समय और जनता तय करेंगे मेरा राजनीतिक भविष्य
फिलहाल चुनाव लडने का कोई इरादा और तैयारी नहीं

* रायुकां नेता यश खोडके का बेबाक प्रतिपादन
* ‘अमरावती मंडल’ को दिया विशेष साक्षात्कार
* राजनीति सहित पारिवारिक जीवन पर की खुलकर बात
अमरावती /दि.21- राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहने के साथ ही विधानसभा व विधान परिषद में सदस्य रहनेवाले माता-पिता की संतान रहने के चलते स्वाभाविक तौर पर लोगबाग यह मान लेते है कि, अपने माता-पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढाने के लिए यश खोडके भी राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय होंगे तथा विधान परिषद का चुनाव लडेंगे. परंतु यह अपने-आप में पूरी तरह से सही नहीं है. क्योंकि राजनीति मेरी समझ में नहीं आती और हाल-फिलहाल चुनाव लडने को लेकर मेरी ओर से कोई इरादा अथवा तैयारी भी नहीं है. ऐसे में कहा जा सकता है कि, आनेवाले वक्त और अमरावती की जनता द्वारा यह तय किया जाएगा कि, यश खोडके ने राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय होकर कोई चुनाव लडना है अथवा नहीं, इस आशय का प्रतिपादन खुद रायुकां नेता यश खोडके द्वारा किया गया.
दैनिक ‘अमरावती मंडल’ के डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘मंडल न्यूज’ के पॉडकास्ट में दिए गए विशेष साक्षात्कार के दौरान उपरोक्त प्रतिपादन करने के साथ ही यश खोडके ने अपने राजनीतिक जीवन व संबंधों के साथ-साथ अपने पारिवारिक जीवन तथा राजनीतिक तौर पर बेहद व्यस्त रहनेवाले अपने माता-पिता के साथ अपने संबंधों को लेकर विस्तार के साथ बातचीत की. इस बातचीत के प्रारंभ में ही यश खोडके ने स्पष्ट किया कि, राजनीतिक क्षेत्र में आने की उनकी पहले से कोई योजना नहीं थी, बल्कि उनका अधिकांश बचपन मुंबई में बिता, जहां पर उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा के साथ ही मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढाई पूरी की और वे 2017 में पहली बार अमरावती आए थे. जिसके बाद यहीं के होकर रह गए. चूंकि वर्ष 2019 में उनकी मां सुलभा खोडके ने विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था. जिसके चलते वे उस चुनाव की तैयारियों में एक फ्रंट लाइन कार्यकर्ता के तौर पर जुटे और तब से लेकर अब तक उसी भूमिका को निभा रहे है.
* मेरी इच्छा के लिए सुलभाताई ने लडा था 2019 का चुनाव
इस बातचीत में यश खोडके ने कहा कि, उन्हें आज भी राजनीति सही तरीके से समझ में नही आती और वे राजनीतिक दांवपेंच खेलने में बिल्कुल भी भरोसा नहीं रखते, बल्कि उनके माता-पिता की तरह उनके लिए राजनीतिक व सार्वजनिक क्षेत्र में रहने का एक ही मतलब है कि, किसी उम्मीद के साथ अपने पास आनेवाले लोगों का काम किया जाए और जरुरतमंदो को सहायता दी जाए. वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव को अपने जीवन का सबसे पहला राजनीतिक व चुनावी अनुभव बताते हुए यश खोडके ने कहा कि, वर्ष 2009 में विधानसभा क्षेत्रों के हुए डिलिमिटेशन का उनके माता-पिता को दो बार नुकसान उठाना पडा था. जिसके चलते उनके पिता संजय खोडके ने सुलभा खोडके को विधानसभा चुनाव में खडे करने हेतु निर्वाचन क्षेत्र को बदलने का निर्णय लिया था. हालांकि उस समय तत्कालीन सत्ता पक्ष के प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लडना आसान भी नहीं था. साथ ही उनकी मां सुलभा खोडके भी खुद चुनाव लडने को लेकर बहुत ज्यादा इच्छूक व उत्सूक भी नहीं थी. परंतु वे खुद यानि यश खोडके चाहते थे कि, उनकी मां ने अमरावती निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव जरुर लडना चाहिए. ऐसे में बेटी की इच्छा को देखते हुए उनकी मां ने चुनाव लडने को लेकर हामी भरी थी और अमरावती की जनता ने सुलभाताई खोडके को अपना विधायक चुना था.
