भविष्य को गर्त में ढकेलती ये ‘बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड’ वाली दोस्ती

नींद है, ख्वाब है, हकीकत है,
और किस चीज की जरूरत है… हाल ही में घटित नाबालिग किशोरियों के यौन शोषण और अश्लील वीडियो वायरल कांड ने पूरे बेरार अंचल को देशभर में बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. वरुड में ऐसा ही कुछ घटित होने की खबर मिली, वहीं कोल्हापुर में भी 15 युवतियों पर अत्याचार होने की बात सामने आई है. प्रदेश में अनेक बाबाओ द्वारा महिलाओं का शोषण करने के समाचार सुनने को मिल रहे हैं. लड़कियां हर घर की दहलीज का मान होती हैं, और जब उस मान पर कीचड़ उछाला जाता है, तो पूरा समाज ही लहूलुहान हो जाता है.
21 वीं सदी में बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड की एक नई कुसंस्कृति तेजी से पैर जमाने लगी है. मां-बाप एक विशुद्ध उद्देश्य लेकर अपनी औलाद का दाखिला किसी प्रतिष्ठित महाविद्यालय में कराते हैं. पालक द्वारा परोसे गए उद्देश्य की चाशनी पर अपने पैर जमा कर उनका लाड़ला/लाडली कब ‘बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड’ खेलना शुरू कर देते हैं, मालूम ही नहीं पड़ता. किसी विद्यापीठ के अनिवार्य विषय समान अब यह भी जरूरी है कि छात्र-छात्राएं अपने साथ बॉय़फ्रेंड-गर्लफ्रेंड रखे. आज के युवा की इस शेखचिल्ली सोच को सराहा जा रहा है. दूसरी ओर अब युवती भी मानकर चलती है कि ये भी कौनसा दूध का धुला होंगा. तीन चार गर्लफ्रेंड तो बना ही रखी होंगी जालिम ने.
अब तो टीवी पर जिस प्रकार विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं, उससे तो यह सोचने को व्यक्ति मजबूर हो सकता है कि आखिर कॉलेज कैम्पस में विद्यार्थी पढ़ाई छोड़कर और क्या-क्या करते होंगे. टीवी के विज्ञापन बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड की नई सोच के हमें दर्शन करा रहे हैं. ये तो सभी कर रहे, इसमें छुपाने का क्या बात है. पिछले दिनों टीवी पर एक एडवरटाइजमेंट देखने को मिली. इसमें विवाह के लिए लड़की देखने आए लड़के से युवती कहती है, मेरे एक, दो, तीन नहीं, बल्कि चार बॉयफ्रेंड है. लड़का भी उसी मूड में जवाब देता है. हां, मेरे बाद कोई नहीं रहेगा, तो ठीक है. इसी तरह एक बिस्किट के विज्ञापन में इस तरह की जुमलेबाजी आदमी को सोच में डाल देती है. किसी भी डिक्शनरी में बॉयफ्रेंड का अर्थ ढूंढने पर प्रियतम ही मिलता है. दूसरी ओर लड़की, कुमारिका अथवा प्रेयसी का अर्थ बतौर गर्लफ्रेंड शब्दकोश में दिखाई देता है. बिस्किट का यह विज्ञापन एक संकेत मात्र है. युवक उस युवती से बेझिझक कह रहा है, चार बॉयफ्रेंड ठीक है, लेकिन मेरे बाद एक भी नहीं चलेगा.
आधुनिक परिवेश में लपेट कर इस कुसंस्कृति को अब वीडियो वायरल कर बेपरदा भी कर दिया गया. आज के प्रचलित गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड शब्द के अर्थो की तह तक जाने कोई तैयार नहीं है. समाज और व्यवस्था मौन है. यह नई पीढ़ी के आगे समर्पण है अथवा सहनशक्ति की पराकाष्ठा, कहना मुश्किल है. छात्र जीवन के दरमियान मित्रता की भावना भी उत्पन्न होती है. बढ़ती उम्र और बदलते अभ्यास्क्रम के चलते दोस्त भी बदलते रहते है. इसी में से बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड भी उभर कर आते हैं. आगे प्रेम, फिर प्रेमविवाह और कभी कभी परिवार की सहमति से भी प्रेमी युगल अपनी गृहस्थी का शुभारंभ करने में सफल होते हैं. कुछ चतुर सुजान प्रेमी अपना विवाह किसी नये साथी से करते है. बाद में प्रेमी प्रेमिका की बेजा दखलअंदाज़ी से बात तलाक तक जा पहुंचती. अपनी पुरानी मोहब्बत के नाम पर गृहस्थी के तीन तेरह बज जाते. सामाजिक दिखावे के लिए अकेला/अकेली रहते हुए लिव इन रिलेशनशिप का नया अध्याय शुरू कर दिया जाता है. आज यही अब कुछ समाज में खुले आम हो रहा है.नई पीढ़ी की नई सोच ने सामाजिक चिंता का वातावरण तैयार कर दिया.इससे विवाह संस्था के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लग चुका है.
