अभिनय की वह आवाज, जो पर्दा गिरने के बाद भी गूंजती रहेगी

भारतीय सिनेमा ने सितारों की चमक बहुत देखी है, लेकिन ऐसे अभिनेता कम हुए हैं, जिनके सामने आते ही दर्शक अभिनेता को भूलकर केवल किरदार को देखने लगे. नाना पाटेकर इसी दुर्लभ परंपरा के कलाकार थे. वे पर्दे पर आते थे, तो लगता नहीं था कि कोई अभिनेता संवाद बोल रहा है. लगता था कि कोई वास्तविक व्यक्ति अपने जीवन की पीड़ा, गुस्सा, बेबसी, संघर्ष या हास्य हमारे सामने रख रहा है. यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी और यही उनकी सबसे स्थायी विरासत भी है.
नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए केवल एक लोकप्रिय कलाकार को खो देना नहीं है. यह अभिनय की उस विशिष्ट शैली को विदाई है, जिसमें चेहरे की चमक से अधिक आंखों की भाषा, संवाद की ऊंचाई से अधिक आवाज का उतार-चढ़ाव और स्टारडम से अधिक किरदार की सच्चाई मायने रखती थी. लगभग पांच दशक के फिल्मी सफर में उन्होंने हिंदी और मराठी सिनेमा के बीच अपनी ऐसी पहचान बनाई, जिसे किसी एक खांचे में रख पाना संभव नहीं.
नाना की यात्रा का आधार मराठी रंगमंच था. रंगमंच ने उन्हें संवाद, देहभाषा, विराम और दर्शकों के सामने चरित्र को जीवंत करने का अनुशासन दिया. आगे चलकर यही प्रशिक्षण उनके फिल्मी अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बना. उन्होंने फिल्मों में प्रवेश किया तो पारंपरिक नायक की छवि के सहारे नहीं, बल्कि अपने अभिनय के बल पर अपनी जगह बनाई. यही कारण है कि वे खलनायक बने तो भी याद रहे, पुलिस अधिकारी बने तो भी, सैनिक बने तो भी, गैंगस्टर बने तो भी और हास्य अभिनेता बने तो भी.
उनके शुरुआती महत्वपूर्ण कामों में ‘गमन’ और ‘सलाम बॉम्बे’ जैसी फिल्में आती हैं, लेकिन विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ ने उन्हें हिंदी सिनेमा में एक अलग मुकाम दिया. अन्ना का किरदार केवल एक हिंसक अपराधी का किरदार नहीं था. उसमें सत्ता, भय, अपराध, असुरक्षा और मानवीय जटिलता एक साथ मौजूद थी. नाना ने उस चरित्र को इस तरह निभाया कि दर्शक उससे घृणा भी करता था और उसकी मनोवैज्ञानिक परतों को समझने की कोशिश भी करता था. इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला.
फिर आया ‘प्रहार’ का दौर. इस फिल्म में वे अभिनेता होने के साथ निर्देशक भी थे. सेना की पृष्ठभूमि पर बनी ‘प्रहार’ में अनुशासन, हिंसा, सैनिक जीवन और युद्ध से गुजर चुके व्यक्ति के भीतर पैदा होने वाले तनाव को उन्होंने गंभीरता से प्रस्तुत किया. यह फिल्म बताती है कि नाना के लिए सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था. वे उसके जरिए सामाजिक और मानवीय सवालों को भी सामने रखना चाहते थे. इसके बाद सन 1990 का दशक उनके करियर का अत्यंत महत्वपूर्ण दौर रहा. ‘अंगार’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’ और ‘यशवंत’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रूप सामने रखे.
‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक का किरदार सामाजिक अन्याय, व्यवस्था के प्रति आक्रोश और टूटे हुए व्यक्ति के विद्रोह का प्रतीक बन गया. नाना की आवाज, चेहरे के भाव और संवादों की तीव्रता ने उस भूमिका को जनमानस में गहरी जगह दिलाई. इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. ‘अग्निसाक्षी’ में उनका अभिनय एक अलग भावभूमि लेकर आया. यहां उनका किरदार अपराध और हिंसा की पृष्ठभूमि में मनुष्य के भीतर छिपे भय और असुरक्षा को सामने लाता है. इसके लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. इस तरह नाना पाटेकर उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हुए, जिन्होंने अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किए.
