डॉ. नीरज राघानी व झेनिथ अस्पताल को जानबूझकर बदनाम करने का हो रहा प्रयास
डेढ माह पुराने मामले को अब सोशल मीडिया के जरिए दी जा रही हवा

* 25 से 30 मिनट के संभाषण में से मात्र एक मिनट की ऑडियो क्लिप को किया गया वायरल
* आधी-अधुरी बातचित को सुनकर लोग लगा रहे अर्थ का अनर्थ, संभ्रम भी फैल रहा
* सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे आरोपों से जमीनी हकिकत बिल्कुल अलग
* इलाज, खर्च और अतिरिक्त स्टेंट को लेकर शुरू हुआ था विवाद
अमरावती/दि.8 – शहर के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. नीरज राघानी तथा उनके द्वारा संचालित झेनिथ अस्पताल को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं और वायरल ऑडियो क्लिप ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. हालांकि पूरे घटनाक्रम की पड़ताल करने पर सामने आ रही जानकारी सोशल मीडिया पर प्रचारित किए जा रहे आरोपों से काफी अलग दिखाई दे रही है. चर्चा इस बात की भी है कि करीब डेढ़ माह पुराने एक मामले को अब अचानक सोशल मीडिया के माध्यम से उछालकर चिकित्सक और अस्पताल की छवि धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है. जानकारी के अनुसार वायरल की जा रही ऑडियो क्लिप वास्तव में लगभग 25 से 30 मिनट तक चली बातचीत का मात्र एक छोटा सा हिस्सा है. आरोप है कि पूरी बातचीत को रिकॉर्ड करने के बाद उसमें से केवल वह अंश सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया, जिसमें डॉक्टर और मरीज पक्ष के बीच तीखी चर्चा सुनाई देती है. ऐसे में आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर लोग अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं, जिससे भ्रम और विवाद की स्थिति पैदा हो रही है.
* 15 जून की आधी रात गंभीर हार्ट अटैक की हालत में अस्पताल पहुंची थीं महिला
प्राप्त जानकारी के अनुसार 15 और 16 जून की दरम्यानी रात लगभग 12 बजे एक 62 वर्षीय महिला को गंभीर हृदयाघात (मेजर हार्ट अटैक) की स्थिति में उपचार के लिए झेनिथ अस्पताल लाया गया था. बताया जाता है कि उस समय महिला की हालत अत्यंत गंभीर थी और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था. परिजनों ने डॉक्टरों से किसी भी तरह महिला की जान बचाने की गुहार लगाई थी. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए डॉ. नीरज राघानी और उनकी टीम ने तत्काल उपचार शुरू किया तथा रात 12.37 बजे एंजियोग्राफी की गई. जांच में महिला के हृदय में दो अत्यंत गंभीर ब्लॉकेज पाए गए. इसके बाद डॉक्टरों ने परिजनों को तत्काल एंजियोप्लास्टी कराने की सलाह दी. चूंकि रात काफी हो चुकी थी और प्राथमिक उपचार के बाद मरीज की स्थिति स्थिर हो गई थी, इसलिए परिजनों को अगले दिन सुबह तक निर्णय लेने का समय दिया गया. इसी दौरान उपचार पर आने वाले संभावित खर्च के बारे में भी जानकारी दी गई और यह भी बताया गया कि शहर के अन्य अस्पतालों अथवा धर्मार्थ संस्थानों में भी उपचार के विकल्प उपलब्ध हैं.