विचारणीय प्रश्न यह है कि छात्र-छात्राओं को अपने अध्ययन काल में गर्लफ्रेंड-बॉय़फ्रेंड की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं. मौजमस्ती करना यह प्रमुख कहा जा सकता, फिर खर्च पूरा करने, सुरक्षा के लिए, अपने अन्य काम निपटाने, फालतू शौक करने, टाइमपास, मनोरंजन और शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति आदि के चलते यह सब हो रहा. किसी ने वापरा और छोड़ दिया तो फिर दूसरे की तलाश करो. अब तो विवाह होने के बाद भी ऐसे रिश्तों को टटोला जा रहा है. वहीं कई स्वनामधन्य लोग वैवाहिक जीवन दीर्घकाल चलेगा अथवा नहीं, यह देखने विवाह पूर्व फोटो सेशन और फ्रेंडशिप-फ्रेंडशिप खेलने को लंबी अवधि की स्वीकृति देने लगे है. कुछ युवक-युवतियां भविष्य में जीवनसाथी बनने के काबिल है भी या नहीं, यह परखने को भी इस ट्रेंड को अपनाने लगे हैं. महाविद्यालय लक्ष्य को गर्त में ढकेलती यही रिलेशनशिप आगे नैराश्य में तब्दील हो जाती. धड़ाधड़ होते ब्रेकअप से उपजी कुंठा का अंजाम आत्महत्या तक देखा जा सकता. कई युवक-युवतियों की कॉलेजियन लाइफ तो सिर्फ मेरे इतने बॉयफ्रेंड है, गर्लफ्रेंड है, इस रिकॉर्ड की शेखी बघारने में ही बीत जाती. ऐसे सुकुमार-सुकुमारिका सिर्फ अपना माहौल बनाने में लगे रहते. सोशल मीडिया इस आग में घी डालने का काम कर रहा है. इसी के जरिए नजदीकिया बढ़ती हैं, संबंध भी टूटते हैं और यही सब कुछ एक आपराधिक प्रवृति को भी जन्म देता है.
हकीकत में विवाह पूर्व ऐसे रिश्तों के कोई मायने नहीं है. दोस्ती हो सकती है, होनी भी चाहिए. पवित्र दोस्ती जो आपके भविष्य में आपकी मदद करे. विशुद्ध दोस्ती आपका पथ प्रशस्त करेंगी ना कि आपको गुमराह. आज युवा पीढ़ी को यह सब समझने की नितांत आवश्यकता है. बॉयफ्रेंड -गर्लफ्रेंड से बने रिश्ते टिकाऊ नहीं होते. आगे वैवाहिक जीवन भी इससे कष्टप्रद हो जाता है. सामाजिक मान्यता नहीं होने से यही आँख मटक्का आगे बदनामी का प्रमुख कारण बन जाता है. रिलेशनशिप के चक्रव्यूह में फंसे ऐसे लोगों को अपना भविष्य बरबाद होने का पश्चाताप जीवन भर सालता रहता है. सो, अच्छी दोस्ती का जतन करें, ऐसे मित्र ढूंढिए जो आपको आपकी गलतियों से अवगत कराएं. सच्चे मित्रो का स्वागत करें, वही आपके भविष्य में सहायक होंगे.
और अंत में फ्रेंडशिप के इस खेल में मांबाप की लापरवाही और उदासीनता को नाकारा नहीं जा सकता. अपने लख्ते जिगर को किसी ऊंचे कॉलेज में दाखिला दिला देने के बाद मां-बाप की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती, बल्कि यही वो समय है, जब अभिभावकों को अलर्ट रहना है. ऐसे ही समय पालकों को नए संकेत और रुझान प्राप्त होते है लेकिन अधिकांश मां-बाप इन संकेतों की अनदेखी करते है. मां-बाप ही यदि अपनी संतान से मित्रवत हो जाए और सतत उसे मार्गदर्शन करते रहे, तो इस गंदी दोस्ती के रिश्ते से बचा जा सकता है. जहां मां-बाप और बच्चों के बीच प्रगाढ़ मित्रता है, जहां पालक मार्गदर्शक की जवाबदेही के लिए तत्पर है, वहां बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड के रिश्ते पनप ही नहीं पाते. तब उस नवपल्लवित, नवयौवन से कोई वैभव सूर्यवंशी उभरता है, जो मात्र 14 वर्ष की आयु में रनों की बौछार करता दिखाई देता, कोई सौरभ चौधरी दिखाई देता है, जो सिर्फ 16 वर्ष की उम्र में देश के लिए गोल्ड मेडल ले आता है. पालक और पाल्य की यही दोस्ती राही सरनोबत को पिस्टल शूटिंग का सितारा बना देती है, जो 27 वर्ष की उम्र में ही पिस्टल का जादू दिखा कर सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देश का नाम रोशन करती है. अभिभावकों को इस पर गहन चिंतन करना होगा.
बकौल किसी शायर –
ये हकीकत बहोत पुरानी है,
दिल मोहब्बत की राजधानी है,
अपने बच्चों पर मैं क्यों करूं गुस्सा,
हर कमी उसमें खानदानी है.
– संजय जोशी ‘नादान’,
संतोषनगर, परतवाड़ा.





