कभी किसी पद की लालसा नहीं रही, अब कोई राजनीतिक महत्वकांक्षा भी नहीं
शिवाजी शिक्षा संस्था के अध्यक्ष व पूर्व कृषि मंत्री हर्षवर्धन देशमुख का प्रतिपादन

* अमृत महोत्सव पर दैनिक अमरावती मंडल के साथ विशेष तौर पर की बातचीत
* 75 वर्षीय जीवन के तमाम उतार-चढाव पर बेहद खुलकर अपनी बात रखी
* जीवन में मिली तमाम उपलब्धियों से खुद को बेहद संतुष्ट बताया, सहयोगियों के प्रति जताया आभार
* शरद पवार को बताया अपना राजनीतिक गुरू, खुद को पवार का सच्चा सिपाही व एकनिष्ठ कार्यकर्ता बताया
अमरावती/दि.30 – अमरावती जिले की वरूड तहसील अंतर्गत जरूड जैसे छोटे से गांव से निकलकर मोर्शी-वरूड निर्वाचन क्षेत्र का विधायक निर्वाचित होने, राज्य का गृह राज्यमंत्री व कृषि मंत्री बनने तथा अब लगातार दो बार विदर्भ की सबसे बडी तथा महाराष्ट्र की दूसरे क्रमांक वाली श्री शिवाजी शिक्षा संस्था का अध्यक्ष के तौर पर काम करने जैसे अवसरों को किसी भी व्यक्ति के जीवन की सबसे बडी उपलब्धि कहा जा सकता है. चूकि ये तमाम अवसर मेरे अपने हिस्से में आए हैं. इसके चलते मैं खुद को बेहद सौभाग्यशाली मानता हूं तथा जिन सहयोगियों की बदौलत मुझे ये तमाम अवसर मिले, उन सहयोगियों के सभी हमेशा ही कृतज्ञ भी रहा हुं. इसके साथ ही यह भी कह सकता हूं कि, मैंने अपने जीवन में कभी खुद अपने फायदे के लिए किसी पद की कोई लालसा नहीं की. बल्कि मुझे अपने आप अलग- अलग पदों पर रहने के मौके संयोगवश मिलते चले गये.जिनका मैने आम लोगों की भलाई के लिए प्रयोग किया. साथ ही अब मैं यह भी कह सकता हूं कि उम्र के 75 वें वर्ष के पडाव तक पहुंचने के बाद अब मेरी कोई राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं है. इस आशय का प्रतिपादन राज्य के पूर्व कृषिमंत्री रह चुके श्री शिवाजी शिक्षा संस्था के अध्यक्ष हषवर्धन उर्फ भैय्यासाहब देशमुख द्बारा किया गया.
अपने अमृत महोत्सव समारोह की पूर्व संध्या पर दैनिक ‘अमरावती मंडल’ के साथ विशेष तौर पर बातचीत करते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने अपने 75 वर्षीय जीवन काल के दौरान सामने आए तमाम उतार चढावो पर खुलकर बातचीत की. साथ ही साथ अपने जीवन के साथ जुडे पारिवारिक, सामाजिक, सार्वजिनक व राजनीतिक पहलुओं पर भी विस्तार के साथ प्रकाश डाला. पूरे साक्षात्कार के दौरान बेहद प्रसन्नचित्त एवं उर्जावान दिखाई दे रहे हर्षवर्धन देशमुख से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे हमेशा तनावमुक्त रहते है. संभवत: यही वजह है कि वे प्रसन्नचित्त व उर्जावान दिखाई देते है और 75 वर्ष की आयू में पहुंचने के बाद ही पूरी तरह से सक्रिय है.
इस साक्षात्कार के दौरान अपने जीवन के प्रारंभीक वर्षों के बारे में बातचीत करते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि उनका परिवार मुलत: वरूड तहसील अंतर्गत जरूड गांव से वास्ता रखता है तथा कक्षा तीसरी तक उनकी प्राथमिक शिक्षा जरूड गांव में स्थित जिला परिषद की प्राथमिक शाला में ही हुई. जिसके बाद उन्हें उनके भाईयों की तरह आगे की पढाई- लिखाई के लिए ग्वालियर स्थित सिंधिया पब्लिक स्कूलभेज दिया गया. जहां पर उन्होंने कक्षा 12 वीं तक पढाई कि और इंदौर से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद एलएलबी करने के लिए पुणे चले गए. जहा पर एलएलबी सेकंड इयर तक पढाई करने के बाद उन्होंने थर्ड इयर की पढाई के लिए मुंबई के सिध्दार्थ लॉ कॉलेज में एडमिशन लिया और मुंबई विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल की.
