एक ही दिन में 4 करोड का भुगतान, कोणार्क पर मनपा मेहरबान
सुबह बिल दौड़ा, दोपहर में चेक जारी, मनपा की जबरदस्त और हैरतअंगेज तत्परता

* जुलाई में सफाई ठप रहने के बावजूद भुगतान में कटौती नहीं होने पर उठे सवाल
* 4 करोड के बिल को मंजूरी, 2 करोड रूपयों का भुगतान, दंडात्मक राशि की कोई कटौती भी नहीं
* मनपा की कोणार्क पर मेहरबानी बेहद संदेहास्पद व संशयास्पद, पुरा मामला सवालों के घेरे में
अमरावती/दि.8- अमरावती शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर एक ओर मनपा प्रशासन लगातार सवालों के घेरे में है, वहीं दूसरी ओर सफाई ठेका संभाल रही कोणार्क इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी को भुगतान किए जाने के तरीके को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं. आरोप है कि जुलाई 2026 के सफाई कार्य का लगभग 4 करोड़ रुपए का भुगतान 8 सितंबर को एक ही दिन में मंजूर कर दिया गया. बताया जा रहा है कि सुबह के समय बिल मनपा के विभिन्न विभागों की टेबलों से होते हुए आगे बढ़ा और दोपहर तक आवश्यक हस्ताक्षर पूरे कर भुगतान के चेक जारी कर दिए गए.
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जुलाई माह में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के कारण शहर के कई हिस्सों में सफाई व्यवस्था प्रभावित रही थी. सफाई कार्य में लापरवाही को लेकर स्वास्थ्य निरीक्षकों पर कार्रवाई तथा आर्थिक दंड लगाए जाने की बात भी सामने आई थी. इसके बावजूद कोणार्क के जुलाई माह के बिल में अपेक्षित कटौती की गई या नहीं, इस पर अब सवाल उठ रहे हैं.
* एक दिन में पूरी हुई भुगतान प्रक्रिया?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 8 सितंबर को कोणार्क के जुलाई माह के सफाई कार्य का भुगतान प्रक्रिया में लिया गया. इस दौरान लेखा विभाग, लेखा परीक्षण विभाग, उपायुक्त (सामान्य प्रशासन), अतिरिक्त आयुक्त-2 तथा मनपा आयुक्त स्तर पर हस्ताक्षर किए जाने की बात कही जा रही है. आरोप यह है कि इतनी बड़ी राशि के बिल की प्रक्रिया एक ही दिन में पूरी कर दी गई. सवाल उठाया जा रहा है कि क्या बिल में दर्शाए गए कार्य की वास्तविकता, सफाई की स्थिति, अनुपस्थित कर्मचारियों, बंद रही घंटागाड़ियों, लगाए गए दंड तथा अनुबंध की शर्तों के अनुसार की जाने वाली कटौतियों का पर्याप्त परीक्षण किया गया. इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित बिल, माप पुस्तिका, कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र, उपस्थिति रिकॉर्ड तथा भुगतान फाइल का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक होगा.
* लेखा और लेखा परीक्षण ने जताई थी आपत्ति
इस भुगतान प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लेखा विभाग तथा लेखा परीक्षण विभाग की ओर से आपत्तियां दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है. लेखा विभाग की आपत्ति के अनुसार मंजूर की गई कटौती के संदर्भ में ईसीआर का पत्र संलग्न नहीं किया गया था. विभाग ने कथित तौर पर यह भी उल्लेख किया था कि इस संबंध में जिम्मेदारी संबंधित विभाग की रहेगी. इसी प्रकार लेखा परीक्षण विभाग की ओर से भी आपत्ति दर्ज किए जाने की बात कही जा रही है. इसके बावजूद भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ने और बड़ी राशि का चेक जारी होने को लेकर अब प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं.
* चार करोड में से दो करोड़ का चेक के जरीए भुगतान
बताया जा रहा है कि जुलाई माह के चार करोड रूपये के बिल को मंजूरी दी गई. जिसमें दो करोड रूपये के भुगतान हेतु चेक जारी कर दिया गया. इस बिल में लगभग 20 लाख रुपए आयकर, सुरक्षा निधि तथा इंसेंटिव आदि की कटौती किए जाने का प्रावधान था. आरोप है कि संबंधित कटौतियों और लेखा विभाग की आपत्तियों के बावजूद बिल को मंजूरी दी गई तथा कोणार्क कंपनी को लगभग 2 करोड़ रुपए का भुगतान करने हेतु चेक दे दिया गया. ऐसे में अब यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि जब मनपा की आर्थिक स्थिति को लेकर स्वयं प्रशासन में बार-बार चिंता व्यक्त की जाती रही है, तब इतनी बड़ी राशि के भुगतान में प्रत्येक आपत्ति और संभावित दंड की राशि का स्पष्ट समायोजन क्यों नहीं किया गया?
