432 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वहन
19 जून को कौंडण्यपुर से रवाना होगी माता रुक्मिणी की पैदल पालकी

* पालकी यात्रा 29 जुलाई को वापिस लौटेंगे
अमरावती/दि.10– विदर्भ के प्राचीन तीर्थस्थल कौंडण्यपुर से माता रुक्मिणी की ऐतिहासिक पैदल पालकी यात्रा 19 जून को शाम 4 बजे भव्य धार्मिक समारोह के साथ पंढरपुर के लिए रवाना होगी. लगभग 432 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत पालकी विभिन्न स्थानों पर विश्राम करते हुए आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर 25 जुलाई को पंढरपुर पहुंचेगी तथा 29 जुलाई को पुनः कौंडण्यपुर लौटेगी.
वर्धा नदी के तट पर स्थित कौंडण्यपुर को माता रुक्मिणी का मायका तथा विदर्भ की प्राचीन राजधानी माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह विदर्भ नरेश भीष्मक की राजधानी थी, जो माता रुक्मिणी के पिता थे. यहां स्थित श्री विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. इतिहास के अनुसार, वर्ष 1594 में संत सद्गुरु सदाराम महाराज ने कौंडण्यपुर से पंढरपुर तक पैदल पालकी यात्रा की शुरुआत की थी. तब से यह परंपरा लगातार जारी है और इस वर्ष यात्रा का 432वां वर्ष मनाया जा रहा है. माता रुक्मिणी की यह पालकी महाराष्ट्र की महत्वपूर्ण वारकरी परंपराओं में से एक मानी जाती है.
* अमरावती में होगा भव्य स्वागत
पालकी यात्रा कौंडण्यपुर से रवाना होने के दो-तीन दिन बाद अमरावती शहर पहुंचेगी, जहां श्रद्धालुओं द्वारा भव्य स्वागत किया जाएगा. इस अवसर पर स्वागत द्वार, पुष्प सजावट, आतिशबाजी, प्रसाद वितरण, महाप्रसाद, नाश्ता और शीतल पेय की व्यवस्था की जाएगी. बड़ी संख्या में वारकरी और श्रद्धालु पालकी के दर्शन और स्वागत के लिए उपस्थित रहते हैं.
* धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
श्रीमद्भागवत में कौंडण्यपुर का उल्लेख ‘कुंडिनपुर’ के नाम से मिलता है. यह स्थल केवल माता रुक्मिणी का जन्मस्थान ही नहीं, बल्कि कई पौराणिक और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से भी जुड़ा हुआ है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार राजा दशरथ की माता इंदुमती, ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा, राजा भगीरथ की माता केशिनी तथा राजा नल की पत्नी दमयंती का संबंध भी इसी क्षेत्र से माना जाता है. विट्ठल-रुक्मिणी संस्थान और वारकरी पंचकमेटी ने पंचक्रोशी क्षेत्र के सभी श्रद्धालुओं से पालकी प्रस्थान समारोह में शामिल होने और इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनने की अपील की है.