एलएलबी की पढाई के बीच में ही पुणे से मुंबई शिफ्ट होने की कहानी सुनाते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि जब वे पुणे में रहकर एलएलबी कर रहे थे, तो वह सन 1971 का दौर था, जब भारत और बांग्लादेश के बीच युध्द छिडा हुआ था. जिसके चलते उन्होंने अपने सहपाठियों के साथ मिलकर सेना के लिए सहायता अभियान चलाया था जिसके चलते उनके द्बारा किए जानेवाले कामों की खबर पुणे से प्रकाशित होने वाले अखबारों में छपा करती थी और उनका कुछ हद तक पुणे में नाम भी हो रहा था. उसी दौरान बारामती क्षेत्र में रहनेवाले अपने एक रिश्तेदार के यहां पर उनकी शरद पवार के साथ पहली बार मुलाकात हुई थी और आश्चर्यवाली बात यह थी कि शरद पवार को उनके द्बारा सेना की सहायता हेतु किए जानेवाले कामों की जानकारी दी. साथ ही शरद पवार उनसे मिलकर काफी हद तक प्रभावित हुए थे. जिसके बाद शरद पवार ने भी उन्हें अपने साथ मुंबई बुलाया था और फिर अपनी जान पहचान के जरिए मुंबई स्थित एक कंपनी में नौकरी भी लगाकर दी थी. जिसके बाद उन्होंने एलएलबी के अंतिम वर्ष की पढाई मुंबई से पूरी की. यहां से उनके और शरद पवार के बीच परिचय व संबंध ज्यादा घनिष्ठ व प्रगाढ होते चले गए.
इस बातचीत के दौरान भैय्यासाहब देशमुख ने अपने पिता प्रतापसिंह देशमुख को भी याद करते हुए कहा कि उनके पिता काफी अनुशासन प्रिय थे. साथ ही उनका स्वभाव काफी सौम्य था. जिनके साथ वे हमेशा दिल खोलकर बात किया करते थे. खास बात यह थी कि उनके घर में शुरू से ही राजनीतिक वातावरण रहा और उनके दादा रामराव उर्फ तात्यासाहेब आनंदराव देशमुख ने भी सन 52 का विधानसभा चुनाव लडा था. जिसके बाद उनके पिता प्रतापसिंह देशमुख ने सन 57 का चुनाव लडा. जिसमें उन्हें हार का सामना करना पडा तथा सन 1962 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत हासील करते हुए विधायक निर्वाचित हुए थे. हर्षवर्धन देशमुख के मुताबिक जीस समय उनके दादाजी का राजनीतिक रसूख चल रहा था. उस समय वे और उनके भाई काफी छोटे थे. साथ ही जीस वक्त उनके पिताजी विधायक निर्वाचित हुए थे तब वे अपने भाईयों के साथ ग्वालियर की सिंधिया पब्लिक स्कूल में थे. जिसके चलते उन्होंने अपने पिता के विधायक रहनेवाला दौर देखा ही नहीं, साथ ही कभी विधायक के बेटे होने का घमंड व दुरूपयोग भी नहीं किया. इस समय भैयासाहब ने यह भी बताया कि उनके पिता भले ही निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विधायक निर्वाचित हुए थे. लेकिन वे पूरी तरह से कांग्रेसी विचारधारा के प्रति समर्पित थे. परंतु खास बात यह रही कि निर्दलीय विधायक निर्वाचित होने के बाद उन्होेंने कांग्रेस की ओर से मिली ऑफर को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि ऐसा करना मतदाताओं के साथ धोखा होगा, क्योंकि मतदाताओं ने कांग्रेस को नकारते हुए उनकी निर्दलीय दावेदारी को चुना है.