* जुलाई में सफाईकर्मियों की हड़ताल, फिर भी बिल में कटौती नहीं?
जुलाई माह का घटनाक्रम इस मामले को और गंभीर बनाता है. इस दौरान कोणार्क के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के कारण कई क्षेत्रों में सफाई कार्य प्रभावित होने का दावा किया गया है. कई स्थानों पर कचरा संकलन और सफाई व्यवस्था बाधित रही. सफाई कार्य में लापरवाही के लिए स्वास्थ्य निरीक्षकों पर कार्रवाई और आर्थिक दंड लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है. ऐसे में सवाल यह है कि जिस अवधि में काम प्रभावित रहा, उस अवधि के बिल का भुगतान पूरी कार्यक्षमता के आधार पर किया गया या वास्तविक कार्य के अनुपात में कटौती की गई. यदि अनुबंध के अनुसार काम में कमी, अनुपस्थित मनुष्यबल, वाहन उपलब्ध न होना या निर्धारित सेवा नहीं देने पर दंड अथवा कटौती का प्रावधान था, तो उसका भुगतान में समायोजन किया गया या नहीं, यह जांच का प्रमुख विषय बन गया है.
* हर महीने सफाई पर 4.19 करोड़ का खर्च?
दूसरी ओर, उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कोणार्क के माध्यम से अमरावती शहर की सफाई व्यवस्था पर प्रति माह करीब 4.19 करोड़ रुपए खर्च होने का दावा किया जा रहा है. आरोप लगाया जा रहा है कि इससे पहले इसी प्रकार के सफाई कार्य पर करीब 2.70 करोड़ रुपए खर्च होते थे. इस आधार पर लगभग 1.50 करोड़ रुपए प्रतिमाह अतिरिक्त खर्च होने का दावा किया जा रहा है. ऐसे में कोणार्क कंपनी द्वारा इस भुगतान की ऐवज में किए जा रहे काम, साफसफाई के काम हेतु लगाए जा रहे मनुष्यबल, वाहन, कचरा संकलन, परिवहन, प्रसंस्करण तथा अन्य सेवाओं का तुलनात्मक विवरण देखना आवश्यक है.
* दिसंबर से ठेका, मार्च से घर-घर कचरा संकलन
बता दे कि, कोणार्क कंपनी का सफाई ठेका दिसंबर 2025 से शुरू हुआ. प्रारंभिक अवधि में दिसंबर 2025, जनवरी 2026 और फरवरी 2026 के दौरान कंपनी द्वारा मुख्य रूप से कचरा परिवहन का कार्य किए जाने की जानकारी है. इसके बाद मार्च 2026 से घर-घर कचरा संकलन का कार्य भी कंपनी के जिम्मे आने की बात कही गई है. आरोप है कि इस काम के लिए निर्धारित संख्या में करीब 265 कचरा संकलन वाहन उपलब्ध होना आवश्यक था, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से करीब 120 वाहनों के भरोसे ही काम चलाया जा रहा था. ऐसे में सफाई कामों हेतु वाहनों की निर्धारित संख्या और वाहनों की वास्तविक उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है. ऐसे में सवाल यह भी है कि वाहन उपलब्धता की शर्तों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया और कम वाहनों के बावजूद कंपनी को भुगतान किस आधार पर किया गया.
* 44 वाहन फिटनेस और बीमा के बिना चलने का दावा
सफाई व्यवस्था में वाहनों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं. दावा है कि कोणार्क के करीब 44 वाहन फिटनेस प्रमाणपत्र और बीमा के बिना संचालित हो रहे हैं. वाहनों की वैधता, फिटनेस, बीमा, पंजीयन और अनुबंध की शर्तों के अनुरूप उनकी पात्रता की जांच मनपा के संबंधित विभागों द्वारा की गई या नहीं, यह भी अपने आप में जांच का विषय है. हाल ही में अमरावती में कचरा प्रबंधन से जुड़े 76 वाहनों के कथित 2.75 करोड़ रुपए के विवाद को लेकर पुलिस मामला दर्ज होने की खबर भी सामने आई थी.
* 1200 कर्मचारियों में केवल 373 का ईपीएफ-ईएसआईसी?
कोणार्क के सफाई कर्मचारियों से जुड़ा ईपीएफ और ईएसआईसी का मुद्दा भी गंभीर है. आरोप है कि कंपनी के करीब 1200 सफाई कर्मचारियों में से केवल 373 कर्मचारियों का ईपीएफ और ईएसआईसी जमा किया गया, जबकि शेष करीब 800 कर्मचारियों के संबंध में ईपीएफ-ईएसआईसी जमा होने का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है. इन कर्मचारियों की कथित लंबित राशि करीब 3 करोड़ रुपए बताई जा रही है. कर्मचारियों की ओर से अपने बकाया हक के लिए समय-समय पर आंदोलन और कामबंद किए जाने की बात भी कही जा रही है. यदि ईपीएफ और ईएसआईसी से जुड़े आरोप सही पाए जाते हैं, तो इसका सीधा असर हजारों कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा पर पड़ सकता है.
