सहकार की सत्ता पर कब्जे की जंग शुरू

अब अमरावती में गरमाएंगे सहकार क्षेत्र के राजनीतिक समीकरण

* जिला बैंक चुनाव की दस्तक, दो माह बाद चुनाव होने की संभावना
अमरावती/दि.28-आगामी 4 अक्तूबर को अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक (एडीसीसी बैंक) के मौजूदा संचालक मंडल का कार्यकाल खत्म होने जा रहा है. जिससे पहले जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक में नियमानुसार चुनाव कराए जाने की पूरी संभावना है. परंतु इस समय जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में दो याचिकाएं सुनवाई हेतु प्रलंबित है. जिसमें से पहली याचिका बैंक के मौजुदा सत्ताधारी पक्ष द्वारा 1 हजार नए मतदाता सदस्य बनाए जाने को लेकर दायर की गई है. वहीं दूसरी याचिका बैंक के मौजुदा संचालक मंडल को लेकर दायर है. यदि नागपुर हायकोर्ट द्वारा आगामी सितंबर माह तक इन दोनों याचिकाओं का निपटारा कर दिया जाता है, तो उस स्थिती में बैंक के नए संचालक मंडल चुनने हेतु चुनाव करवाने में कहीं कोई दिक्कत नहीं रहेगी और अक्तूबर माह के पहले सप्ताह के दौरान बैंक के चुनाव करा लिए जाएंगे. जिसकी संभावना काफी प्रबल भी मानी जा रही है. यही वजह है कि सहकार निर्वाचन प्राधिकरण के निर्देशानुसार जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के मतदाता सदस्यों को पंजीकृत करने का काम शुरू हो चुका है. यह काम पूरा होने और अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशित होने के बाद जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनावी कार्यक्रम की घोषणा होगी, ऐसे में आगामी चुनावों की आहट के साथ जिले की राजनीति और सहकार क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है.
बता दें कि अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक की स्थापना 25 जनवरी 1962 को हुई थी. इसके दो दिन पहले 23 जनवरी 1962 को पंजीयन क्रमांक 24956 के साथ जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक पंजीकृत हुई थी और 25 जनवरी 1962 को यह बैंक प्रत्यक्ष अस्तित्व में आयी. ऐसे में कहा जा सकता है कि, अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक का इतिहास करीब 65 वर्ष का है और इन 65 वर्षों के दौरान जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक ने जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अपना अच्छा-खासा वर्चस्व भी बनाया है. स्थानीय कैम्प रोड पर इर्विन चौक के पास स्थित जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक का कार्यक्षेत्र अमरावती जिले के 14 तहसीलों में विस्तारित है और यह बैंक महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक महासंघ के साथ संलग्नित है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा मानी जाने वाली इस बैंक पर नियंत्रण को केवल वित्तीय संस्था का प्रबंधन नहीं, बल्कि जिले की राजनीतिक और संगठनात्मक ताकत का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि आगामी चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों, सहकारी संस्थाओं और प्रभावशाली नेताओं ने अभी से अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है.
बता दे कि, महाराष्ट्र की राजनीति में यदि शहरी भाग को छोड दिया जाए, तो ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य धारा की राजनीति के साथ-साथ सहकार क्षेत्र की राजनीति का भी अपना एक अलग व अच्छा-खासा महत्व दिखाई देता है. इसकी सबसे बडी वजह यह भी है कि, तहसीलों एवं गांवों में नागरी सहकारी पतसंस्था, दूध उत्पादक सहकारी संस्था, खरीदी-बिक्री संघ सेवा सहकारी संस्था, जैसी विभिन्न सहकारी संस्थाओं की संख्या अच्छी-खासी रहती है. जो जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक से संलग्नि रहती है. जिसके चलते सहकार क्षेत्र में सक्रिय रहनेवाले धुरंधरों का अंतिम लक्ष्य जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक पर अपना कब्जा जमाना होता है. क्योंकि जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक का टर्नओवर भी करोडों में रहता है.
यहां यह भी विशेष उल्लेखनिय है कि, विगत 60-70 वर्षों के दौरान जिले सहीत राज्य में सहकार क्षेत्र का अपना एक अलग अस्तित्व रहा है. परंतु पिछले 5-7 वर्षों से सहकार क्षेत्र पर मुख्य धारा की राजनीति हावी होती चली जा रही है. इसके चलते सहकार क्षेत्र की अपनी राजनीति तार-तार होने के साथ ही खत्म होती चली जा रही है. इसका मूल कारण राज्य के मौजुदा सत्ताधारी दल को कहा जा सकता है. विगत 60-70 वर्षों के दौरान सहकार क्षेत्र पर कांग्रेस का दबदबा रहा और इससे पहले जब राज्य में भाजपा-सेना युती की सरकार थी तब भी सहकार क्षेत्र की राजनीति पर सत्ता का कोई विशेष असर दिखाई नहीं दिया. परंतु अब जिस तरह से राज्य में उठा-पटकवाली राजनीति का दौर तेज हो गया है, उसका सीधा असर सहकारी संस्थाओं और उनके चुनावों पर भी पडता दिखाई दे रहा है. इससे जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक और बैंक के संचालक मंडल हेतु होनेवाले चुनाव भी अछूते नहीं है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जिला बैंक का चुनाव भले ही सहकारी संस्था का चुनाव हो, लेकिन इसके परिणामों का सीधा असर जिले की राजनीति, स्थानीय निकायों के समीकरण और भविष्य के विधानसभा तथा जिला परिषद चुनावों पर दिखाई देता है. यही कारण है कि बैंक के संचालक मंडल में जगह बनाने के लिए पर्दे के पीछे बैठकों, संपर्क अभियानों और पैनल गठन की कवायद तेज हो गई है.
* क्यों महत्वपूर्ण है जिला बैंक?
जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय केंद्र माना जाता है. जिले की प्राथमिक कृषि पतसंस्थाएं (पैक्स), सेवा सहकारी संस्थाएं, किसान समूह और अनेक ग्रामीण सहकारी संगठन बैंक से सीधे जुड़े रहते हैं. किसानों को फसल ऋण, कृषि निवेश, सिंचाई, पशुपालन और अन्य योजनाओं के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में बैंक की प्रमुख भूमिका होती है. यही वजह है कि बैंक के संचालक मंडल पर नियंत्रण का अर्थ हजारों किसानों, सैकड़ों सहकारी संस्थाओं और व्यापक ग्रामीण नेटवर्क पर प्रभाव स्थापित करना भी माना जाता है. सहकार क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं के लिए जिला बैंक हमेशा प्रतिष्ठा का केंद्र रहा है.
* सहकार या राजनीति?
महाराष्ट्र की सहकार व्यवस्था लंबे समय से राजनीति का मजबूत आधार मानी जाती रही है. चीनी मिलों, दूध संघों, कृषि मंडियों और जिला बैंकों के माध्यम से अनेक नेताओं ने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई है. अमरावती में भी जिला बैंक का चुनाव केवल सहकारी प्रतिनिधियों तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बैंक के चुनाव में जीत हासिल करने वाला गुट ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत होने का दावा करता है. यही कारण है कि विभिन्न दलों के स्थानीय नेता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुनावी समीकरणों पर नजर बनाए हुए हैं.
* कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर
आगामी चुनाव में जिले के कई प्रभावशाली सहकारी नेता और राजनीतिक गुट आमने-सामने आ सकते हैं. सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को अपने पक्ष में करने के लिए अभी से संपर्क अभियान शुरू होने की चर्चा है. कई पुराने संचालक दोबारा मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि नई पीढ़ी के सहकारी नेता भी अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं. विशेष रूप से उन नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है जिनका ग्रामीण क्षेत्रों, कृषि पतसंस्थाओं और सहकारी संस्थाओं पर प्रभाव माना जाता है. चुनावी कार्यक्रम घोषित होने के बाद यह मुकाबला और अधिक रोचक होने की संभावना है.
* बदलते नियम बदल सकते हैं समीकरण
सहकारी बैंकों के संचालन से जुड़े नियमों में हुए बदलाव भी इस चुनाव को दिलचस्प बना रहे हैं. संचालक बनने के लिए सदस्यता, पात्रता, प्रतिनिधित्व और कार्यकाल संबंधी नियमों के कारण कुछ पुराने चेहरों के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है. दूसरी ओर, नए प्रतिनिधियों को अवसर मिलने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है. बता दें कि हाल ही में सहकार विभाग द्बारा एक नियम जारी करते हुए सहकारी संस्थाओं में 10 वर्ष या उससे अधिक समय तक संचालक रह चुके सदस्यों को अगला चुनाव लडने हेतु अपात्र घोषित किया गया है. ताकि 10 वर्ष से अधिक समय से संचालक पद पर पदस्थ रहनेवाले सदस्यों को भी संचालक पद पर बने रहने हेतु अपात्र ठहराया गया. इस नये नियम के मद्देनजर राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि पात्रता नियमों का सख्ती से पालन हुआ तो कई पारंपरिक समीकरण बदल सकते हैं और कुछ नए चेहरे बैंक के नेतृत्व में दिखाई दे सकते हैं.
* बैंक के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
चुनावी सरगर्मियों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर नया संचालक मंडल बैंक की आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों से कैसे निपटेगा. बढ़ती थकबाकी, ऋण वसूली की समस्या, तकनीकी आधुनिकीकरण की आवश्यकता, ग्रामीण बैंकिंग सेवाओं का विस्तार और पारदर्शी प्रशासन जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जिला बैंक को केवल राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि किसानों और सहकारी संस्थाओं के विकास के लिए सक्षम वित्तीय संस्था के रूप में मजबूत बनाने की आवश्यकता है. इसलिए मतदाताओं और सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों की नजर इस बात पर भी रहेगी कि चुनावी मैदान में उतरने वाले उम्मीदवार बैंक के भविष्य को लेकर क्या दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं.
* आने वाले महीनों में बढ़ेगी सरगर्मी
हालांकि चुनाव कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा अभी शेष है, लेकिन सहकार जगत में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है. पैनल गठन, संभावित उम्मीदवारों की सक्रियता, संस्थाओं के प्रतिनिधियों से संपर्क और राजनीतिक समर्थन जुटाने की कवायद आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है. स्पष्ट है कि अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक का आगामी चुनाव केवल संचालक मंडल के गठन का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह जिले में सहकार की सत्ता, ग्रामीण प्रभाव और राजनीतिक वर्चस्व की बड़ी लड़ाई के रूप में देखा जाएगा. अब सभी की निगाहें चुनाव कार्यक्रम की घोषणा और उससे बनने वाले नए राजनीतिक समीकरणों पर टिकी हैं.
* जिला बैंक का इतिहास अगले अंक में
अमरावती जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक की स्थापना के बाद से लेकर अब तक बैंक में किसकी सत्ता रही, बैंक के अध्यक्ष पद पर कब-कब कौन-कौन विराजमान रहे. बैंक की चुनावी प्रक्रिया व सदस्यता पंजीयन में कब कौन से बदलाव हुए तथा सहकार क्षेत्र में धीरे-धीरे राजनीति कैसे हावी होती चली गई और जिला बैंक के चुनाव राजनीतिक रूप से प्रतिष्ठापूर्ण क्यों व कैसे बन गये. इन तमाम बातों को लेकर विस्तृत विश्लेषण अगले अंक में.

Back to top button