एलएलबी करने के बाद मुंबई से गांव वापिस आने और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होकर राजनीति से जुडने के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि वे सन 1976 के आसपास अपने गांव लौटे थे. तब तक उनके पिता ने राजनीति से लगभग सन्यास ले लिया था और सन 62 से 66 तक विधायक रहने के बाद उनके पिता ने आगे कोई चुनाव नहीं लडा. ऐसे में उन्होंने अपने दादा व पिता की विरासत को आगे बढाने का निर्णय लिया था और उनकी इच्छा कब शरद पवार द्बारा गठित किए गए पूरोगामी लोकशाही दल यानी पुलोद के साथ जुडने की थी. यद्यपि उनके पिता नहीं चाहते थे कि वे गांव स्तर की राजनीति करे और स्थानीय स्तर का कोई चुनाव लडे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने सन 1979 में जिला परिषद का चुनाव लडा, जिसमें वे विजयी भी रहे. जिसके बाद वे सन 1982 में जिला परिषद के उपाध्यक्ष भी निर्वाचित हुए. इस दौरान उन्होंने शरद पवार के कहने पर सन 1980 में पुलोद के प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा का चुनाव भी लडा, लेकिन उसमें उनकी हार हो गई.
खुद को शरद पवार का समर्पित सिपाही व एकनिष्ठ कार्यकर्ता बताते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि शरद पवार के साथ जबरदस्त करीबी संबंध रहने के बावजूद उनके हाथों सन 1985 में एक चुक हो गई थी. चूंकि सन 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या हुई थी. इसके चलते कांग्रेस की पक्ष में जबरदस्त सहानुभूति की लहर पूरे देश में चल रही थी. जिसके बाद सन 1985 में हुए विधानसभा चुनाव के समय एनकेपी सालवे सहित कांग्रेस के कई बडे नेताओं ने उन्हें मोर्शी-वरूड निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस का टिकट दिलाने का भरोसा दिया था. जिसके चलते उन्होंने शरद पवार को बताए बिना कांग्रेस पार्टी में प्रवेश कर लिया था. हालांकि उस समय रामटेक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के सांसद रहनेवाले पीवी नरसिंहराव ने उनकी टिकट काट दी थी. जिसके बाद शरद पवार ने दरियादिली दिखाते हुए उन्हें पुलोद में वापिस लौट आने और पुलोद प्रत्याशी के तौर पर मोर्शी-वरूड से चुनाव लडने हेतु कहा था. लेकिन वे तुरंत पाला बदलने के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में उन्होंने अपने स्थान पर बी.एल. ठाकरे को पुलोद का टिकट दिलाया. हालांकि ठाकरे 1600 वोट से हार गए थे. विधानसभा चुनाव निपटते ही वे एक बार फिर शरद पवार के खेमे में चले आए और उन्होंने शरद पवार का कभी भी हाथ और साथ नहीं छोडा.
पुराने दौर को याद करते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि सन 1990 के दौरान शरद पवार ने अपने समर्थकों सहित कांग्रेस पार्टी में प्रवेश करते हुए पुलोद का भी कांग्रेस में विलीनिकरण कर दिया. जिसके चलते वे भी कांग्रेस में शामिल हो गए. उस समय भी रामटेक से पीवी नरसिंहराव ही सांसद थे. जिन्होंने एक बार फिर विधानसभा चुनाव में उनकी टीकट को काटा तथा तत्कालीन विधायक पुरूषोत्तम ठाकरे को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाया. उस समय मोर्शी-वरूड निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं ने ही उन पर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर दबाव बनाना शुरू किया, तथा समर्थकों ने खुद ही नामांकनपत्र भरते हुए अपने खर्च से उनका प्रचार करना भी शुरू कर दिया. मतदाताओं की ओर से मिले जबरदस्त समर्थन की बदौलत वे मोर्शी-वरूड निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्यार्शी रहनेवाले तत्कालीन विधायक को हराते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीते थे.
