जिस अस्पताल को मिला था ‘आरोग्य रत्न’ सम्मान, वहीं गूंजा मासूमों की मौत का मातम

गौरव से शोक तक का सफर

* राज्य में नंबर वन का दर्जा पाने वाले डफरिन अस्पताल में तीन नवजातों की मौत ने खड़े किए कई सवाल
अमरावती/दि.26- जिस अस्पताल की नई इमारत को स्वास्थ्य विभाग की उपलब्धि और आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था का प्रतीक माना जाता था, जिस अस्पताल की कार्यप्रणाली की पूरे राज्य में सराहना की जाती थी और जिसे हाल ही में उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया था, उसी अस्पताल में सोमवार की तड़के हुई एक दुर्घटना ने तीन परिवारों की दुनिया उजाड़ दी. जिला महिला अस्पताल (डफरिन) के एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) में हुए अग्निकांड में तीन नवजात शिशुओं की मौत ने न केवल अमरावती बल्कि पूरे महाराष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है. यह त्रासदी इसलिए भी अधिक पीड़ादायक है क्योंकि जिस इमारत को स्वास्थ्य सेवाओं का आदर्श मॉडल बताया जाता था, आज उसी की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
* जिस इमारत का हुआ था गौरव, वहीं पसरा मातम
डफरिन अस्पताल की नई इमारत का उद्घाटन 26 सितंबर 2024 को तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार के हाथों हुआ था. उस समय इस भवन को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित महिला एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं के केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया था. स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इसे राज्य की उत्कृष्ट स्वास्थ्य परियोजनाओं में शामिल बताया था. अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरण, स्वच्छ परिसर, बेहतर व्यवस्थापन और मरीजों को दी जाने वाली सेवाओं के कारण यह अस्पताल लगातार चर्चा में रहा. विभागीय अधिकारी जब भी अमरावती आते, इस अस्पताल का दौरा करना अपनी प्राथमिकता में रखते थे. कई बार इसे अन्य जिलों के लिए आदर्श अस्पताल के रूप में भी प्रस्तुत किया गया. लेकिन सोमवार को इसी अस्पताल के नवजात शिशु विभाग में हुई दुर्घटना ने सारी उपलब्धियों पर सवालों की परछाईं डाल दी.
* ‘आरोग्य रत्न’ से सम्मानित, राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाला अस्पताल
डफरिन अस्पताल को हाल ही में स्वास्थ्य सेवाओं में उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रतिष्ठित ‘बालासाहेब ठाकरे आरोग्य रत्न’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इतना ही नहीं, स्वास्थ्य विभाग द्वारा अप्रैल, मई और जून माह की कार्यप्रणाली की समीक्षा में इस अस्पताल ने सर्वाधिक अंक प्राप्त करते हुए राज्य में प्रथम स्थान हासिल किया था. यह उपलब्धि अस्पताल प्रशासन और कर्मचारियों के लिए गर्व का विषय थी. अस्पताल की कार्यक्षमता, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं तथा मरीजों के प्रति संवेदनशीलता की प्रशंसा की जा रही थी. लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस अस्पताल को राज्य में सर्वश्रेष्ठ माना गया, वहां सुरक्षा व्यवस्था में ऐसी चूक कैसे हुई कि तीन नवजातों की जान चली गई?
* विश्वास के साथ सौंपे थे बच्चे, लौटे आंसू और सवाल
डफरिन अस्पताल में भर्ती तीनों नवजातों के माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर इलाज और सुरक्षित देखभाल की उम्मीद के साथ यहां लेकर आए थे. किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि जिन हाथों में बच्चों का जीवन सुरक्षित समझकर सौंपा जा रहा है, वहीं से उनके अंतिम दर्शन करने पड़ेंगे. हादसे के बाद अस्पताल परिसर में जो दृश्य देखने को मिला, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकता था. रोती-बिलखती माताएं, बेसुध पिता और न्याय की मांग करते परिजन-यह सब उस अस्पताल के बाहर हो रहा था, जहां रोज नई जिंदगी का स्वागत किया जाता है. जिस स्थान पर बच्चों की पहली किलकारी गूंजती थी, वहीं सोमवार को मातम और चीख-पुकार का माहौल था.
* गौरव की दीवारों पर दर्ज हो गई त्रासदी की कहानी
अस्पताल की दीवारों पर लगे सम्मान और उपलब्धियों के प्रमाणपत्र आज भी उसकी सफलताओं की कहानी बयां करते हैं. लेकिन अब इन्हीं दीवारों पर तीन परिवारों के जीवनभर के दर्द की परछाईं भी दिखाई दे रही है. स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह केवल दुर्घटना नहीं, बल्कि उन सभी व्यवस्थागत कमियों की चेतावनी है जिन्हें अक्सर उपलब्धियों की चमक के पीछे नजरअंदाज कर दिया जाता है.
* जांच के दायरे में पूरी सुरक्षा व्यवस्था
घटना के बाद अब एसएनसीयू में स्थापित विद्युत प्रणाली, वायरिंग, वेंटिलेटर, वॉर्मर, एयर कंडीशनिंग सिस्टम, फायर सेफ्टी उपकरण और आपातकालीन प्रबंधन व्यवस्था की गहन जांच की मांग उठ रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी आधुनिक अस्पताल में इस प्रकार की घटना कई स्तरों पर विफलता का संकेत हो सकती है. इसलिए केवल आग लगने के कारणों की जांच पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि यह भी देखना होगा कि सुरक्षा मानकों का पालन कितना प्रभावी ढंग से किया जा रहा था.
* सवाल केवल हादसे का नहीं, जवाबदेही का भी
डफरिन अस्पताल को राज्य में प्रथम स्थान दिलाने वाली व्यवस्था यदि वास्तव में इतनी मजबूत थी, तो फिर सुरक्षा में चूक कहां हुई? क्या उपकरणों का रखरखाव पर्याप्त नहीं था? क्या फायर सेफ्टी सिस्टम पूरी तरह कार्यरत नहीं था? क्या नियमित ऑडिट और निरीक्षण में कमियों को नजरअंदाज किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण, इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों के जवाब अब जांच रिपोर्ट से मिलने की उम्मीद है. लेकिन तीन मासूमों को खो चुके परिवारों का कहना है कि केवल कारणों का पता लगाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी है.
* पुरस्कारों से आगे बढ़कर सुरक्षा पर देना होगा ध्यान
डफरिन अस्पताल की यह त्रासदी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक बनकर सामने आई है. पुरस्कार, रैंकिंग और उपलब्धियां किसी भी संस्थान की पहचान हो सकती हैं, लेकिन मरीजों की सुरक्षा उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. आज पूरे अमरावती की नजर इस बात पर है कि राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले इस अस्पताल में हुई चूक की सच्चाई सामने आए और ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जिसमें किसी भी माता-पिता को अपने नवजात बच्चे को अस्पताल में भर्ती कराने के बाद उसके सुरक्षित लौटने को लेकर भय न हो. तीन मासूमों की मौत ने डफरिन अस्पताल के गौरवशाली इतिहास पर एक दर्दनाक अध्याय जोड़ दिया है. अब यह प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है कि इस त्रासदी को केवल एक हादसा मानकर भुलाया न जाए, बल्कि इसे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए चेतावनी और सुधार के अवसर के रूप में देखा जाए.

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