अमरावती के लाल भीमराव देशमुख ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में छोड़ी अमिट छाप
खारतलेगांव जैसे छोटे गांव का था यह खिलाडी

अमरावती/दि.12– विश्व फुटबॉल प्रतियोगिताओं के रोमांच के बीच अमरावती जिले के खरतालेगांव गांव के अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी इहळाीरे ऊशीर्हाीज्ञह की उपलब्धियां एक बार फिर चर्चा में हैं. सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने भारतीय फुटबॉल में अपनी अलग पहचान बनाई और 1948 के लंदन ओलंपिक के लिए चयनित भारतीय टीम का हिस्सा बने.
खरतालेगांव जैसे छोटे गांव से निकलकर भीमराव देशमुख ने 1940 से 1951 तक करीब 12 वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया. उस दौर में वे विदर्भ क्षेत्र के एकमात्र फुटबॉल खिलाड़ी थे जिन्होंने भारतीय टीम में स्थान बनाया. नंगे पैर और बिना आधुनिक सुविधाओं के खेलते हुए उन्होंने फुटबॉल मैदान पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. बताया जाता है कि गांव के शिवाजी क्लब में उनके खेल से प्रभावित होकर एक अधिकारी उन्हें मुंबई ले गए. वहां उन्होंने कई प्रतिष्ठित क्लबों के लिए खेलते हुए अपनी पहचान बनाई. उन्होंने वायएमसीए स्पोर्ट्स क्लब, डब्ल्यूआईएए स्पोर्ट्स क्लब, साउथ इंडियन एक्सआई स्पोट्स क्लब और ट्रेड्स इंडिया स्पोर्ट्स क्लब का प्रतिनिधित्व किया तथा मुंबई के कूपरेज मैदान पर शानदार प्रदर्शन किया. भीमराव देशमुख ने नाडकर्णी कप, रोवर्स कप, हारवुड लीग, बंगाल लीग, सतीरंजन शील्ड सहित अनेक प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया. वर्ष 1944 में उन्होंने विख्यात मोहन बगान के लिए भी खेला. उनकी खेल प्रतिभा और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर भारत के प्रथम कृषि मंत्री डॉ. पंजाबराव देशमुख ने उन्हें टाइगर मैन की उपाधि दी थी. कपड़ों के चिथड़ों से बनी गेंद के साथ खेतों में फुटबॉल खेलना शुरू करने वाले भीमराव देशमुख ने आगे चलकर भारतीय फुटबॉल में अपनी अलग पहचान बनाई. उनका संघर्ष, समर्पण और उपलब्धियां आज भी विदर्भ के युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं.





