अमरावती मनपा के आऊट सोर्सिंग ठेके का रास्ता साफ

‘नैकॉफ’ कंपनी को ही मिलेगा 61 करोड रूपये का मनुष्यबल ठेका

* असॉर्ट कंपनी की आपत्ति याचिका को हाईकोर्ट ने किया खारिज
* अब नैकॉफ कंपनी के प्रस्ताव पर स्थायी समिती की सभा में लगेगी मुहर
* मनपा व नैकॉफ कंपनी के बीच जल्द होगा अंतिम करार, प्रक्रिया जल्द होगी शुरू
अमरावती/नागपुर/दि.14- अमरावती महानगरपालिका के बहुचर्चित और लगभग 61 करोड़ 17 लाख 56 हजार 901 रुपये मूल्य के मैनपावर आउटसोर्सिंग टेंडर को लेकर चल रहे कानूनी विवाद का अंत हो गया है. बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एसॉर्ट 1 कॉर्प सर्विसेज लिमिटेड द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए महानगरपालिका की निविदा प्रक्रिया को वैध और नियमसम्मत माना है. न्यायालय के इस फैसले से मनपा प्रशासन को बड़ी राहत मिली है तथा विभिन्न विभागों में करीब 650 पदों पर मानवबल उपलब्ध कराने की प्रक्रिया का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो गया है. जिसके चलते अब जल्द ही अमरावती मनपा के स्थायी समिती द्वारा नैकॉफ कंपनी की ओर से मिले प्रस्ताव पर अपनी अंतिम मुहर लगाते हुए ठेका आवंटित करने व करारनामा करने की प्रक्रिया पूर्ण की जाएगी. इस मामले को लेकर नागपुर हायकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अमरावती मनपा की ओर से एड. जेमिनी कासट व एसॉर्ट कंपनी की ओर से एड. जुगलकिशोर गिल्डा द्वारा युक्तिवाद किया गया.
बता दे कि, यह मामला मनपा द्वारा विभिन्न विभागों में कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रेणी के कर्मचारियों की आउटसोर्सिंग पद्धति से नियुक्ति के लिए जारी की गई निविदा से जुड़ा था. निविदा प्रक्रिया में भाग लेने वाली एसॉर्ट 1 कॉर्प सर्विसेज लिमिटेड ने अपनी वित्तीय बोली को अमान्य घोषित किए जाने और नेशनल फेडरेशन ऑफ फार्मर्स प्रोक्योरमेंट, प्रोसेसिंग एंड रिटेलिंग को-ऑपरेटिव्स ऑफ इंडिया लिमिटेड (नैकोफ) को एल-1 घोषित किए जाने के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. जिस पर आज न्या. उर्मिला जोशी फालके व न्या. निवेदिता मेहता की दो सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई हुई. इस समय दोनों पक्षों का युक्तिवाद सुनने के बाद खंडपीठ ने एसॉर्ट-1 कंपनी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया. इसके साथ ही अमरावती मनपा के 61 करोड रूपयों आऊटसोर्सिंग का ठेका नैकॉफ कंपनी को मिलने का रास्ता साफ हो गया.
ज्ञात रहे कि, अमरावती मनपा के अलग-अलग विभागों में लंबे समय से मानवबल की कमी बनी हुई है. इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए महानगरपालिका ने 30 जनवरी 2026 को लगभग 61.17 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाले मैनपावर सप्लाई ठेके के लिए ई-निविदा जारी की थी. निविदा प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि 12 फरवरी 2026 निर्धारित की गई थी. इससे पहले दिसंबर 2025 में भी निविदा जारी की गई थी, लेकिन पर्याप्त प्रतिस्पर्धा नहीं मिलने के कारण दूसरी बार निविदा आमंत्रित की गई. प्री-बिड बैठक में प्राप्त सुझावों और आपत्तियों के आधार पर कॉमन सेट ऑफ डिविएशन (सीएसडी) जारी कर सभी संभावित बोलीदाताओं को शर्तों के संबंध में स्पष्टता प्रदान की गई थी.