* पूरा दिन विचार के बाद परिजनों ने दी सहमति
बताया जाता है कि अगले दिन सुबह महिला मरीज के बेटे ने डॉक्टर से चर्चा कर रिपोर्ट प्राप्त की. पूरे दिन विचार-विमर्श के बाद शाम लगभग 5.30 बजे परिजनों ने आगे का उपचार झेनिथ अस्पताल में ही कराने का निर्णय लिया. परिवार की सहमति मिलने के बाद 16 जून की रात करीब 8 बजे एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया शुरू की गई. ऑपरेशन से पहले परिजनों को स्पष्ट रूप से बताया गया था कि मरीज के हृदय में एक स्टेंट और एक बैलून डालने की आवश्यकता पड़ेगी, जिस पर लगभग 1.80 लाख से 2.20 लाख रुपये तक खर्च आ सकता है. साथ ही परिजनों को यह भी बताया गया कि यदि इंट्रावैस्कुलर अल्ट्रासाउंड (आईवीयूएस) तकनीक का उपयोग किया जाता है, तो लगभग 40 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च आएगा. डॉक्टरों ने कम कीमत वाले स्टेंट के विकल्प की भी जानकारी दी थी. बताया जाता है कि परिजनों ने उस समय मरीज को सर्वोत्तम संभव उपचार देने की बात कही थी. बाद में आपसी चर्चा के बाद अस्पताल प्रशासन ने कुल उपचार खर्च को रियायत के साथ लगभग 2.15 लाख रुपये तक सीमित रखने की बात कही थी.
* ऑपरेशन के दौरान सामने आई नई चिकित्सकीय आवश्यकता
सूत्रों के अनुसार एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया के दौरान डॉ. नीरज राघानी को यह महसूस हुआ कि मरीज की जान को सुरक्षित रखने और बेहतर परिणाम के लिए एक अतिरिक्त स्टेंट डालना चिकित्सकीय दृष्टि से आवश्यक है. उस समय ऑपरेशन निर्णायक चरण में था और डॉक्टरों के सामने मरीज की स्थिति को प्राथमिकता देने की चुनौती थी. ऐसे में तत्काल बाहर आकर परिजनों से चर्चा करने या अनुमति लेने के लिए पर्याप्त समय नहीं था. परिस्थितियों को देखते हुए डॉक्टर ने अपने चिकित्सकीय विवेक का उपयोग करते हुए अतिरिक्त स्टेंट लगाया और प्रक्रिया पूरी की. शल्यक्रिया सफल होने के बाद डॉक्टर ने परिजनों को अतिरिक्त स्टेंट लगाए जाने की जानकारी दी तथा पूरी एंजियोप्लास्टी का वीडियो दिखाते हुए उस समय की चिकित्सकीय परिस्थितियों का विस्तार से विवरण भी दिया. बताया जाता है कि उस समय मरीज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार होने के कारण परिवारजन संतुष्ट और प्रसन्न थे तथा किसी प्रकार की आपत्ति सामने नहीं आई थी.
* बिल आने के बाद शुरू हुआ विवाद
मामला तब विवाद का रूप लेने लगा, जब 18 जून को अस्पताल की ओर से लगभग 3.30 लाख रुपये का बिल प्रस्तुत किया गया. इसमें अतिरिक्त लगाए गए स्टेंट की लागत भी शामिल थी. परिजनों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें पहले लगभग 2.15 लाख रुपये खर्च की जानकारी दी गई थी, जबकि अब उनसे करीब एक लाख रुपये अतिरिक्त मांगे जा रहे हैं. इसी विषय को लेकर मरीज के बेटे, अन्य परिजनों और डॉ. नीरज राघानी के बीच लंबी चर्चा हुई. बताया जाता है कि यह बातचीत करीब आधे से पौन घंटे तक चली, जिसमें उपचार, खर्च, अतिरिक्त स्टेंट की आवश्यकता और बिल से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई.
* पूरी बातचीत रिकॉर्ड, लेकिन वायरल हुआ केवल एक हिस्सा
जानकारी के अनुसार इस चर्चा के दौरान मरीज के बेटे ने डॉक्टर की जानकारी या अनुमति के बिना पूरी बातचीत अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर ली. बाद में इसी रिकॉर्डिंग में से केवल लगभग एक मिनट का अंश सोशल मीडिया पर वायरल किया गया. बताया जाता है कि वायरल ऑडियो उस समय का हिस्सा है, जब लंबी बहस के बाद डॉ. राघानी ने नाराजगी व्यक्त करते हुए परिजनों को फटकार लगाई थी. सोशल मीडिया पर जिन शब्दों को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, उनके संदर्भ को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं. डॉक्टर के समर्थकों का कहना है कि बातचीत के दौरान उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं था, बल्कि ऑपरेशन के दौरान सामने आने वाली जटिल परिस्थितियों और चिकित्सकीय निर्णयों की वास्तविकता समझाना था. वहीं आलोचकों का आरोप है कि संवाद की भाषा संयमित होनी चाहिए थी. फिलहाल यही हिस्सा सोशल मीडिया पर सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है.