* हमारे परंपरागत वोटर हमेशा हमारे साथ रहे
इस बातचीत में यश खोडके ने यह स्वीकार किया कि, वर्ष 2019 की तुलना में वर्ष 2024 का चुनाव पूरी तरह से अलग था. क्योंकि राज्यस्तर पर राजनीतिक हालात पूरी तरह से बदल गए है. जिसका परिणाम वोटिंग पैटर्न पर भी हुआ. इस बातचीत में यश खोडके ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि, वर्ष 2024 के आते-आते राकांपा दो हिस्सों में बंट चुकी थी और अजीत पवार गुट वाली राकांपा भाजपा के साथ महायुति में शामिल हो गई थी. इस बात का विरोधियों द्वारा जमकर फायदा उठाया गया तथा अल्पसंख्यक एवं पिछडे संवर्ग के मतदाताओं में यह गलत संदेश फैलाया गया कि, अब अजीत पवार गुट वाली राकांपा एवं खोडके दंपति ने भाजपा के साथ हाथ मिलाते हुए सेक्युलर विचारधारा को छोड दिया है. जिसके चलते अल्पसंख्यक एवं पिछडे प्रवर्ग के कई मतदाता खोडके ग्रुप से छिटक गए. परंतु खोडके गुट के प्रति आस्था व निष्ठा रखनेवाले परंपरागत मतदाताओं ने सुलभा खोडके की दावेदारी का पूरा साथ दिया. साथ ही उस समय भाजपा एवं शिंदे गुट वाली शिवसेना के नेताओं व स्थानीय पदाधिकारियों ने भी राकांपा प्रत्याशी सुलभा खोडके को चुनाव जीताने के लिए जबरदस्त मेहनत की.
* पहली बार वर्ष 2019 में राजनीति और चुनाव को देखा-समझा था
वर्ष 2019 के चुनाव से जुडी यादों के बारे में बात करते हुए यश खोडके ने कहा कि, उन्होंने उस चुनाव को अपने माता-पिता के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में बडे ध्यान से देखा और समझा. तब उन्हें यह बात समझ में आई कि, दुनिया में सबसे मुश्कील काम है लोगों को अपने साथ जोडना, उन्हें संभाले रखना और उनकी आशाओं व अपेक्षाओं पर खरा उतरना. चूंकि उस समय उनकी मां विधायक चुनकर आ गई थी और उनके पिता पर उपमुख्यमंत्री कार्यालय के कामकाज सहित पूरे राज्य में पार्टी की जिम्मेदारी भी थी. इसके चलते उनके माता-पिता का अक्सर ही मुंबई दौरा चलता रहता था. ऐसे में उन्होंने पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं और अपने माता-पिता के भी संवास सेतू की भूमिका निभानी शुरु की और वे अब भी अपनी वहीं भूमिका निभा रहे है.
* अजीत पवार ने दिया पुत्रवत स्नेह, अन्य कई नेताओं से भी घनिष्ठ संबंध
विधायक खोडके दंपति को राकांपा नेता अजीत पवार का बेहद नजदिकी खासमखास और विश्वासपात्र माना जाता रहा. इस बात का साक्षात्कार में उल्लेख किए जाने पर यश खोडके ने कहा कि, राजनेता व कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ अजीत दादा पवार एक बेहद सुंदर व्यक्तित्व थे. जिन्होंने उन्हें हमेशा पुत्रवत स्नेह व प्यार दिया. अजीत दादा के साथ उनके बेहद पारिवारिक संबंध रहे और जब भी उनकी अजीत दादा से मुलाकात होती थी, तो दादा अक्सर ही उन्हें अपने पास बुलाकर उनका हालचाल पुछते थे. इसके साथ ही यश खोडके ने खुले दिल से यह भी स्वीकार किया कि, राकांपा नेताओं के अलावा अन्य कई पार्टी के नेताओं, विशेषकर स्थानीय नेताओं व पदाधिकारियों के साथ भी उनके बेहद अच्छे संबंध है. जिसके तहत राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ उनके पिता के वर्ष 2004 से संबंध चले आ रहे है. जब देवेंद्र फडणवीस केवल विधायक ही हुआ करते थे. वहीं आज देवेंद्र फडणवीस राज्य की महायुति सरकार में मुख्यमंत्री है. ऐसे में खोडके परिवार द्वारा सीएम फडणवीस का पूरा सम्मान किया जाता है. साथ ही साथ अमरावती में पूर्व मंत्री प्रवीण पोटे पाटिल, तिवसा निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा विधायक राजेश वानखडे तथा भाजपा शहराध्यक्ष डॉ. नितिन धांडे से खुद उनके व्यक्तिगत व घनिष्ठ संबंध है.