61 करोड रूपयों के मूल्य वाले आऊटसोर्सिंग ठेके की निविदा प्रक्रिया में कुल चार प्रमुख कंपनियां अंतिम चरण तक पहुंचीं. जिनमें नैकोफ (एनएसीओएफ), एसॉर्ट 1 कॉर्प सर्विसेज लिमिटेड, एच.एस. सर्विसेस व एजील सिक्युरिटी फोर्स प्रा. लि. का समावेश था. इन चारों कंपनियों को तकनीकी जांच के बाद पात्र माना गया था और उनकी वित्तीय बोलियां खोली गईं. मनपा के रिकॉर्ड के अनुसार वित्तीय बोलियों में नैकोफ ने 4 प्रतिशत, एसॉर्ट 1 कॉर्प सर्विसेज ने 1025 रुपये प्रति व्यक्ति (लगभग 2 करोड़ 39 लाख 85 हजार रुपये, अर्थात 3.85 प्रतिशत के बराबर), एच.एस. सर्विसेस ने लगभग 2 करोड़ 35 लाख 56 हजार 640 रुपये (करीब 3.85 प्रतिशत) तथा एजील सिक्युरिटी फोर्स ने 2 करोड़ 44 लाख 70 हजार 276 रुपये (करीब 4 प्रतिशत) का सेवा शुल्क उल्लेखित किया था. निविदा की शर्तों के अनुसार मैनपावर आउटसोर्सिंग सेवा शुल्क न्यूनतम 3.85 प्रतिशत और अधिकतम 7 प्रतिशत के बीच होना आवश्यक था. वित्तीय बोलियां खुलने के बाद मनपा को विभिन्न कंपनियों द्वारा उद्धृत दरों की प्रकृति को लेकर संदेह हुआ. इसके चलते 1 अप्रैल 2026 को सभी पात्र बोलीदाताओं से लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया कि उनकी दरें रुपये में हैं या प्रतिशत में तथा उनका आधार क्या है. सभी कंपनियों ने उसी दिन अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया. एसॉर्ट ग्रुप ने अपने उत्तर में बताया कि उसकी ओर से उद्धृत 1025 रुपये की राशि वास्तव में 3.85 प्रतिशत सेवा शुल्क के बराबर है. यहीं से विवाद की शुरुआत हुई. मनपा का मत था कि निविदा दस्तावेज में सेवा शुल्क स्पष्ट और निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत करना अनिवार्य था. एसॉर्ट द्वारा दी गई राशि विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग प्रतिशत में परिवर्तित हो रही थी, जिससे निविदा की एकरूपता प्रभावित होती थी.
मनपा ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि 1025 रुपये की राशि कुशल कर्मचारी के वेतन का 3.85 प्रतिशत बनती है, लेकिन अर्धकुशल और अकुशल श्रमिकों के लिए यह क्रमशः लगभग 4.02 प्रतिशत और 4.31 प्रतिशत हो जाती है. इस कारण बोली को शर्तों के अनुरूप नहीं माना जा सकता था. मामले की गंभीरता को देखते हुए वित्तीय बोलियों और प्राप्त स्पष्टीकरणों को टेंडर स्क्रूटनी समिति के समक्ष रखा गया. समिति ने कानूनी राय लेने का निर्णय लिया. मुख्य विधि सलाहकार द्वारा 8 मई 2026 को प्रस्तुत विस्तृत कानूनी राय का अध्ययन करने के बाद 18 मई 2026 को टेंडर समिति की बैठक आयोजित की गई. बैठक में सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद समिति ने सर्वसम्मति से नैकोफ को एल-1 घोषित करने का निर्णय लिया.