उनकी अभिनय क्षमता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण यह भी है कि वे गंभीर भूमिकाओं के बीच हास्य को उतनी ही सहजता से निभा सकते थे. ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के रूप में उनका अभिनय इसका सबसे लोकप्रिय उदाहरण है. एक ओर उनकी आवाज में वही परिचित रौब था, दूसरी ओर वही रौब हास्य का माध्यम बन गया. गुस्सा, डर, भाईचारा, अपराधी दुनिया की भाषा और हास्यास्पद परिस्थितियां, इन सबको उन्होंने इस तरह मिलाया कि उदय शेट्टी स्वयं फिल्म के सबसे यादगार पात्रों में शामिल हो गया. यह भूमिका बताती है कि नाना केवल गंभीर अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे हास्य की टाइमिंग और देहभाषा पर भी उतना ही मजबूत अधिकार रखते थे.
‘अब तक छप्पन’ में साधु आगाशे का किरदार उनके अभिनय की दूसरी महत्वपूर्ण मिसाल है. एक एन्काऊंटर स्पेशालिस्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका को उन्होंने किसी आदर्शवादी फिल्मी नायक की तरह नहीं निभाया. चेहरे की कठोरता, कम संवाद, नियंत्रित आवाज और अपराधियों से निपटने की व्यावहारिक मानसिकता के जरिए उन्होंने एक ऐसे पुलिस अधिकारी को सामने रखा, जिसके पेशे के भीतर नैतिक और मानवीय संघर्ष भी मौजूद हैं. लेकिन नाना की वास्तविक ऊंचाई शायद ‘नटसम्राट’ में दिखाई देती है. गणपत बेलवलकर की भूमिका में उन्होंने एक महान रंगमंच कलाकार के वृद्धावस्था के अकेलेपन, टूटते रिश्तों, खोते आत्मसम्मान और अतीत की स्मृतियों को जिस गहराई से जिया, वह अभिनय का असाधारण उदाहरण है. यह भूमिका उनके अपने रंगमंचीय संस्कारों से भी गहराई से जुड़ी थी. ‘नटसम्राट’ में नाना चिल्लाते नहीं, बल्कि भीतर से टूटते मनुष्य की आवाज बनते हैं. यही अंतर एक अच्छे अभिनेता और महान अभिनेता के बीच की दूरी तय करता है.
उनकी फिल्मी यात्रा का मूल्यांकन केवल फिल्मों की संख्या से नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह स्थापित किया कि मुख्य भूमिका और चरित्र भूमिका के बीच कोई अनिवार्य दीवार नहीं होती. जिस अभिनेता को कभी खलनायक के रूप में देखा गया, वही आगे चलकर नायक बना, फिर हास्य अभिनेता बना और बाद में वृद्ध रंगमंच कलाकार के रूप में दर्शकों को भावुक कर गया.
नाना की सबसे बड़ी अभिनय शक्ति उनकी आवाज थी. उनकी आवाज में एक साथ कठोरता और करुणा थी. वे संवादों को केवल शब्दों की तरह नहीं बोलते थे. आवाज की गति, विराम, अचानक पैदा होने वाला तनाव और शब्दों के बीच की खामोशी, इन सबका इस्तेमाल वे अभिनय के औजार की तरह करते थे. कई बार उनका चेहरा स्थिर रहता था, लेकिन आवाज बता देती थी कि चरित्र के भीतर क्या चल रहा है. इसीलिए उनके कई संवाद लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बने. लेकिन नाना की उपलब्धि केवल लोकप्रिय संवाद बोल देना नहीं थी. उनकी असली उपलब्धि यह थी कि उन्होंने संवाद को चरित्र की मनःस्थिति बना दिया.
मराठी सिनेमा और रंगमंच में उनका योगदान हिंदी फिल्मों से अलग नहीं, बल्कि उसकी बुनियाद का विस्तार था. उन्होंने यह साबित किया कि क्षेत्रीय भाषा में किया गया गंभीर और साहित्यिक अभिनय भी राष्ट्रीय स्तर पर दर्शकों को प्रभावित कर सकता है. मराठी रंगमंच की परंपरा से निकला कलाकार जब हिंदी मुख्यधारा में आया तो उसने अपनी जड़ों को छोड़ा नहीं; बल्कि उन्हीं जड़ों की ताकत से राष्ट्रीय सिनेमा में अपनी जगह बनाई. अभिनय के साथ निर्देशन का उनका पक्ष भी महत्वपूर्ण है. ‘प्रहार’ इसका प्रमुख उदाहरण है. निर्देशन के जरिए उन्होंने यह दिखाया कि कैमरे के सामने खड़े होने वाला कलाकार कैमरे के पीछे से भी सामाजिक और मानवीय विषयों को देखने की कोशिश कर सकता है.
