सिकलसेल पीड़ित 8 वर्षीय आदिवासी बालिका ने घर में तोड़ा दम

* विद्या जांबेकर की मौत से भड़का आक्रोश, न डॉक्टर, न एम्बुलेंस, न समय पर इलाज
* करोड़ों-अरबों रूपयों की योजनाओं के बावजूद लचर स्वास्थ्य व्यवस्था
अमरावती/धारणी/दि.31- मेलघाट की दुर्गम पहाड़ियों में रहने वाली आठ वर्षीय आदिवासी बालिका विद्या नंदकुमार जांबेकर की मौत ने एक बार फिर राज्य की आदिवासी स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह तस्वीर सामने ला दी है. सिकलसेल बीमारी से पीड़ित यह बच्ची रविवार को अपने ही घर में तड़पते हुए दम तोड़ गई. सबसे दर्दनाक बात यह है कि जिस क्षेत्र में करोड़ों रुपये खर्च कर स्वास्थ्य योजनाएं चलाने, सिकलसेल उन्मूलन अभियान और जनजागृति कार्यक्रमों के दावे किए जाते हैं, वहां एक बीमार बच्ची को समय पर डॉक्टर, एम्बुलेंस और उपचार तक उपलब्ध नहीं हो सका. इस घटना ने मेलघाट की स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य तंत्र की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है.
इस संदर्भ में प्राप्त जानकारी के मुताबिक धारणी तहसील के अतिदुर्गम रानीगांव निवासी विद्या जांबेकर सिकलसेल पॉजिटिव मरीज थी. ग्रामीणों के अनुसार पिछले कई महीनों से उसका वजन लगातार घट रहा था और स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था. परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण नियमित उपचार नहीं करा पा रहा था. रविवार को उसकी तबीयत अचानक ज्यादा खराब हुई, लेकिन गांव में न डॉक्टर उपलब्ध था और न ही तत्काल चिकित्सा सुविधा. देखते ही देखते बच्ची की हालत गंभीर हो गई और उसने घर में ही दम तोड़ दिया. इस घटना के चलते रानीगांव सहित पूरे मेलघाट क्षेत्र में शोक और आक्रोश का माहौल है.
यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि, विद्या का नाम स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में सिकलसेल मरीज के रूप में दर्ज होने की बात सामने आई है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि बच्ची स्वास्थ्य विभाग की निगरानी सूची में थी, तो उसकी नियमित जांच, दवा और फॉलोअप क्यों नहीं हुआ? ग्रामीणों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग को उसकी बीमारी की जानकारी थी तो समय रहते उसे बड़े अस्पताल में रेफर क्यों नहीं किया गया? और यदि जानकारी नहीं थी तो करोड़ों रुपये खर्च कर चलाए जा रहे सिकलसेल सर्वेक्षण और निगरानी तंत्र का आखिर क्या उपयोग है?
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि रानीगांव के चलित स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्साधिकारी का पद वर्षों से रिक्त पड़ा है. गांव के लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम का है. गंभीर मरीजों को कई किलोमीटर दूर उपचार के लिए जाना पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य केंद्र में नियमित डॉक्टर की नियुक्ति होती तो विद्या को समय पर प्राथमिक उपचार मिल सकता था और शायद उसकी जान बचाई जा सकती थी.
घटना के बाद ग्रामीणों ने स्वास्थ्य प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि आपात स्थिति में गांव में एम्बुलेंस तक उपलब्ध नहीं थी. रानीगांव क्षेत्र की एम्बुलेंस पहले से ही मरम्मत के लिए अमरावती भेजी गई थी और उसके स्थान पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई. गांव के लोगों ने सवाल उठाया है कि जब दुर्गम आदिवासी क्षेत्र में न डॉक्टर हैं और न एम्बुलेंस, तो बीमार मरीजों को जीवन रक्षक उपचार कैसे मिलेगा? ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि, जब स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं, गांव में एम्बुलेंस नहीं और गंभीर मरीजों के लिए कोई व्यवस्था नहीं, तो आखिर आदिवासी परिवार अपने बच्चों को कैसे बचाएं?
बता दें कि मेलघाट क्षेत्र में सिकलसेल, कुपोषण और एनीमिया उन्मूलन के लिए राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग वर्षों से विशेष योजनाएं चला रहे हैं. नियमित शिविर, स्क्रीनिंग अभियान, पोषण कार्यक्रम और स्वास्थ्य जागरूकता पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं. लेकिन विद्या की मौत ने इन दावों की वास्तविकता पर सवालिया निशान लगा दिया है. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरकारी आंकड़ों में योजनाएं सफल दिखाई जाती हैं, जबकि जमीनी स्तर पर मरीजों तक समय पर उपचार नहीं पहुंच रहा.
* युवानी जावरकर की मौत के बाद भी नहीं जागा तंत्र
खास बात यह है कि यह इस तरह का कोई पहला मामला नहीं है. कुछ सप्ताह पहले ही चार वर्षीय आदिवासी बालिका युवानी जावरकर की मौत ने भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए थे. उस घटना के बाद मेलघाट में व्यापक जनआक्रोश देखने को मिला था और धारणी में आमरण अनशन तक शुरू हुआ था. स्थानीय विधायक केवलराम काले ने भी स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही को लेकर सरकार को लिखित शिकायत भेजी थी.
* दबाव बढ़ा, तो अधीक्षक का तबादला
लगातार बढ़ते विवाद और जनदबाव के बीच स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई करते हुए धारणी उपजिला अस्पताल के वैद्यकीय अधीक्षक डॉ. दयाराम जावरकर का तत्काल प्रभाव से तबादला कर दिया है. उपसंचालक, स्वास्थ्य सेवा अकोला मंडल द्वारा जारी आदेश के अनुसार डॉ. जावरकर को चिखलदरा उपजिला अस्पताल में पदभार ग्रहण करने के निर्देश दिए गए हैं. हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल तबादला समस्या का समाधान नहीं है. जब तक डॉक्टरों के रिक्त पद नहीं भरे जाएंगे और दुर्गम गांवों में एम्बुलेंस तथा चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी.
* जवाबदेही तय होगी या फिर एक और फाइल बंद?
विद्या जांबेकर की मौत ने कई असहज प्रश्न खड़े कर दिए हैं. क्या स्वास्थ्य विभाग इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करेगा? क्या सिकलसेल पीड़ित बच्चों की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा होगी? क्या रानीगांव जैसे दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों की नियुक्ति और एम्बुलेंस सुविधा सुनिश्चित की जाएगी? फिलहाल इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं. लेकिन एक बात स्पष्ट है कि मेलघाट में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने एक और मासूम की जान ले ली है. सरकारी योजनाओं और दावों के बीच विद्या की मौत आदिवासी अंचल की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जहां आज भी कई परिवारों के लिए बीमारी का मतलब इलाज नहीं, बल्कि असहाय इंतजार और कभी-कभी मौत बन जाता है.

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