* टर्नओवर बना निर्णायक आधार
मनपा ने हाईकोर्ट में बताया कि निविदा की धारा 15 के अनुसार यदि एक से अधिक बोलीदाता न्यूनतम पात्र दर के करीब पाए जाते हैं तो पिछले तीन वर्षों के औसत वार्षिक कारोबार (टर्नओवर) को चयन का आधार बनाया जाएगा. मनपा के अनुसार नैकोफ का औसत वार्षिक टर्नओवर लगभग 14,130 करोड़ रुपये, एजील सिक्युरिटी फोर्स का औसत वार्षिक टर्नओवर लगभग 1,090.70 करोड़ रुपये है. इस आधार पर नैकोफ सबसे मजबूत दावेदार साबित हुई. महानगरपालिका ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि पुराने ठेकेदारों का अनुबंध वर्ष 2025 में समाप्त हो चुका था, लेकिन प्रशासनिक आवश्यकता के कारण उन्हें अस्थायी व्यवस्था के तहत सेवाएं जारी रखने दी गई थीं. साथ ही कुछ एजेंसियों के खिलाफ जीएसटी भुगतान, न्यूनतम वेतन अधिनियम के पालन और अन्य वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मुद्दे सामने आए थे, जिसके कारण नई एजेंसी की नियुक्ति अत्यंत आवश्यक हो गई थी. मनपा ने यह भी तर्क दिया कि याचिका समयबद्ध तरीके से दायर नहीं की गई तथा याचिकाकर्ता किसी प्रकार की दुर्भावना, पक्षपात, मनमानी या नियमों के उल्लंघन को साबित नहीं कर सका.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निविदा मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख किया. न्यायालय ने कहा कि टेंडर जारी करने वाली संस्था अपनी आवश्यकताओं और शर्तों की सर्वोत्तम व्याख्याकार होती है. जब तक निर्णय प्रक्रिया में दुर्भावना, पक्षपात, मनमानी, संवैधानिक या वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन अथवा स्पष्ट कानूनी त्रुटि सिद्ध न हो, तब तक न्यायालय को प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. खंडपीठ ने पाया कि अमरावती महानगरपालिका की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों और निविदा शर्तों के अनुरूप थी. याचिकाकर्ता एसॉर्ट ग्रुप अपने आरोपों को प्रमाणित नहीं कर सका. परिणामस्वरूप न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी.
हाईकोर्ट के निर्णय के बाद अब अमरावती महानगरपालिका को नई एजेंसी के माध्यम से विभिन्न विभागों में मानवबल उपलब्ध कराने का रास्ता साफ हो गया है. मनपा प्रशासन, स्वास्थ्य, स्वच्छता, अभियांत्रिकी तथा अन्य विभागों में लंबे समय से आवश्यक मानव संसाधन की प्रतीक्षा की जा रही थी. न्यायालय के फैसले के बाद अब नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी आने की संभावना है. मनपा प्रशासन से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस फैसले से न केवल मनपा के दैनिक कार्यों को गति मिलेगी, बल्कि लंबे समय से लंबित आउटसोर्सिंग व्यवस्था को भी स्थिरता प्राप्त होगी. साथ ही यह निर्णय सार्वजनिक निविदाओं में पारदर्शिता, निर्धारित शर्तों के पालन और प्रशासनिक विवेकाधिकार की न्यायिक मान्यता के रूप में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
* सुप्रिम कोर्ट भी जा सकती है एसॉर्ट कंपनी
विधिज्ञ विशेषज्ञों के मुताबिक, मनपा के आऊटसोर्सिंग ठेके को लेकर दायर याचिका का इस समय यद्यपी बॉम्बे हायकोर्ट की नागपूर खंडपीठ में निपटारा हो चुका है. परंतु इस फैसले के खिलाफ एसॉर्ट-1 कॉर्प सर्व्हिसेस कंपनी द्वारा सुप्रिम कोर्ट में गुहार लगाई जा सकती है. यदि ऐसा होता है तब इस आऊटसोर्सिंग ठेके का भविष्य क्या रहेगा, इस बात की ओर सभी की निगाहें लगी हुई है.

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