शक्तिपीठों की बजाय ज्ञानपीठों को जोड़ने वाले मार्ग बनें
पूर्व नप सभापति दीपाली विधले ने उठाई मांग

* शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही
* विकास की वर्तमान अवधारणा पर उठाए सवाल
अचलपुर /दि.13- शक्तिपीठों को जोड़ने वाले मार्गों का निर्माण महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक प्रत्येक विद्यार्थी को विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय तक पहुंचाने वाले मार्ग तैयार करना है. इस आशय का प्रतिपादन करते हुए अचलपुर नगर परिषद की पूर्व शिक्षा सभापति दीपाली मनीष विधले ने कहा है कि देश के विकास का वास्तविक आधार शिक्षा है और सरकारों को धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी समान रूप से निवेश करना चाहिए.
यहां जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिए अपनी बात रखते हुए पूर्व नप सभापति दीपाली विधले ने विकास की वर्तमान अवधारणा पर प्रश्न उठाए. उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े सड़क प्रकल्प, धार्मिक पर्यटन और भव्य निर्माण कार्य विकास का एक हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन यदि गांवों में गुणवत्तापूर्ण स्कूल, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, तो विकास अधूरा माना जाएगा. उन्होंने कहा कि शिक्षा कोई खर्च नहीं, बल्कि भविष्य के लिए सबसे बड़ी पूंजीगत निवेश है. एक सड़क यात्रा को छोटा कर सकती है, लेकिन एक अच्छी शिक्षा पीढ़ियों का भविष्य बदल सकती है. इसलिए शिक्षा को नीति निर्माण और विकास योजनाओं के केंद्र में रखा जाना चाहिए.
पूर्व नप सभापति दीपाली विधले ने कहा कि श्रद्धा और धार्मिक आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए शिक्षा, अनुसंधान, कौशल विकास और ज्ञान सृजन को भी सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए. उन्होंने चिंता जताई कि आज भी अनेक विद्यार्थी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उच्च शिक्षण संस्थानों तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उन्होंने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी जोर दिया. उनका कहना था कि बढ़ते कंक्रीटीकरण, जलवायु परिवर्तन और गर्मी की तीव्र लहरों को देखते हुए विकास योजनाओं में पर्यावरणीय संरक्षण और जीवन गुणवत्ता को भी महत्व दिया जाना चाहिए.
पूर्व नप सभापति दीपाली विधले ने कहा कि प्रत्येक बंद होने वाला स्कूल किसी गांव के भविष्य को कमजोर करता है और प्रत्येक खाली पुस्तकालय किसी बच्चे के अधूरे सपनों का प्रतीक है. उन्होंने समाज और नीति निर्माताओं से यह आत्ममंथन करने का आह्वान किया कि क्या प्रत्येक गांव में अच्छी स्कूल व्यवस्था है, क्या हर विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध है और क्या हर युवा को विश्वविद्यालय तक पहुंचने का समान अवसर मिल रहा है. उन्होंने कहा कि मंदिर व्यक्ति को अध्यात्म प्रदान करते हैं, जबकि शिक्षा उसे आत्मसम्मान, रोजगार और समाज परिवर्तन की शक्ति देती है. राष्ट्र का वास्तविक वैभव भव्य इमारतों में नहीं, बल्कि कक्षाओं में बैठकर भविष्य के सपने देखने वाले विद्यार्थियों में निहित है.





