‘उस’ हादसे से डफरीन में भर्ती महिलाएं अब भी नहीं उबर पायी
आग लगने के बाद जान बचाने के लिए सीढियों से भागना पडा था

* कोई सीजेरियनवाले शरीर व भारी दर्द के साथ दौडी थी
* नवजातों को सीने से लगाकर भागने की आयी थी नौबत
* अब भी महिला मरिजों व उनके परिजनों में अनजाना भय
अमरावती /दि.26- स्थानीय जिला महिला अस्पताल (डफरीन) के नवजात शिशु अतिदक्षता विभाग (एनआईसीयू) में सोमवार तड़के लगी भीषण आग ने जहां तीन नवजातों की जान ले ली, वहीं अस्पताल में भर्ती दर्जनों प्रसूत माताओं और उनके परिवारों के मन में ऐसा भय पैदा कर दिया है, जिससे वे अब तक उबर नहीं पाए हैं. आग की घटना के दौरान अस्पताल में मची अफरा-तफरी, चीख-पुकार और जान बचाने के लिए भागती माताओं के दृश्य प्रत्यक्षदर्शियों के जेहन में अब भी ताजा हैं.
घटना के कई घंटे बाद भी अस्पताल परिसर में मौजूद महिलाओं और उनके परिजनों के चेहरों पर उस भयावह रात की दहशत साफ दिखाई दे रही थी. जिन माताओं ने कुछ दिन पहले ही बच्चों को जन्म दिया था, वे प्रसव पीड़ा और शारीरिक कमजोरी की परवाह किए बिना अपने नवजातों को सीने से चिपकाकर अस्पताल से बाहर निकलने को मजबूर हो गईं.
* चार दिन की नातिन को गोद में लिया और जान बचाने के लिए भागे
दर्यापुर तहसील के बाभली गांव की रहने वाली शालू इंगले उस भयावह घटना की प्रत्यक्षदर्शी हैं. उनकी पुत्रवधू आम्रपाली इंगले ने चार दिन पहले एक बच्ची को जन्म दिया था. सोमवार शाम अस्पताल परिसर में बैठी शालू इंगले घटना को याद करते हुए भावुक हो गईं. उन्होंने बताया कि उनकी बहू की सिजेरियन डिलीवरी हुई थी और बच्ची की तबीयत ठीक नहीं होने के कारण उसे जन्म के बाद कुछ समय के लिए एनआईसीयू में रखा गया था. बाद में उसकी स्थिति सुधरने पर उसे वार्ड में लाया गया. शालू इंगले ने बताया, तडके करीब साढ़े तीन बजे अचानक अस्पताल में हड़कंप मच गया. किसी ने बताया कि एनआईसीयू में आग लग गई है. उस समय कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मैंने अपनी चार दिन की नातिन को गोद में उठाया, बहू का सामान सिर पर रखा और तुरंत बाहर निकलने के लिए दौड़ पड़ी. मेरा बेटा बहू का हाथ पकड़कर उसे सीढ़ियों से नीचे लेकर आया. उस समय केवल जान बचाने का विचार था. उन्होंने कहा कि अस्पताल में मौजूद हर महिला और परिवार भयभीत था. कोई अपने बच्चे को लेकर भाग रहा था तो कोई प्रसूता महिला को सहारा देकर नीचे उतार रहा था.
* एक प्रसूता की चीख से मचा हड़कंप
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना की शुरुआत तब हुई जब एक प्रसूता महिला अपने नवजात को दूध पिलाने के लिए एनआईसीयू की ओर गई. वहां उसे धुआं और आग दिखाई दी. उसने जोर-जोर से चिल्लाकर लोगों को सतर्क किया. महिला की आवाज सुनते ही अस्पताल की नर्सें और कर्मचारी मौके की ओर दौड़े. देखते ही देखते पूरे अस्पताल में आग लगने की खबर फैल गई. एनआईसीयू की ओर भागते स्वास्थ्यकर्मियों को देखकर प्रसूति वार्ड में भर्ती महिलाओं और उनके परिजनों में घबराहट फैल गई. कई महिलाओं की हाल ही में सामान्य प्रसूति हुई थी, जबकि कई सिजेरियन ऑपरेशन के बाद उपचाराधीन थीं. इसके बावजूद वे अपनी जान और बच्चों की सुरक्षा के लिए तुरंत अस्पताल से बाहर निकलने लगीं.