सन 1990 के चुनाव में विधायक निर्वाचित होने के बाद गृहराज्य मंत्री बनने के साथ ही सीधे कृषि मंत्री के पद तक पहुंचने की अपनी यात्रा के बारे में बताते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि उस समय विधानसभा में निर्दलीय सदस्याेंं की संख्या 10-12 के आसपास थी. जिनका नेतृत्व वे ही कर रहे थे और उन्होंने अपना समर्थन पहले से ही शरद पवार को दे रखा था. जिसके चलते तब निर्दलीयों की सहायता से शरद पवार की सरकार बनी थी. हालांकि कुछ समय बाद शरद पवार के खिलाफ विलासराव देशमुख और सुशीलकुमार शिंदे जैसे कांग्रेस नेताओं ने पार्टी हाईकमान के सामने जबरदस्त शिकायत की गई. जिसके चलते जे.बी. पटनायक, जी.के. मुपनार व प्रणव मुखर्जी जैसे वरिष्ठ कांग्र्रेसी नेताओं को पार्टी द्बारा मुंबई भेजा गया था. उस समय हमने साफ तौर पर कहा था कि अगर पवार को नेतृत्व पद से हटाया गया तो निर्दलीय विधायकों का गुट कांग्रेस के साथ नहीं रहेगा. हालाकि इसके बाद शरद पवार को मुख्यमंत्री के पद से हटाते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंगराव के मंत्री मंडल में रक्षा मंत्री पद का जिम्मा सौंपा गया और उनके स्थान पर सुधाकरराव नाईक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने. वहीं शरद पवार को लेकर अपनी भूमिका के चलते तब मेरे हिस्से में मंत्री पद आते-आते रह गया.
भैय्यासाहब देशमुख ने उस दौर में हुई राजनीतिक उठापठक को याद करते हुए बताया कि उस समय जनता पार्टी के 9 विधायक कांग्रेस में शामिल हुए थे. जिसके चलते उनमें से किसी एक को मंत्री पद देना था. उस वक्त केंद्र में रक्षामंत्री रहनेवाले शरद पवार ने मेरे नाम को भी आगे बढाया था और मुझे मंत्री पद देने के लिए पार्टी के सामने जबरदस्त आग्रह रखा था. उस समय नरसिंहराव प्रधानमंत्री रहने के साथ-साथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे. जिन्हें आखिरकार शरद पवार की मांग के आगे झुकना पडा और तब उन्हें राजस्व विभाग का राज्यमंत्री बनाया गया. राजस्व राज्यमंत्री के कार्यकाल दौरान अपने द्बारा किए गए उल्लेखनीय काम को याद करते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि उन्होंने ही अपने कार्यकाल के दौरान महाराष्ट्र में अतिरिक्त जिलाधीश के पद का निर्माण करवाया था और उनके द्बारा शुरू की गई वह व्यवस्था अब तक चली आ रही है.
इसके साथ ही हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि उस समय राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाईक एवं तत्कालीन रक्षा मंत्री शरद पवार के बीच काफी बडे पैमाने पर मतभेद चल रहे थे. और उसी दौरान शरद पवार पर भूखंड घोटाले को लेकर काफी हद तक बेबुनियाद आरोप लगे थे. जिसके चलते उन्होंने तत्कालीन सीएम सुधाकरराव नाईक के समक्ष पत्रवार्ता बुलाते हुए स्थिति को स्पष्ट करने की बात रखी थी. जिसे नाईक ने अनसुना व अनदेखा कर दिया था. ऐसे में उन्होंने खुद ही पत्रवार्ता बुलाने का निर्णय लिया था. जिस पर इसके चलते नाईक ने उन्हें विपरित परिणामों की चेतावनी दी थी और फिर एक दिन अचानक ही उनका राज्यमंत्री पद छिन लीया गया. लेकिन वक्त एवं राजनीति ने बहुत जल्द करवट बदली और शरद पवार ने दिल्ली से मुंबई आकर एक बार फिर मुख्यमंत्री पद का जिम्मा संभाला. जिसके बाद उन्हें कैबिनेट मंत्री का पद देते हुए कृषि, जलसंवर्धन व मृदा संवर्धन जैसे तीन महत्वपूर्ण विभागों की संयुक्त जिम्मेदारी दी गई. उपरोक्त किस्सा सुनाते हुए भैय्यासाहब ने कहा कि विधायक के तौर पर अपने पहले ही कार्यकाल के दौरान वे राज्यमंत्री और फिर कैबिनेट मंत्री बनाए गए थे. जिसके चलते उन्होंने एक बार शरद पवार से मजाक में कहा था कि साहेब, अब यदि आप दूबारा मुंबई छोडकर केेंद्र की राजनीति में गए, तो मै अब कैबिनेट मंत्री से सीधे मुख्यमंत्री ही बनुंगा.
