनकी संस्था को, उनकी पार्टी को उनके संगठन को और उनके कार्यो को प्रतिसाद देनेवाले उनके सहयोगी उनके साथ रहे और ईश्वर की कृपा से उन्हें कमलताई चैरिटेबल संस्था की ओर से अनेक स्थानों पर स्कूल- कॉलेजस, दवाखाना बनाए और वाहवाही प्राप्त की.
दादासाहब 1964 से 1994 तक 30 वर्ष विधान परिषद के सदस्य थे. उसी दौरान उन्होंने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व विरोधी पक्षनेता के पद भी प्राप्त किए.
1998 में अमरावती निर्वाचन क्षेत्र से आरपीआई द्बारा दिल्ली से 12 वीं लोकसभा के चुनाव में जीतकर आए व सांसद बने. उन्होंने राज्यसभा के सदस्य के रूप में कार्य किया. इ. स. 2006 में कांग्रेस प्रणित यु. पी. ए. सरकार के काल में उनके बिहार के राज्यपाल के रूप में नियुक्ति की.
इ. स. 2008 में उनकी बदली केरल के राज्यपाल के रूप में हुई व 2011 तक उस पद पर थे. उनके पुत्र उनकी मनोकामना पूर्ण कर सर न्यायाधीश के रूप में भूषण रा. गवई भारतभूषण कहलाए. दूसरे पुत्र डॉ. राजेंद्र गवई ने समाजसेवा के कार्यो में अपनी धुरा संभाली.्
दादासाहेब का 25 जुलाई 2015 को नागपुर में उनका निधन हो गया. आज के स्वार्थी समाज में, स्वार्थी परिवार का बाजार दिखाई देता है. संस्कार संपन्न प्रेरणादायी दादासाहब की उत्तराधिकारी पीढी को देखकर हर्ष उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है. परंतु
आपण त्यांच्या समान व्हावे हिच मनी आस धरा
दादासाहेब एक व्यक्ति अथवा राजनीतिक नहीं थे वह समाज के लिए दिव्य स्तंभ थे.
दिव्यत्वाची जेथे प्रचिति तेथे कर माझे जुळती ।
म्हणून आस्थावान अभिवादनार्थ दारापूरी येती ॥
आपणसा सर्व चाहत्यातर्फे दादासाहेबांच्या पवित्र स्मृतीस
तिवार अभिवादन ! अभिवादन !! अभिवादन !!!
भा.बा. काले, (गुरूजी)
संत गजानन महाराज साहित्यसंघ
अमरावती- 9096690862