* चार पीढ़ियों से चिकित्सा सेवा से जुड़ा है राघानी परिवार
डॉ. नीरज राघानी का परिवार अमरावती में चिकित्सा सेवा की एक लंबी परंपरा से जुड़ा रहा है. परिवार की चार पीढ़ियां स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सक्रिय रही हैं. उनके परदादा और दादा अपने समय के प्रतिष्ठित चिकित्सकों में गिने जाते थे, जबकि उनके पिता डॉ. प्रकाश राघानी आज भी चिकित्सा सेवा में सक्रिय हैं. चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में डॉ. नीरज राघानी पिछले लगभग 12 से 13 वर्षों से हृदय रोग विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे अब तक 10 हजार से अधिक एंजियोप्लास्टी प्रक्रियाएं कर चुके हैं और लगभग 2,500 बच्चों को निःशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान कर चुके हैं.
* सिर्फ व्यवसाय नहीं, सामाजिक सेवा से भी जुड़ा है नाम
झेनिथ अस्पताल और डॉ. राघानी केवल व्यावसायिक चिकित्सा सेवाओं तक सीमित नहीं रहे हैं. जानकारी के अनुसार अस्पताल में नियमित रूप से आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को सहायता उपलब्ध कराई जाती है. प्रत्येक गुरुवार को बड़ी संख्या में बच्चों की हृदय जांच एवं इको परीक्षण किए जाते हैं. लगभग 2,500 बच्चों को निःशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान किए जाने का दावा किया जाता है. विधवा महिलाओं, सैन्यकर्मियों और सुरक्षा बलों से जुड़े मरीजों को विशेष रियायतें भी दी जाती हैं. अस्पताल में मुख्यमंत्री सहायता निधि कक्ष की सुविधा उपलब्ध है ताकि जरूरतमंद मरीजों को आर्थिक सहायता मिल सके. कई अवसरों पर डॉ. राघानी ने अन्य अस्पतालों में भर्ती गरीब मरीजों का उपचार करने हेतु स्वयं जाकर अत्यल्प या निःशुल्क सेवाएं प्रदान की हैं.
* एफडीए कार्रवाई को लेकर भी उठे सवाल
इस पूरे विवाद के बीच झेनिथ अस्पताल के इन-हाउस मेडिकल स्टोर को लेकर भी शिकायतें सामने आईं. शिकायत के आधार पर हाल ही में खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने मेडिकल स्टोर को सील करने की कार्रवाई की थी. हालांकि अस्पताल से जुड़े सूत्रों का दावा है कि इस कार्रवाई से पहले नियमानुसार नोटिस जारी कर त्रुटियों को सुधारने का अवसर दिया जाना चाहिए था. चर्चा यह भी है कि एफडीए आयुक्त के प्रस्तावित अमरावती दौरे से पूर्व जल्दबाजी में कार्रवाई की गई. हालांकि इस संबंध में प्रशासन की ओर से आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है.
* सोशल मीडिया ट्रायल बनाम जमीनी हकीकत
पूरा घटनाक्रम कई सवाल खड़े कर रहा है. सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस मरीज की एंजियोप्लास्टी 16 जून को हुई और जिसे 19 जून को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई, उसी मामले को अब लगभग डेढ़ माह बाद सोशल मीडिया पर प्रमुखता से क्यों उठाया जा रहा है? शहर में दबी जुबान से यह चर्चा भी हो रही है कि कहीं इसके पीछे व्यक्तिगत नाराजगी, आर्थिक विवाद अथवा किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धात्मक मानसिकता तो काम नहीं कर रही. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सोशल मीडिया पर वायरल एक छोटी ऑडियो क्लिप ने पूरे मामले को सनसनीखेज बना दिया है, जबकि घटना के अनेक पहलू अभी भी सार्वजनिक विमर्श से बाहर हैं. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरे घटनाक्रम, चिकित्सा परिस्थितियों, मरीज पक्ष की आपत्तियों और अस्पताल के स्पष्टीकरण-सभी पक्षों को समान रूप से समझना आवश्यक है.