सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिला कोई स्टे, फिर किसके इशारे पर फैलाई जा रही हैं भ्रामक खबरें?

अमरावती मनपा के 61.17 करोड़ के मैनपावर ठेके पर रोक का दावा निकला बेबुनियाद

* 17 अगस्त को होगी सुनवाई, ठेकेदार लॉबी की भूमिका पर उठे सवाल
अमरावती/दि.4- अमरावती महानगरपालिका के बहुचर्चित लगभग 61.17 करोड़ रुपये मूल्य के मैनपावर आउटसोर्सिंग ठेके को लेकर इन दिनों कुछ समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भ्रामक जानकारी प्रसारित की जा रही है. इन खबरों में दावा किया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस ठेका प्रक्रिया पर रोक लगा दी है अथवा अगली सुनवाई तक यथास्थिति (स्टेटस-को) बनाए रखने का आदेश दिया है. जबकि उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड और मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है. ऐसे में अमरावती महानगरपालिका के बहुचर्चित 61 करोड़ 17 लाख रुपये के मैनपावर आउटसोर्सिंग ठेके को लेकर एक बार फिर शहर का राजनीतिक, प्रशासनिक और ठेकेदारी तंत्र चर्चा के केंद्र में आ गया है.
हकिकत यह है कि, मामले से जुड़े न्यायालयीन दस्तावेजों, कानूनी जानकारों और प्रशासनिक सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने अब तक ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है. अदालत ने केवल याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई 17 अगस्त को निर्धारित की है. इसके अलावा न तो किसी प्रकार का स्टे ऑर्डर पारित हुआ है और न ही स्टेटस-को बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं. इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने कोई रोक नहीं लगाई, तब शहर में यह खबरें किसके द्वारा और किस उद्देश्य से फैलाई जा रही हैं?
बता दे कि, अमरावती महानगरपालिका द्वारा मनुष्यबल ठेका नॅकॉफ (नैशनल फेडरेशन ऑफ फार्मर्स प्रोक्यूरमेंट को-ऑप. सोसायटी लि.) को दिए जाने का निर्णय लिया गया था. जिसके खिलाफ निविदा प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धी के तौर पर शामिल एसॉर्ट कंपनी ने पहले हायकोर्ट में याचिका दायर की थी. जहां से फैसला मनपा के पक्ष में आने के बाद एसॉर्ट कंपनी ने अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई हेतु स्वीकार करते हुए न्या. पमीधीघंटम श्री नरसिम्हा की एकल पीठ को सुनवाई के लिए सौंप दिया गया है. जहां पर सुनवाई हेतु अगली तारीख 17 अगस्त तय की गई है. सुप्रीम कोर्ट में नॅकॉफ कंपनी व अमरावती मनपा की ओर से एड. कुणाल चिमा तथा एसॉर्ट वन कंपनी की ओर से एड. इशान जॉर्ज व एड. सिंग पैरवी कर रहे है.
* ठेका रुकवाने की कोशिश या भ्रम फैलाने की रणनीति?
सूत्रों का दावा है कि निविदा प्रक्रिया में पीछे रह गए कुछ हितधारक समूह और ठेकेदार लॉबी शुरू से ही इस ठेके को विवादों में बनाए रखने का प्रयास कर रही है. पहले न्यायालयीन चुनौती और अब कथित रूप से भ्रामक खबरों के जरिए माहौल बनाने की कोशिश को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है. प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यदि यह धारणा बना दी जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने ठेके पर रोक लगा दी है, तो इससे निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और संबंधित पक्षों पर अनावश्यक दबाव बनाया जा सकता है. यही कारण है कि हाल के दिनों में कुछ माध्यमों में प्रकाशित खबरों को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
* क्या है पूरा मामला?
अमरावती महानगरपालिका में विभिन्न विभागों में लंबे समय से कर्मचारियों की कमी बनी हुई है. सफाई, स्वास्थ्य, प्रशासनिक और तकनीकी सेवाओं के सुचारु संचालन के लिए लगभग 650 मानवबल उपलब्ध कराने हेतु मनपा ने करीब 61.17 करोड़ रुपये का मैनपावर आउटसोर्सिंग टेंडर जारी किया था. इस निविदा प्रक्रिया में चार प्रमुख एजेंसियों ने भाग लिया था. तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन के बाद नॅकॉफ (नेशनल फेडरेशन ऑफ फार्मर्स प्रोक्योरमेंट को-ऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड) को एल-1 घोषित किया गया. इसके बाद एसॉर्ट-1 कॉर्प सर्विसेज लिमिटेड ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.