राज्य के कृषि मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल को याद करते हुए हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि कृषि, जलसंवर्धन व मृदा संवर्धन जैसे विषय हकिकत में एक दूसरे से जुडे हुए है. इस बात को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने तीनों विभागों को एक साथ संयुक्त करते हुए उन्हें तीनों विभागों का मुख्यमंत्री बनाया था. जिसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के लगभग सभी जिलो में खेती किसानी एवं जलसंवर्धन के लिहाज से विशेष तौर पर ध्यान देना शुरू किया तथा राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों की जरूरत व भौगोलिक स्थिति के हिसाब से मृदा एवं जलसंवर्धन की नीतियां लागू की गई. जिसके तहत समूचे विदर्भ क्षेत्र में सीमेंट बंधारे व कोल्हापुरी बंधारे बनाने का काम शुय किया गया. साथ ही साथ अप्परवर्धा बांध के लिए सन 1990 से 1995 के बीच करीब 90 करोड रुपए खर्च किए गए. जिसके चलते अप्परवर्धा बांध की जलसंग्रहण क्षमता में वृध्दि होने के साथ ही वरूड एवं मोर्शी तहसीलो को भी ड्राय जोन से बाहर लाया जा सका.
सन 1995 में एक बार फिर विधानसभा के लिए मोर्शी-वरूड क्षेत्र से निर्वाचित हुए हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि उस समय राज्य में भाजपा सेना युति की सरकार बनी थी और वे विपक्ष में थे. जिसके चलते उन्होंने विपक्ष में रहते हुए आम जनता से जुडे मुद्दों पर सरकार के साथ जमकर संघर्ष भी किया. साथ ही साथ अपने निर्वाचन क्षेत्र की बेहतरीन के लिए भी काफी काम किया. हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि सन 1999 का दौर उनके जीवन के लिए बेहद निर्णायक मोड था. क्योंकि तब सोनिया गांधी के विदेशी मूल वाले मुद्दे को लेकर हुए विवाद के चलते शरद पवार ने कांग्रेस को छोडने का निर्णय लिया था. जिसकी चर्चा उन्होंने हमारे साथ भी की थी. वह फैसला हमारे लिए काफी हद तक नुकसानदेह भी साबित हो सकता था, क्योंकि पश्चित महाराष्ट्र व मराठवाडा क्षेत्र की राजनीति पर अपनी जबरदस्त पकड करनेवाले शरद पवार का उस समय विदर्भ क्षेत्र में बहुत अधिक प्रभाव नहीं था. ऐसे में इस बात को समझते हुए शरद पवार ने हमे अपना फैसला लेने की पूरी आजादी भी दी थी और हमने शरद पवार की ही साथ रहने का निर्णय लिया था. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लडा था. जिसमें उन्हें हार का सामना करना पडा था. हर्षवर्धन देशमुख ने याद करते हुए बताया कि उस समय भी कांग्रेस पार्टी द्बारा अपने प्रचार के दौरान यह बात फैलाई गई थी कि चुनाव निपटने के बाद राकांपा द्बारा भाजपा का साथ दिया जाएगा तथा भाजपा व राकांपा साथ मिलकर संविधान बदलने का काम करेंगे, लगभग उसी तरह का प्रचार हाल फिलहाल तक राकांपा को लेकर किया जाता रहा. पूर्व मंत्री हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि सन 1999 के विधानसभा चुनाव पश्चात राज्य में कांग्रेस-राकांपा आघाडी की ही सरकार बनी रही. लेकिन चुंकि वे विधायक निर्वाचित नहीं हो पाए थे, ऐसे में उनके राजनीतिक पुनर्वसन की ओर शरद पवार द्बारा विशेष तौर पर ध्यान दिया गया, जिसके तहत मंत्री मंडल का गठन होने से पहले ही शरद पवार ने तत्कालीन उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल से कहकर उन्हें विदर्भ वैधानिक विकास महामंडल का अध्यक्ष नियुक्त करवाया था और साथ ही प्रतिवर्ष 50 करोड रुपए की निधि खर्च करने का अधिकार भी दिलवाया था. हर्षवर्धन देशमुख के मुताबिक उनके अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान ही अमरावतीवासियों को विदर्भ वैधानिक विकास महामंडल के बारे में जानकारी मिली और उनके कार्यकाल के बाद ही इस मंडल का महत्व बढा.