* प्रसव की पीड़ा भूलीं माताएं, बच्चों को लेकर सीढ़ियों से उतरीं
हादसे के दौरान सबसे मार्मिक दृश्य तब देखने को मिला जब ऑपरेशन के बाद चलने-फिरने में असमर्थ कई महिलाएं भी अपने नवजातों को गोद में लेकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगीं. परिजनों ने बताया कि उस समय किसी को अपने दर्द, कमजोरी या स्वास्थ्य की चिंता नहीं थी. हर किसी की प्राथमिकता केवल बच्चे और परिवार को सुरक्षित बाहर निकालना थी. अस्पताल के विभिन्न वार्डों में भर्ती महिलाएं अपने बच्चों को सीने से लगाकर बाहर निकल रही थीं. कई बुजुर्ग महिलाएं और रिश्तेदार नवजातों को संभालते हुए प्रसूताओं को सहारा देकर नीचे ला रहे थे. घटनास्थल पर मौजूद लोगों के अनुसार कुछ समय के लिए ऐसा लग रहा था कि आग पूरे अस्पताल को अपनी चपेट में ले लेगी. चारों तरफ चीख-पुकार, रोना-बिलखना और मदद की पुकारें सुनाई दे रही थीं. अस्पताल परिसर में मौजूद लोगों ने बताया कि जीवन में पहली बार उन्होंने इतना भयावह दृश्य देखा.
* आग बुझी, लेकिन माताओं के मन में बैठ गया डर
अग्निशमन विभाग ने आग पर नियंत्रण पा लिया और सुबह छह बजे के बाद अस्पताल की स्थिति सामान्य होने लगी. इसके बाद अधिकांश प्रसूत महिलाओं और उनके बच्चों को दोबारा वार्ड में भेज दिया गया. लेकिन हादसे का मानसिक असर अब भी बना हुआ है. शालू इंगले ने बताया कि उनकी बहू और अन्य कई महिलाओं की तबीयत घटना के बाद बिगड़ गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि हादसे के सदमे के कारण कई महिलाओं को सिरदर्द, पेटदर्द, बेचैनी और रक्तचाप की समस्या होने लगी है. उन्होंने कहा, हम दोबारा वार्ड में तो आ गए, लेकिन मन से अभी भी डर नहीं निकला है. मेरी बहू का सिर लगातार दुख रहा है. ऑपरेशन की जगह पर दर्द बढ़ गया है. वह कह रही है कि उसका ब्लड प्रेशर भी कम हो गया है. आसपास की कई महिलाओं की भी यही स्थिति है.
* डॉक्टरों ने दिनभर वार्ड की ओर ध्यान नहीं दिया
परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के बाद अस्पताल प्रशासन का पूरा ध्यान जांच और अन्य व्यवस्थाओं में लग गया, जबकि प्रसूत महिलाओं की मानसिक और शारीरिक स्थिति की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया. शालू इंगले ने आरोप लगाया कि आग की घटना के बाद पूरे दिन डॉक्टर वार्ड में नहीं आए और महिलाओं की तबीयत की पर्याप्त जांच नहीं की गई. हालांकि अस्पताल प्रशासन की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
* दोहरे संकट में फंसे परिवार
डफरीन अस्पताल में भर्ती कई परिवार इस समय दोहरे संकट का सामना कर रहे हैं. एक ओर तीन नवजातों की मौत का गहरा दुख पूरे अस्पताल पर छाया हुआ है, वहीं दूसरी ओर वहां भर्ती अन्य माताएं और उनके परिजन आग की घटना से मानसिक रूप से आहत हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी दुर्घटनाओं के बाद मरीजों और परिजनों को मनोवैज्ञानिक परामर्श और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है, विशेषकर उन महिलाओं को जिन्होंने हाल ही में बच्चे को जन्म दिया हो.
* स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने नई चुनौती
डफरीन अग्निकांड ने केवल अस्पतालों की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर ही सवाल नहीं खड़े किए हैं, बल्कि इस बात पर भी ध्यान आकर्षित किया है कि किसी बड़े हादसे के बाद मरीजों और उनके परिजनों को मानसिक सहायता कैसे उपलब्ध कराई जाए. घटना के बाद अस्पताल में भर्ती प्रसूत महिलाओं के मन में गहरा भय बैठ गया है. कई महिलाएं रात में सो नहीं पा रही हैं और बार-बार उसी घटना को याद कर घबरा जाती हैं. परिजनों की मांग है कि अस्पताल प्रशासन प्रभावित महिलाओं के स्वास्थ्य की विशेष जांच कराए, उन्हें आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराए तथा मनोवैज्ञानिक परामर्श की व्यवस्था भी करे, ताकि वे इस सदमे से बाहर निकल सकें. डफरीन अस्पताल की उस भयावह रात ने तीन मासूम जिंदगियां छीन लीं, लेकिन इसके साथ ही दर्जनों माताओं और परिवारों के मन में ऐसा डर छोड़ दिया है, जो शायद लंबे समय तक उनका पीछा करता रहेगा.