* हाईकोर्ट ने भी नहीं पाया कोई ठोस आधार
सबसे पहले यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ पहुंचा था. सुनवाई के दौरान महानगरपालिका ने पूरी निविदा प्रक्रिया, तकनीकी मूल्यांकन, वित्तीय परीक्षण, टेंडर समिति की अनुशंसाओं तथा प्राप्त कानूनी राय का विस्तृत ब्यौरा न्यायालय के समक्ष रखा. रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता निविदा प्रक्रिया में पक्षपात, दुर्भावना, मनमानी या नियमों के उल्लंघन का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया है. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि टेंडर प्रक्रिया से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित दायरे में ही किया जाता है. इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई थी.
* सुप्रीम कोर्ट में केवल सुनवाई, कोई अंतरिम राहत नहीं
हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद एसॉर्ट-1 कॉर्प सर्विसेज लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की. सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी स्टे, अंतरिम राहत या स्टेटस-को आदेश का स्पष्ट उल्लेख न्यायालय के आदेश में होता है. लेकिन इस मामले में अब तक ऐसा कोई निर्देश सामने नहीं आया है. इसलिए यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया रोक दी है, कानूनी रूप से सही नहीं माना जा सकता. लेकिन इसके बावजूद कुछ स्थानीय अखबारों एवं न्यूज चैनलों में इस आशय की खबरें प्रकाशित व प्रसारित हो रही है कि, सुप्रीम कोर्ट ने मनपा के मनुष्यबल ठेके पर रोक लगा दी है या स्थिती को जस का तस रखने हेतु कहा है, जबकि हकिकत में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया. जिसके चलते सवाल उपस्थित होता है कि, आखिर इस तरह की भ्रामक खबरें फैलाने के पीछे किसका दिमाग काम कर रहा है.
* स्थायी समिति में भी हुआ था जबरदस्त घमासान
उल्लेखनिय है कि, यह ठेका शुरू से ही राजनीतिक विवादों का केंद्र रहा है. मनपा की स्थायी समिति में प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कई सदस्यों ने सवाल उठाए थे, जबकि सत्ता पक्ष के सदस्यों ने इसे शहर हित का निर्णय बताते हुए समर्थन किया था. जहां एक ओर युवा स्वाभिमान पार्टी के पार्षद प्रा. प्रशांत वानखडे, दीपक साहू व प्रियंका पाटणे ने इस विषय का तीव्र व जबरदस्त विरोध किया था. वहीं दूसरी ओर भाजपा व राकांपा के सदस्यों ने नैकॉफ के पक्ष में अपना समर्थन देते हुए इस प्रस्ताव को मंजुरी दी थी. लेकिन खास बात यह भी रही कि, स्थायी समिती में हुए इस ‘मेलो ड्रामा’ से पहले ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका था. ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि, देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा इस संदर्भ में अमरावती महानगरपालिका को क्या निर्देश दिए जाते है.
* 17 अगस्त पर टिकी हैं निगाहें
फिलहाल यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 17 अगस्त को प्रस्तावित है. ऐसे में मनपा प्रशासन, राजनीतिक दलों, ठेकेदार समूहों तथा इस ठेके से जुड़े सैकड़ों संभावित कर्मचारियों की नजरें अब सर्वोच्च न्यायालय की आगामी कार्यवाही पर टिकी हुई हैं. लेकिन वर्तमान स्थिति में एक तथ्य निर्विवाद रूप से सामने है, सुप्रीम कोर्ट ने अब तक अमरावती महानगरपालिका के 61.17 करोड़ रुपये के मैनपावर आउटसोर्सिंग ठेके पर कोई रोक नहीं लगाई है और न ही स्टेटस-को बनाए रखने का कोई आदेश दिया है. ऐसे में सवाल केवल न्यायालयीन प्रक्रिया का नहीं, बल्कि उन भ्रामक खबरों का भी है जो बिना किसी आधिकारिक आधार के लगातार प्रसारित की जा रही हैं. अब 17 अगस्त की सुनवाई न केवल इस ठेका विवाद की दिशा तय करेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि अब तक फैलाई जा रही आशंकाओं और दावों में कितना दम था.

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