* स्वच्छता अध्ययन समिति की रिपोर्ट भी सवालों के घेरे में
कोणार्क के कामकाज को लेकर मनपा में सवाल पहले भी उठते रहे हैं. जनवरी 2026 में मनपा चुनाव हुए और फरवरी में नया सदन अस्तित्व में आया. नई मनपा की पहली आमसभा में सफाई व्यवस्था को लेकर काफी हंगामा हुआ था. इसके बाद स्वच्छता अध्ययन समिति का गठन किया गया था. समिति ने करीब एक माह तक सफाई व्यवस्था का आकलन कर मनपा प्रशासन तथा आमसभा के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत की थी. आरोप है कि रिपोर्ट में कोणार्क के भुगतान को रोकने तथा काम में हुई कथित लापरवाही के लिए दंड लगाने की सिफारिश की गई थी. इसके बावजूद अब तक कंपनी को करीब 12 करोड़ रुपए का भुगतान किए जाने और भुगतान में लगाए गए दंड की राशि का पर्याप्त समायोजन नहीं किए जाने का दावा किया जा रहा है. कंपनी पर अब तक करीब 5 से 6 करोड़ रुपए का दंड लगाए जाने की बात भी कही जा रही है.
* 12 प्रभागों में सफाई ठप होने का दावा
एक तरफ करोड़ों रुपए का भुगतान किए जाने का दावा है, वहीं दूसरी ओर शहर के 12 प्रभागों में सफाई एवं कचरा संकलन व्यवस्था प्रभावित अथवा बंद होने की शिकायतें सामने आ रही हैं. दावा है कि 50 हजार से अधिक घरों से घंटागाड़ियों द्वारा नियमित कचरा संकलन नहीं किया जा रहा. यदि यह स्थिति सही है तो यह केवल भुगतान का मामला नहीं रह जाता, बल्कि शहर की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और नागरिक सुविधाओं से सीधे जुड़ा प्रश्न बन जाता है. मनपा प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि कंपनी को भुगतान करते समय कितने वाहनों ने वास्तव में काम किया, कितने कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज हुई, कितने घरों से कचरा संकलित किया गया और निर्धारित सेवा के मुकाबले वास्तविक प्रदर्शन कितना रहा.
* हाईकोर्ट के फैसले के बाद भुगतान पर और बढ़ी निगाह
कोणार्क के सफाई ठेके को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ का 2 सितंबर 2026 का फैसला भी सामने आ चुका है. हाईकोर्ट ने संबंधित निविदा में कोणार्क इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्बन एन्वायरो वेस्ट मैनेजमेंट की पात्रता पर गंभीर सवाल उठाते हुए मनपा-कोणार्क करार को रद्द किया था और आगे की प्रक्रिया के निर्देश दिए थे. बाद में कोणार्क ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और मामले में अंतरिम राहत प्राप्त की. ऐसे में अब मनपा द्वारा कंपनी को किए जा रहे भुगतान, अनुबंध की शर्तों, दंड की वसूली तथा वास्तविक कार्य के आधार पर बिलों के सत्यापन का मुद्दा और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है.
* सवालों के घेरे में भुगतान प्रक्रिया
पूरे घटनाक्रम को देखते हुए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोणार्क को किए जा रहे भुगतान से पहले वास्तविक कार्य का पर्याप्त सत्यापन किया जा रहा है. यदि जुलाई में सफाई कार्य प्रभावित था, कर्मचारियों की हड़ताल हुई थी, वाहनों की उपलब्धता निर्धारित संख्या से कम थी, विभिन्न विभागों ने बिल पर आपत्तियां दर्ज की थीं और कंपनी पर पहले से दंड लगाया गया था, तो इन सभी बिंदुओं का भुगतान में कितना वित्तीय समायोजन हुआ, इसका स्पष्ट विवरण सार्वजनिक होना चाहिए. साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि 8 सितंबर को एक ही दिन में करीब 4 करोड़ रुपए का भुगतान किन-किन बिलों के आधार पर किया गया, प्रत्येक बिल की राशि कितनी थी, किस स्तर पर क्या जांच हुई, कितनी कटौती की गई और कंपनी पर लगाए गए दंड में से कितनी राशि वास्तव में वसूल की गई.
अब सवाल केवल कोणार्क को भुगतान किए जाने का नहीं, बल्कि भुगतान की पूरी प्रक्रिया, वास्तविक सफाई कार्य और मनपा के सार्वजनिक धन की जवाबदेही का है. इन तमाम आरोपों और दावों की निष्पक्ष जांच तथा मनपा की भुगतान फाइल, उपस्थिति रिकॉर्ड, वाहन लॉगबुक, ईपीएफ-ईएसआईसी विवरण और दंड वसूली रिकॉर्ड सार्वजनिक होने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी.