नाना पाटेकर की पहचान केवल अभिनेता की नहीं थी. वे सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े रहे और किसानों तथा ग्रामीण समाज से संबंधित कार्यों में सक्रिय रहे. अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाना पाटेकर ने आत्महत्याग्रस्त किसान परिवारों को आर्थिक सहायता देने हेतु तथा ऐसे परिवारों की महिलाओं का जीवन स्तर ऊंचा उठाने हेतु नाम फाऊंडेशन की स्थापना की. जिसने देखते ही देखते पूरे महाराष्ट्र में एक जनांदोलन का रूप ले लिया. इसके साथ ही नाना पाटेकर का और भी कई सामाजिक क्षेत्रों के साथ जुडाव बनता चला गया. हालांकि उनके लिए मुख्य केंद्रबिंदू खेती-किसानी का क्षेत्र ही रहा. यहीं वजह रही कि, मायानगरी मुंबई की चमक-धमक से बेहद दूर पुणे के खडकवासला परिसर स्थित कामशेत जैसे ग्रामीण क्षेत्र में नाना पाटेकर खुद खेतीबाडी करते हुए ग्रामीण परिवेश में रह रहे थे.
प्रसिद्धि के इस दौर में, जब किसी सार्वजनिक व्यक्ति के हर काम का प्रचार लगभग अनिवार्य हो गया है, नाना का व्यक्तित्व अपेक्षाकृत अलग दिखाई देता था. उनका काम उनकी पहचान बना रहा. नाना की लोकप्रियता का एक कारण उनकी बेबाकी भी थी. वे हमेशा फिल्मी दुनिया की औपचारिक भाषा में बोलने वाले कलाकार नहीं रहे. उनकी बातचीत में सीधेपन और स्पष्टता का रंग दिखाई देता था. यह स्वभाव पर्दे पर भी उनके अभिनय में दिखाई देता था. शायद इसलिए उनके किरदारों में बनावटीपन कम और जीवन की खुरदरी सच्चाई अधिक नजर आती थी.
आज सिनेमा तकनीक, बड़े बजट, दृश्य प्रभाव और प्रचार के नए दौर में प्रवेश कर चुका है. ऐसे समय में नाना पाटेकर की विरासत और महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्होंने अपने करियर से यह सिद्ध किया कि दर्शक अंततः तकनीक से नहीं, मनुष्य की सच्चाई से जुड़ता है. कैमरा किसी चेहरे को बड़ा कर सकता है, प्रचार किसी कलाकार को लोकप्रिय बना सकता है, लेकिन किसी किरदार को दशकों तक यादगार केवल अभिनय बना सकता है.
उनके जाने के बाद ‘परिंदा’ का अन्ना, ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप, ‘अब तक छप्पन’ का साधु आगाशे, ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी और ‘नटसम्राट’ का गणपत बेलवलकर जैसे किरदार उनके अभिनय की अलग-अलग दुनिया के प्रतिनिधि बनकर हमारे बीच रहेंगे. एक ही अभिनेता के भीतर इतनी विविध दुनिया का होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. नाना पाटेकर ने स्टार बनने के बजाय अभिनेता बने रहने का रास्ता चुना. यही चुनाव उन्हें विशिष्ट बनाता है. उन्होंने सिद्ध किया कि लोकप्रियता के लिए अभिनय को हल्का करने की आवश्यकता नहीं और गंभीर अभिनय के लिए दर्शकों से दूर जाने की भी जरूरत नहीं.
उनकी मृत्यु के साथ एक आवाज शांत हुई है, लेकिन उस आवाज की प्रतिध्वनि लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी. उनके निभाए किरदार नई पीढ़ियों को यह बताते रहेंगे कि अभिनय केवल संवाद बोलना नहीं है; अभिनय किसी दूसरे मनुष्य के भीतर प्रवेश करके उसकी दुनिया को दर्शक के सामने सच बना देना है. नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत कोई एक पुरस्कार, कोई एक फिल्म या कोई एक संवाद नहीं है. उनकी विरासत वह विश्वास है कि एक सच्चा अभिनेता पर्दे पर स्वयं को नहीं, अपने किरदार को बड़ा बनाता है.
पर्दा गिर गया है. कलाकार चला गया है. आवाज खामोश हो गई है. मगर अन्ना की कठोरता, प्रताप का आक्रोश, साधु आगाशे का संयम, उदय शेट्टी का हास्य और गणपत बेलवलकर की टूटती हुई आत्मा, ये सभी किरदार अभी जीवित हैं. यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी अमरता है, उसके जाने के बाद भी उसका अभिनय हमारे भीतर बोलता रहे.