वर्ष 2004 में एक बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा का चुनाव जीतते हुए विधायक निर्वाचित होनेवाले हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि उन्होंने जहां अपना पहला चुनाव अपने समर्थकों द्बारा इकट्ठा किए गए पैसों के दम पर लडा था. वहीं सन 2004 के चुनाव हेतु किसी पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पडने दिया. बल्कि खुद ही चुनाव लडने के लिए इधर-उधर से पैसोंं का इंतजाम किया. वह कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्होंने एक तरह से राजनीतिक क्षेत्र से दूरी बना ली. क्योंकि तब तक राजनीति में काफी हद तक बदलाव आ चुका था और विधान मंडल में कोई साधक-बाधक व सार्थक चर्चा नहीं हुआ करती थी. साथ ही साथ मतदाताओं की सोच में भी काफी हद तक परिवर्तन आ चुका था. हर्षवर्धन देशमुख के मुताबिक पहले मतदाताओं द्बारा यह देखा जाता था कि कौनसा प्रत्याशी अपने निर्वाचन क्षेत्र का बेहतर तरीके से खुला कर सकता है, वहीं आगे चलकर मतदाताओं द्बारा अपने तात्कालीक व व्यक्तिगत फायदो को ध्यान में रखते हुए मतदान किया जाने लगा.
अपनी सक्रिय राजनीति वाले दौर में हुए मराठवाडा विद्यापीठ के नामांकन को लेकर चर्चा छिडने पर पूर्व मंत्री हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि उस समय सामने चुनावी मुहाने को देखते हुए वे और उनके कई सहयोगी विधायक एवं नेता नामांकरन के खिलाफ थे. क्योंकि उन सब का मानना था कि मराठवाडा विद्यापीठ का यहीं नामांकरन किया जाता है तो इसका आगामी चुनाव में विपरित परिणाम पड सकता है तथा पार्टी को नुकसान भी उठाना पड सकता है. लेकिन तब भी शरद पवार नामांकन को लेकर पूरी तरह से सकारात्मक थे. क्योंकि शरद पवार का मानना था कि लंबे समय तक हाशिये पर पडे समाज के उपेक्षित घटको को भी न्याय और बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए. जिसके चलते शरद पवार ने मराठवाडा विद्यापीठ के नामांतरण का फैसला लिया था. जिसका अपेक्षा के अनुरूप कांग्रेस व राकांपा के चुनावी प्रदर्शन पर विपरीत असर भी हुआ और वहीं से शिवसेना में नामांतरण के मुद्दे को उठाते हुए मराठवाडा में अपनी जगह बनाई.
