अप्रैल में ही क्यों गर्म होने लगा चिखलदरा?

चिखलदरा की गर्मी को जानबुझकर लोगों से छिपाया जा रहा

* सच को छिपाकर चिखलदरा के घाव किए जा रहे और अधिक गहरे
* वृक्षों की अवैध कटाई तथा वृक्षारोपण व वृक्ष संवर्धन का अभाव बडी वजह
* सरकार व प्रशासन के साथ ही नगर परिषद भी कर रहे डरावाने भविष्य की अनदेखी
चिखलदरा/दि.8- विदर्भ क्षेत्र के एकमात्र हिलस्टेशन चिखलदरा को विदर्भ का कश्मिर ही कहा जाता हैं. यहां पर किसी समय ग्रिष्मकाल के दौरान भी वातावरण इतना ठंडा रहता था कि पंखे चलाने की जरूरत नहीं पडती थी. लेकिन धीरे-धीरे पंखे लगे, फिर कुलर लगे और अब एसी भी लग गए हैं. जिसका सीधा मतलब है कि ठंडी हवा का स्थान रहनेवाले चिखलदरा में वातावरण धीरे-धीरे गर्म होने लगा हैं. इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता. मगर सरकार व प्रशासन सहित चिखलदरा नगर परिषद के साथ ही स्थानीय बुध्दिजीवियों एवं व्यापारियों ने चिखलदरा के लगातार गर्म होते जाने की जानकारी को कभी सामने ही नहीं आने दिया ताकि चिखलदरा की बदनामी न हो और पर्यटकों का चिखलदरा में आना भी बंद न हो.
उल्लेखनीय है कि एक समय ऐसा था जब बारिश के मौसम दौरान चिखलदरा में सुरज ही दिखाई नहीं देता था. लेकिन आज हालात यह रहे कि चिखलदरा में बारिश का मौसम ही महसूस नहीं होता. वहीं ठंड के मौसम दौरान चिखलदरा में हर ओर कोहरे की घनी चादर छाई रहती थी. लेकिन अब चिखलदरा में ठंड और कोहरे का कोई असर दिखाई नहीं देता. वहीं पर्वतीय क्षेत्र रहनेवाले चिखलदरा में अब मैदानी इलाकों की तरह जबरदस्त गर्मी पडने लगी हैं. परंतु इस स्थिति को सुधारने की बजाय इसे लेकर चुप्पी साधते हुए दुनिया की नजरो से इस हकिकत को छिपाने का प्रयास किया जा रहा हैं. ताकि चिखलदरा की बदनामी न हो और यहां पर पर्यटकों के आने का सिलसिला न रूके. ऐसा में सवाल उठाया जा सकता है कि आखिर हम चिखलदरा को कहां पहुंचाना चाहते हैं.
चिखलदरा के व्यवसायी अपने व्यवसायी नुकसान के चक्कर में चिखलदरा की असलियत को छुपाने के साथ ही उसका उपाय खोजने की बजाय केवल अपने नफा-नुकसान का ही गणित लगा रहे हैं. जिसके चलते चिखलदरा के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगता नजर आ रहा हैं. चिखलदरा में स्थिति को सुधारने के लिए प्रयास करने की बजाय चुप रहने और इसकी अनदेखी करने की वजह से स्थिति यह हो गई हैं कि अप्रैल माह में ही चिखलदरा में गर्मी नए-नए रिकॉर्ड बना रही हैं. चिखलदरा स्थित सिपना महाविद्यालय के प्रा. डॉ. विजय मंगले द्बारा मौसम निरीक्षक व पर्यावरण विशेषज्ञ के तौर पर भी काम किया जाता हैं. जिनके द्बारा चिखलदरा में लगातार बढती गर्मी और बदलते मौसम को लेकर प्रस्तुत किए गए आंकडो को देखते हुए कहा जा सकता है कि अब इन आंकडो को देखने के बाद हकिकत की अनदेखी करना या चूप रहना सीधे तौर पर चिखलदरा के भविष्य के साथ खिलवाड होगा.
ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि विदर्भ के एकमात्र हिल स्टेशन चिखलदरा के अस्तित्व को बचाने हेतु प्रयास करने के लिए सामुहिक प्रयासों की जरूरत हैं. जिसके तहत सरकार, प्रशासन, नगर परिषद व स्थानीय नागरिकों को इस समस्या से मुक्ति के लिए ठोस उपाय योजनाएं तैयार करने होंगे. जिसमें सबसे पहले तो यह निर्णय लेना होगा कि चिखलदरा परिसर में बडे पैमाने पर पेड लगाते हुए उनकी तीन साल तक लगातार देखरेख की जाए और पूरी गंभीरता के साथ वृक्ष संवर्धन किया जाए. इसके साथ ही राज्य सरकार ने चिखलदरा के वातावरण में हो रहे बदलावों का अध्यन करने हेतु विशेषज्ञों की रिसर्च कमेटी को यहां भेजना चाहिए, ताकि चिखलदरा के मौसम में हो रहे बदलावों की असल वजह को समझा जा सके और फिर उस हिसाब से आवश्यक उपाय किए जा सके.
यहां इस बात की बिल्कुल भी अनदेखी नही की जा सकती कि भविष्य में चिखलदरा में तापमान निश्चित तौर पर बढेगा, तब शायद स्थिति को सुधारने का मौका नहीं मिल पाएगा. उस वक्त चिखलदरा शायद विदर्भ का कश्मिर और एक मात्र हिल स्टेशन भी नहीं रहेगा, क्योंकि यहां पर ठंडी हवाआेंं की बजाय लू के गर्म थपेडे चलने लगेंगे. ऐसे में इस भयावह भविष्य की संभावना को ध्यान में रखते हुए बेहद जरूरी है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और श्रेयवाद की लढाई को परे रखते हुए चिखलदरा के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए सभी को साथ आना बेहद जरूरी हैं. अन्यथा चिखलदरा के अस्तित्व को खतरे में कहा जा सकता हैं.

 

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