* राणा दंपति से दूर-दूर तक संबंध नहीं, हमारा वैचारिक संघर्ष
इसी बातचीत को आगे बढाते हुए जब राणा दंपति का उल्लेख हुआ, तो यश खोडके ने कहा कि, उनका राणा दंपति और युवा स्वाभिमान पार्टी के साथ कोई संबंध नहीं है तथा उनकी आज तक विधायक रवि राणा के साथ कभी भी किसी भी विषय को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है. इस विषय पर यश खोडके का कहना रहा कि, खोडके परिवार का राणा दंपति के साथ वैचारिक संघर्ष है. हम विकास के मुद्दे पर राजनीति करने में भरोसा करते है और हमें सेटींगवाली राजनीति बिल्कुल भी नहीं जमती.
* माता-पिता से काफी कुछ सीखा, कंधों पर विरासत की बडी जिम्मेदारी
यश खोडके के मुताबिक अपने पिता संजय खोडके और मां सुलभा खोडके के बारे में यश खोडके ने इस साक्षात्कार में बताया कि, उनके पिता का स्वभाव काफी हद तक तेज तर्रार है और वे किसी के भी मुंह पर कोई भी वार सपाट लहजे में बोल देते है. क्योंकि जो बात उनके दिल में होती है, वही बात उनके मुंह पर भी रहती है. इसके अलावा संजय खोडके अपने-आप में एक बेहद इमानदार राजनेता है, जो उनके पास तक आनेवाले हर एक व्यक्ति का काम करके देने में विश्वास रखते है. फिर वह व्यक्ति चाहे उनका कोई विरोधी ही क्यों न हो. लेकिन अगर उसे संजय खोडके ने एक बार शब्द दे दिया, तो फिर संजय खोडके पीछे नहीं हटते. फिर चाहे ऐसा करते समय उनका खुदका कोई नुकसान ही क्यों न हो जाए. वहीं दूसरी ओर उनकी मां सुलभा खोडके एक बेहद सामान्य किसान परिवार की बेटी रही. जिन्होंने विवाह के बाद अपना अधिकांश समय आम गृहिणी की तरह बिताया. साथ ही समाजसेवा में रुचि रहने के चलते महिला सक्षमीकरण का काम भी किया. जिसके बाद आगे चलकर पति की इच्छा का सम्मान करते हुए विधानसभा का चुनाव लडा और विधायक निर्वाचित होने के बाद एक सजग जनप्रतिनिधि की भूमिका भी वे अच्छी तरह से निभा रही है. इसके साथ ही यश खोडके ने कहा कि, उनमें अपने माता व पिता के समसमान गुण है. साथ ही वे अपने कंधों पर अपने माता-पिता की विरासत को संभालने की जिम्मेदारी भी महसूस करते है.
* टीम वर्क में हैं पूरा भरोसा
इस साक्षात्कार के दौरान यश खोडके ने कई बार यह दोहराया कि, वे पूरी तरह से संगठन एवं सामूहिक शक्ति में भरोसा करते है. यही वजह है कि, उनका हमेशा ही टीम वर्क में यकिन रहता है. उनका स्पष्ट मानना है कि, कोई भी व्यक्ति खुद अकेले सभी और सारे काम नहीं कर सकता. ऐसे में बेहद जरुरी है कि, अलग-अलग व्यक्तियों को उनकी योग्यता के अनुरुप काम बांट दिए जाए, ताकि सभी कामों या किसी प्रोजेक्ट को परिणामकारक ढंग से पूरा किया जा सके.