वर्ष 2008 के आसपास सक्रिय राजनीति से दूरी बना लेनेवाले हर्षवर्धन देशमुख ने आगे चलकर वर्ष 2017 में शिवाजी शिक्षा संस्था के अध्यक्ष पद पर चुनाव लडा और एक के बाद एक लगातार दो बार वे शिवाजी शिक्षा संस्था के अध्यक्ष निर्वाचित हुए. राजनीति के क्षेत्र को छोडकर शिक्षा के क्षेत्र में सक्रियता को लेकर सवाल पूछे जाने पर हर्षवर्धन देशमुख ने बताया कि जब सन 1975-76 के आसपास शिवाजी शिक्षा संस्था में आजीवन सदस्यों का पंजीयन किया गया था तब उनके पिता ने उनका नाम संस्था में आजीवन सदस्य के तौर पर पंजीकृत कराया था. साथ ही वे सन 1987 में पहलीबार शिवाजी शिक्षा संस्था की कार्यकारिणी में रावसाहब इंगोले के पैनल की ओर से सदस्य निर्वाचित हुए थे. हालांकि उस समय अध्यक्ष पद के दावेदार रहनेवाले रावसाहब इंगोले चुनाव हार गए और दादासाहब कालमेघ अध्यक्ष चुने गए थे. सन 1987 में शिवाजी शिक्षा संस्था की कार्यकारिणी का सदस्य रहने के दौरान आए अनुभवों के आधार पर उन्हें यह महसुस हुआ कि शिवाजी शिक्षण संस्था में अध्यक्षीय प्रणाली रहने के चलते केवल अध्यक्ष ही संस्था के विकास व विस्तार का काम कर सकता है, ऐसे में राजनीति से दूरी बनाने के बाद उन्होंने शिवाजी शिक्षण संस्था का अध्यक्ष बनने की इच्छा प्रकट की और फिर पक्का मन बनाकर वर्ष 2012 में शिवाजी संस्था के अध्यक्ष पद का चुनाव लडा, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पडा. इसके बाद वर्ष 2017 में वसंतराव धोत्रे एक बार फिर संस्थाध्यक्ष बनने के इच्छूक थे. जिनके सामने उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वे उपाध्यक्ष अथवा किसी अन्य पद के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है और उन्हें अध्यक्ष बनकर ही काम करना है. जिसके चलते वसंतराव धोत्रे ने अपनी दावेदारी को पीछे लेते हुए खुद होकर उनका नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे बढाया, साथ ही उनकी जीत के लिए भी पूरे प्रयास किए. जिसके बदौलत वे शिवाजी शिक्षण संस्था के अध्यक्ष निर्वाचित हुए. यह एक तरह से अब दिवंगत हो चुके वसंतराव धोत्रे का बडप्पन ही था.
शिवाजी शिक्षण संस्था में अध्यक्ष के तौर पर अपने अनुभवों को साझा करते हुए संस्थाध्यक्ष हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि उन्होंने शिक्षा महर्षी भाउसाहेब देशमुख द्बारा स्थापित संस्था को आगे बढाने में हमेशा ही अपनी ओर से पूरा सहयोग किया. जब वे राज्य की सत्ता में थे तब भी उनका पूरा ध्यान शिवाजी शिक्षण संस्था के विस्तार की तरफ था. हालांकि तब उन्होंने संस्था में कोई पद प्राप्त करने की कभी लालसा नहीं रखी थी और अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए किसी का कभी कोई नुकसान भी नहीं किया. उनके मुताबिक भाउसाहेब द्बारा स्थापित शिव परिवार का समाज में अपना एक अलग स्थान है और भाउसाहब ने बहुजनों के घरों तक शिक्षा की गंगा पहुंचाने हेतु एक गैर राजनीतिक संस्था के तौर पर शिवाजी शिक्षा संस्था की स्थापना की थी. जिसे राजनीति से दूर रखते हुए भाउसाहेब की विरासत को आगे बढाने का काम उनके द्बारा करने का प्रयास किया गया. इस समय हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि अगर उनकी वजह से संस्था का कोई नुकसान होता है तो वे खुद ही पद और संस्था से खुद को अलग करना पसंद करेंगे.
इस समय हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि विदर्भ की सबसे बडी और राज्य की दूसरे क्रमांकवाली शिक्षा संस्था स्थापित करनेवाले भाउसाहेब देशमुख को कभी शिक्षा सम्राट या संस्था सम्राट नहीं कहा गया. बल्कि उन्हें शिक्षा महर्षी जैसे संबोधन से संबोधित किया गया. यह अपने आप में बहुत बडी बात है. जिसका उन्होंने हमेशा पूरी गंभीरता के साथ एहसास रखा है. यही वजह है कि उन्होंने संस्था को एक परिवार की तरह संभालते हुए सबसे पहले अंतर्गत गटबाजी को समाप्त किया जिसके चलते आज संस्था की कार्यकारिणी व आमसभा में सभी प्रस्ताव सर्वसम्मति के साथ पारित होते है. जिसके साथ ही हर्षवर्धन देशमुख ने यह भी कहा कि वे शिवाजी शिक्षा संस्था के निर्माता नहीं है. बल्कि अध्यक्ष के तौर उर उन्हें संस्था का कामकाज व प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी मिली हुई है. इस बात को वे हमेशा याद रखते है और संस्था की बेहतरी के लिए अपने सभी संपर्को का यथायोग्य उपयोग भी करते है.
