राज्य की 22 जिला परिषदों का चुनाव हो सकता है दिसंबर में
सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की सकारात्मक भूमिका, चुनावों का रास्ता साफ होने के संकेत

* 50% आरक्षण सीमा से बदलेंगे राजनीतिक समीकरण, विदर्भ से लेकर ठाणे-पालघर तक बढ़ी हलचल
मुंबई/अमरावती/दि.31- महाराष्ट्र में पिछले कई वर्षों से लंबित 22 जिला परिषदों के चुनाव अब आखिरकार होने की दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं. राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में स्पष्ट किया है कि वह 50 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक सीमा का पालन करते हुए चुनाव कराने के लिए तैयार है. इसके बाद दिसंबर 2026 में जिला परिषद चुनाव होने की संभावना प्रबल हो गई है. इसके साथ ही 105 नगर पंचायतों और लगभग 12 हजार ग्राम पंचायतों के चुनाव भी इसी अवधि में कराए जाने की चर्चा है, जिससे राज्य में व्यापक चुनावी माहौल बनने के संकेत मिल रहे हैं. स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के चुनाव आरक्षण संबंधी कानूनी विवादों के कारण लंबे समय से अटके हुए थे. अब राज्य सरकार के रुख के बाद राजनीतिक दलों ने जमीनी स्तर पर तैयारियां तेज कर दी हैं और संभावित उम्मीदवारों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा दी है.
* 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा बनेगी सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
जिला परिषद चुनावों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी 50 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक सीमा है. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में कुल आरक्षण इस सीमा से अधिक नहीं हो सकता. इसी कारण कई जिलों में चुनाव प्रक्रिया रुकी हुई थी. नई व्यवस्था लागू होने पर पहले से आरक्षित कई सीटें सामान्य वर्ग में परिवर्तित हो सकती हैं. इससे न केवल उम्मीदवारों के समीकरण बदलेंगे, बल्कि राजनीतिक दलों की सामाजिक और जातीय रणनीतियों पर भी व्यापक असर पड़ेगा. विशेष रूप से ओबीसी आरक्षण के स्वरूप में संभावित बदलाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है.
* अमरावती जिला परिषद में दिख सकता है सबसे बड़ा असर
आरक्षण सीमा का सबसे बड़ा प्रभाव अमरावती जिला परिषद में देखने को मिल सकता है. वर्तमान व्यवस्था के अनुसार नागपुर जिला परिषद की 59 सीटों में से 33 सीटें विभिन्न आरक्षित वर्गों के लिए निर्धारित हैं. इनमें 15 सीटें ओबीसी, 10 अनुसूचित जाति तथा 8 अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं. यदि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा लागू होती है तो 59 में से अधिकतम 27 सीटें ही आरक्षित रखी जा सकेंगी. ऐसे में आरक्षित सीटों की संख्या 33 से घटकर 27 हो जाएगी. राजनीतिक जानकारों के अनुसार सबसे अधिक प्रभाव ओबीसी आरक्षण पर पड़ सकता है और ओबीसी वर्ग की पांच सीटें कम होकर लगभग 10 सीटें ही आरक्षित रह सकती हैं.
* विदर्भ में सबसे ज्यादा राजनीतिक सरगर्मी
इस बार होने वाले चुनावों में विदर्भ क्षेत्र विशेष रूप से राजनीतिक केंद्र बनने जा रहा है. अमरावती, अकोला, वाशिम, बुलढाणा, यवतमाल, नागपुर, वर्धा, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर और गड़चिरोली सहित 11 जिलों में जिला परिषद चुनाव होने की संभावना है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विदर्भ में कांग्रेस के लिए अपनी संगठनात्मक ताकत साबित करने का यह बड़ा अवसर होगा. वहीं भाजपा और महायुति गठबंधन अपने प्रभाव को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंकेंगे. जनवरी में हुई जिला परिषद चुनावों में महायुति को मिली सफलता के बाद अब विपक्ष भी मजबूती से मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है.
* ठाणे-पालघर में सहयोगी दलों के बीच भी मुकाबले के आसार
ठाणे और पालघर जिला परिषद चुनावों पर भी पूरे राज्य की नजर रहेगी. यहां मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना और भाजपा, दोनों महायुति के सहयोगी दल होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर आमने-सामने आ सकते हैं. स्थानीय नेतृत्व, संगठनात्मक प्रभाव और क्षेत्रीय समीकरणों के कारण कई सीटों पर रोचक मुकाबले की संभावना व्यक्त की जा रही है.
* इन 22 जिला परिषदों में प्रस्तावित हैं चुनाव
– विदर्भ
अमरावती, अकोला, वाशिम, बुलढाणा, यवतमाल, नागपुर, वर्धा, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर, गड़चिरोली.
– कोकण एवं उत्तर महाराष्ट्र
पालघर, ठाणे, नाशिक, धुले, नंदुरबार, जलगांव
– मराठवाड़ा
अहिल्यानगर, बीड, जालना, नांदेड़, हिंगोली
* नगर पंचायत और ग्राम पंचायत चुनाव भी साथ होने की संभावना
सूत्रों के अनुसार जिला परिषद चुनावों के साथ राज्य की 105 नगर पंचायतों और लगभग 12 हजार ग्राम पंचायतों के चुनाव भी कराए जा सकते हैं. यदि ऐसा हुआ तो महाराष्ट्र में ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में एक साथ बड़ा चुनावी अभियान देखने को मिलेगा. इससे राजनीतिक दलों के लिए संगठनात्मक चुनौती भी बढ़ जाएगी.
* सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी निगाहें
हालांकि चुनावी तैयारियां तेज हो चुकी हैं, लेकिन अंतिम फैसला सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और राज्य निर्वाचन आयोग की अधिसूचना पर निर्भर करेगा. राज्य सरकार द्वारा चुनाव कराने की इच्छा जताने के बाद अब सभी राजनीतिक दलों, संभावित उम्मीदवारों और लाखों मतदाताओं की निगाहें न्यायालय की आगामी सुनवाई पर टिक गई हैं. यदि कानूनी बाधाएं पूरी तरह दूर हो जाती हैं, तो दिसंबर 2026 में महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति में लंबे समय बाद सबसे बड़ा चुनावी महासंग्राम देखने को मिल सकता है. आरक्षण के बदले समीकरण, नए उम्मीदवारों की एंट्री और सत्ता-विपक्ष की सीधी टक्कर इन चुनावों को अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक बना सकती है.