शरद पवार के बेहद करीबी रहने के साथ ही कांग्रेसी विचार धारा से वास्ता रखनेवाले हर्षवर्धन देशमुख के इन दिनों केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जैसे भाजपा नेताओ के साथ भी बेहद घनीष्ठ संबंध है, इस बात की ओर ध्यान दिलाए जाने पर पूर्वमंत्री व शिवाजी संस्था के अध्यक्ष हर्षवर्धन देशमुख ने बेबाक तरीके से जवाब देते हुए कहा कि सरकार की मदद के बिना किसी भी संस्था का विकास नहीं हो सकता और संस्थाओं से मिलनेवाले सहयोग के बिना सरकारे भी नहीं बन सकती यानी दोनों एक दूसरे के पुरक है. चुंकि वे राजनीति में भी रहे और अब संस्था भी चला रहे है. जिसके चलते वे यह बात अपने अनुभव के आधार पर कह सकते है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भाउसाहेब देशमुख अपने आप ने एक ऐसे नेता रहे जिन्हे माननेवाले लोग सभी दलों में है. जिसके चलते महाराष्ट्र में सरकार चाहे किसी भी दल की हो, लेकिन सभी सरकारो और उसके मंत्रियों द्बारा भाउसाहेब की संस्था को आगे बढाने में हमेशा ही सहयोग किया जाता रहा. यही वजह है कि यद्यपि वे सत्ताविरोधी दल से वास्ता रखते है, लेकिन इसके बावजूद संस्था को सरकार की ओर से प्रतिवर्ष करोडो रूपयों की निधि मिलती है.
आगामी 25 वर्षों में शिवाजी शिक्षा संस्था कहां पर रहेगी और संस्था का भविष्य कैसा रहेगा यह सवाल पूछे जाने पर हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि वे कभी भी इतनी लंबी योजना बनाकर नहीं चलते, बल्कि वर्तमान में जीने और वर्तमान को सुधारने में भरोसा रखते है. उनके मुताबिक यदि वर्तमान में हमने अपने कार्यक्षेत्रों को अपना 100 फीसद दिया है, तो भविष्य निश्चित ही बेहतर रहेगा. यहीं वजह है कि शिवाजी शिक्षा संस्था में अध्यक्ष तौर पर पिछले 10 वर्षों के अपने कार्यकाल दौरान उन्होंने संस्था द्बारा संचालित सभी शालाओं एवं महाविद्यालयों के शैक्षणिक स्तर को उंचा उठाने तथा सभी शालाओं व महाविद्यालयों के प्रदर्शन एवं परिणाम को सुधारने का पूरा प्रयास किया. जिसके सार्थक नतीजे अब दिखाई दे रहे है. इसके चलते उन्हें पूरा भरोसा है कि शिवाजी शिक्षा संस्था का भविष्य काफी उज्वल रहेगा और इस बात को ध्यान में रखते हूए संस्था के मतदाता रहनेवाले आजीवन सदस्यों द्बारा उन्हें लगातार तीसरे कार्यकाल हेतु अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी.
इस बातचीत के दौरान हर्षवर्धन देशमुख ने कहा कि राजनीति व सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय रहने के बावजदू वे हमेशा ही बेहद पारिवारिक व्यक्ति रहे. और वे काम को कभी भी अपने घर पर लेकर नहीं गए. बल्कि अपने कामकाज को अपने कार्यस्थल पर पूरा करने के बाद वे हमेशा तनावमुक्त होकर ही अपने घर पहुंचे और परिवार में अपनी पत्नी व दोनों बेटियों के साथ प्रसन्नचित समय बिताया. आज उनकी एक बेटी पुणे में व दूसरी बेटी अमरावती में रहती है तथा दोनों अपने-अपने घर संसार में खुश है. साथ ही वे खुद अपनी पत्नी के साथ जीवन की संध्याबेला का आनंद ले रहे हैं.





